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ईरान में गर्भपात क़ानून में रियायत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ईरान की संसद ने गर्भपात के नियमों में ढील देने के लिए एक विधेयक पारित किया है जिसके तहत भ्रूण के मानसिक या शारीरिक तौर पर विकलांग होने की स्थिति में भी गर्भपात कराया जा सकेगा. अब तक सिर्फ़ माँ की जान को ख़तरा होने पर ही गर्भपात कराया जा सकता था. इस नए क़ानून को अभी ईरान की एक और महत्वपूर्ण परिषद शूरा-ए-निगेहबान की स्वीकृति मिलनी बाक़ी है. भारत में शियाओं के प्रमुख नेता मौलाना हमीदुल्ला हसन ने ईरानी संसद के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अभी इस बारे में धार्मिक नेताओं की राय आने के बाद ही अंतिम तौर पर कुछ कहा जा सकता है. उन्होंने कहा,"ये फ़ैसला अहम तो है मगर देखना ये है कि ईरान के बुज़ुर्ग क्या कहते हैं और इराक़ में शियाओं के सबसे बड़े नेता आयतुल्ला अली सिस्तानी की राय क्या है". उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार अभी तक गर्भपात केवल उसी स्थिति में हो सकता है जब माँ की जान को ख़तरा हो. महत्वपूर्ण क़दम शूरा-ए-निगेहबान ईरान में एक अनिर्वाचित निकाय है जिसका काम है ये तय करना है कि कोई भी क़ानून इस्लामिक क़ानून शरिया के मुताबिक़ है या नहीं. लेकिन संसद में विधेयक का पास होना भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है. ऐसा माना जाता है कि ईरान की संसद में कट्टरपंथी नेताओं की संख्या अधिक है. मगर विधेयक आधे से कुछ अधिक सांसदों की सहमति से पारित हो सका. क़ानून अब तक ईरान में अवैध गर्भपात कराने वाली महिला और अवैध गर्भपात करने वाले को तीन से दस साल की सज़ा हो सकती है. स्थानीय मीडिया के अनुसार इसके बावजूद हर साल लगभग 80,000 महिलाएँ अवैध तरीके से गर्भपात कराती हैं. लेकिन अब भी गर्भपात कराना आसान नहीं होगा. इसके लिए माता और पिता दोनों की सहमति ज़रूरी होगी, तीन डॉक्टरों और मामले को देख रहे अधिकारी को ये कहना होगा कि भ्रूण विकलांग है. चिंता स्थानीय विशेषज्ञों के अनुसार सबसे चिंता की बात ये है कि ईरान के इस नए विधेयक के पास होने के बावजूद वो महिला गर्भपात नहीं करा पाएगी जिसके साथ बलात्कार हुआ है. ईरान में इस बात को लेकर चिंता बढ़ी है कि गर्भपात से जुड़ी समस्याओं के लिए यौन शिक्षा देने की ज़रूरत है लेकिन इसके बावजूद सारा विवाद उलझ गया है धर्म से जुड़े मसलों में. और वो ये कि धार्मिक नेता अब ये बहस कर रहे हैं कि भ्रूण में जीवन कब आता है. कुछ प्रमुख मौलानाओं ने कह दिया है कि भ्रूण में जीवन चार महीने पूरे होने पर ही आता है और शायद इसीलिए ये विधेयक पारित हो सका है. |
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