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शुक्रवार, 18 फ़रवरी, 2005 को 03:23 GMT तक के समाचार
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इराक़ में शिया सरकार का बनना निश्चित
इराक़
शिया गठबंधन को शीर्ष धार्मिक नेता आयतुल्ला अल सिस्तानी का समर्थन हासिल है
इराक़ में शिया गठबंधन ने नेशनल एसेंबली में सबसे ज्यादा सीटें हासिल इराक़ी चुनाव में शिया गठबंधन को विजय मिली तो है मगर अभी उसे सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों से समझौते करने होंगे.

30 जनवरी 2005 को हुए चुनाव में275 सीटों वाली नेशनल एसेंबली में उन्हें 140 सीटें मिली हैं मगर दो तिहाई बहुमत से ये कम है.

कुर्द पार्टियों को 75 और अंतरिम प्रधानमंत्री ईयाद अलावी की पार्टी को 40 सीटें मिलेंगी.

इराक़ की 275 सदस्यीय नेशनल एसेंबली का काम राष्ट्रपति और दो उप राष्ट्रपतियों का चुनाव करना है, राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति मिलकर एक प्रधानमंत्री नियुक्त करेंगे और मंत्रिमंडल का गठन होगा.

अब सबसे पहले तो शिया गुटों को साझा सरकार का प्रधानमंत्री कौन होगा इसपर सहमति बनानी होगी.

दावेदार

 अधिक महत्वपूर्ण ये है कि एक साल बाद संविधान का मसौदा तय होने पर क्या होता है और अगले चुनाव में क्या होता है
इब्राहीम अल जाफ़री

फ़िलहाल सबसे आगे चल रहे दावेदार हैं करिश्माई व्यक्तित्व वाले राजनेता उपराष्ट्रपति इब्राहीम अल जाफ़री जो पेशे से डॉक्टर हैं, शिया मुसलमान हैं और रूढ़िवादी माने जाते हैं.

55 वर्ष से अधिक उम्र के अल जाफ़री अल दावा पार्टी के मुख्य प्रवक्ता हैं जो देश की सबसे पुरानी इस्लामी पार्टियों में गिनी जाती है.

वैसे निर्वासन में रहकर सद्दाम हुसैन की सत्ता का विरोध करनेवाले जाफ़री प्रधानमंत्री के चयन को अधिक बड़ा मुद्दा नहीं समझते.

वे कहते हैं,"जहाँ तक मेरी बात है मेरी जीत इसमें है कि मेरे लोगों ने मतदान किया. जहाँ तक ये सवाल है कि कौन आगे आता है और चुनाव के नतीजों से क्या निकलता है ये तो बस एक संक्रमण काल के विषय हैं."

उन्होंने कहा कि अधिक महत्वपूर्ण ये है कि एक साल बाद संविधान का मसौदा तय होने पर क्या होता है और अगले चुनाव में क्या होता है.

चुनौती

इब्राहीम जाफ़री को चुनौती मिल रही है शिया नेता अहमद चलाबी से जो एक समय में अमरीका के चहेते थे.

हालाँकि चलाबी कड़ी चुनौती दे पाएँगे अभी इसकी सँभावना कम है.

उधर चुनाव में दूसरे नंबर पर आनेवाली कुर्द पार्टियाँ अपने नेता जलाल तालाबानी को राष्ट्रपति की कुर्सी दिलवाना चाहती हैं.

ये भी समझा जा रहा है कि दो उपराष्ट्रपतियों में से एक सुन्नी दलों की तरफ़ से बनेगा और नेशनल एसेंबली के स्पीकर का का पद भी उनके ही खाते में जाएगा.

हालाँकि पदों के इस बँटवारे का काम काफ़ी आसान नहीं है और कहा जाए तो ये एक बानगी है उन और तीख़ी सौदेबाज़ियों की जो नए संविधान बनाने के लिए होगी.

मगर अभी तक राहत की बात ये है कि सभी पक्ष बातचीत में हिस्सा ले रहे हैं और ऐसे में उम्मीद है कि कोई ना कोई हल अवश्य निकल आएगा. आएँगे.

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