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इसराइली दीवार के विरोध में मतदान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर इसराइल से माँग की है कि वह पश्चिमी तट में बन रही दीवार तोड़ने के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के आदेश का पालन करे. इसराइल ये दीवार फ़लस्तीनियों के आने-जाने पर रोक लगाने के लिए बना रहा है जिसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने अवैध घोषित किया है. प्रस्ताव के पक्ष में 150 मत पड़े. छह सदस्यों ने विरोध किया जिनमें अमरीका भी शामिल है. 10 सदस्य अनुपस्थित रहे. अरब राष्ट्रों और यूरोपीय संघ के सदस्यों ने प्रस्ताव का समर्थन किया मगर अमरीका ने विरोध में मत डाला. वैसे ये प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और इसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का फ़ैसला आने के बाद तैयार किया गया. 191 सदस्यों वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा को अपने प्रस्तावों को मनवाने का कोई अधिकार नहीं है मगर इसके बाद ये मामला सुरक्षा परिषद में जा सकता है. सिद्धांत रूप में सुरक्षा परिषद को आर्थिक प्रतिबंध लागू करने का अधिकार मिला हुआ है. बीबीसी के संयुक्त राष्ट्र संवाददाता का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में पारित प्रस्ताव का उद्देश्य इसराइल पर नैतिक दबाव डालना है. फ़लस्तीनी प्रशासन ने कहा है कि वह अमरीका में नवंबर में होनेवाले राष्ट्रपति चुनावों के बाद ही सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लाने देगा. निंदा संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के राजदूत डान गिलरमैन ने प्रस्ताव पर हुए मतदान की निंदा की है और इसे 'न्याय की विकृति' बताया है. राजदूत ने कहा,"ये सीधे-सीधे अनाचार है कि एक ऐसी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिससे लोगों की जान बचती है और फ़लस्तीनियों के जारी आतंकवादी आँदोलन से आँखें मूँद ली जाए जिसमें जान ली जा रही है". इसराइल इस बात पर ज़ोर दे रहा है कि फ़लस्तीनी आत्मघाती हमलावरों को रोकने के लिए दीवार बनाया जाना ज़रूरी है. मगर इस दीवार का विरोध करनेवालों का कहना है कि ये दीवार बस ज़मीन हथियाने और अलग फ़लस्तीनी राष्ट्र की राह में अड़चनें डालने की कोशिश है. इसराइल ने कहा है कि वह इसराइली सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का पालन करेंगे जिसमें 640 किलोमीटर लंबी दीवार को राजधानी यरूशलम के इर्द-गिर्द मोड़ने को कहा गया है. मगर साथ ही उसने फिर कहा है कि वह इस दीवार के निर्माण के लिए ज़ोर डालते रहेंगे. |
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