| कैसे होंगे अन्य धर्मों के साथ रिश्ते? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कई मुसलमान नेताओं ने नए पोप से अनुरोध किया है कि वो पोप जॉन पॉल द्वितीय के रास्ते पर चलते हुए विभिन्न धर्मों के बीच - ख़ासकर इस्लाम और ईसाई धर्म के बीच - बातचीत जारी रखने की नीति को प्रोत्साहन दें. शंका जताई गई है कि नए पोप शायद ऐसा करने में उतना विश्वास नहीं रखते. तुर्की में तो उनके चुनाव पर हैरत ज़ाहिर की गई है क्योंकि उन्होंने यूरोपीय संघ में तुर्की की सदस्यता का ये कहकर विरोध किया था कि बेहतर हो यदि तुर्की अरब देशों की सदस्यता हासिल करे. पोप बेनेडिक्ट 16वें के सामने जो चुनौतियां हैं उनमें प्रमुख है वैटिकन का इस्लाम के प्रति रवैया. कुछ कैथोलिक ऐसे हैं जो पोप जॉन पॉल द्वितीय की नीति को अपनाते हुए दूसरे संप्रदायों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना चाहते हैं. लेकिन कुछ दूसरे हैं जो इस सोच से सहमत नहीं हैं. नए पोप जब कार्डिनल के पद पर थे तब उनकी भूमिका थी प्रमुख धर्मशास्त्री की और उन्हें एक तरह वैटिकन की नीतियों के रखवाले के रूप में देखा जाता था. उनका मानना था कि कैथोलिक इस सोच से उपर उठें कि सभी धर्म समान हैं, एक जैसे हैं. उनकी सोच थी कि दूसरे धर्मों से बातचीत हो लेकिन इस आधार पर कि कैथोलिक धर्म सबसे उपर है. जब उन्होंने यूरोपीय संघ में तुर्की की सदस्यता का विरोध किया तो उसके पीछे की सोच ये थी कि यूरोप में पहले से ही लगभग डेढ़ करोड़ मुसलमान हैं और यदि एक मुसलमान देश तुर्की इसमें शामिल होता है तो यूरोप की ईसाइयत पर असर पड़ेगा. शायद यही कारण है कि तुर्की में उनके चुनाव की आलोचना लगभग हर अख़बार में है. एक अख़बार की हेडलाइन है - "तुर्की विरोधी कार्डिनल पोप चुने गए" - और दूसरे ने लिखा है - "नए पोप तुर्की के ख़िलाफ़ हैं." नए पोप ने कहा था कि तुर्की स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देखता है लेकिन बात ये है कि कि तुर्की एक इस्लामी देश है. अब देखना ये है कि इस पद पर आने के बाद उनके रवैये में बदलाव आता है या नहीं. सितंबर ग्यारह के बाद दुनिया में जहाँ इस्लाम और पश्चिमी देशों के बीच पहले से ही तनाव है तब यदि वैटिकन की सोच में बदलाव आता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं. |
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