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ब्रिटेन और ईरान के रिश्तों में तनाव | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन और ईरान के बीच रिश्ते यूँ तो हमेशा से ही नाज़ुक़ रहे हैं मगर ईरान के परमाणु कार्यक्रम और मानवाधिकारों को लेकर ये ख़ासतौर पर तनावग्रस्त चल रहे हैं. ब्रिटेन कई महीनों से ईरान के साथ रिश्ते संतुलित ढंग से चलाने की कोशिश कर रहा है. दक्षिणी इराक़ में ब्रितानी फ़ौजों को ईरान के साथ सीमा तनाव को कम से कम रखने का आदेश दिया गया है. सीमा का ये तनाव शत अल-अरब में ही सबसे ज़्यादा है जो कि ईरान की खाड़ी में इराक़ के प्रवेश का मुख्य मार्ग है. इसके अलावा ये ही ईरान और इराक़ के बीच 1980 के दशक में लगभग आठ साल चले संघर्ष की वजह भी थी. सोमवार को जो भी घटना हुई उसके पीछे क्या है ये तो बहुत स्पष्ट नहीं है मगर हो सकता है ये अमरीकी नेतृत्व वाली फ़ौजों पर इस दबाव का नतीजा हो कि इराक़ में सीमा पार से हो रही तस्करी को रोकने की कोशिश की जाए. अब अगर ब्रितानी गश्ती दल के रास्ता भटक कर दूर तक चले आने के पीछे मामला ये ही है तो ब्रितानी राजनयिक निश्चित रूप से किसी हल की उम्मीद कर सकते हैं. बढ़ता तनाव संयुक्त राष्ट्र की परमाणु ऊर्जा एजेंसी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने पिछले ही सप्ताह ईरान की आलोचना की थी. इसमें कहा गया था कि ईरान ने संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों के साथ पूरी तरह सहयोग नहीं किया है. इस पर ईरान नाराज़ हो गया था. इसके बाद जब यूरोपीय संघ ने ईरान में मानवाधिकारों के मसले पर इस सप्ताह टिप्पणी की तो मामला भला इतना आसान कैसे रह जाएगा. वैसे अभी तक ये कोई नहीं कह रहा है कि राजनयिक रूप से प्रतिशोध लेने का ये ईरान का जानबूझकर उठाया हुआ क़दम है मगर चिंता ये ज़रूर बनी हुई है कि ये एक गंभीर संकट का रूप ले सकता है. ख़ासतौर पर तब जबकि ईरान और ब्रिटेन के बीच रिश्ते तनावपूर्ण चल रहे हों. |
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