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राष्ट्रपति मुगाबे की घोषणा का असर
ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे की राष्ट्रमंडल की सदस्यता छोड़ देने की घोषणा अफ़्रीकी देशों में ग़ुस्सा पैदा कर सकती है. ये बात ब्रिटेन के ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय राजनीति विभाग के विशेषज्ञ डॉक्टर इफ़्तिकार मलिक ने बीबीसी से विशेष बातचीत में कही. उनका कहना था कि राष्ट्रपति मुगाबे रंगभेद का कार्ड खेल रहे थे कि राष्ट्रमंडल 'गोरों का क्लब' है. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रमंडल के देशों ने रविवार को ज़िम्बाब्वे का निलंबन जारी रखने का फ़ैसला किया था.
इस पर ज़िम्बाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे ने राष्ट्रमंडल की सदस्या छोड़ने की घोषणा कर दी थी. डॉक्टर मलिक का कहना था कि राष्ट्रपति मुगाबे का राष्ट्रमंडल छोड़ने का फ़ैसला अफ़्रीकी देशों में नाराज़गी पैदा कर सकता है. उनका कहना था कि निलंबन को जारी रखने के फ़ैसले से लगता है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की बात मानी गई. प्रधानमंत्री ब्लेयर पर इसको लेकर एक दबाव भी था. लेकिन निलंबन और फिर सदस्यता छोड़ने की घोषणा से राष्ट्रमंडल देशों में ध्रुवीकरण बढ़ जाएगा. प्रासंगिकता डॉक्टर इफ़्तिकार मलिक का कहना था कि 54 देशों के इस संगठन में वे देश शामिल हैं जो ब्रिटिश शासन में रहे थे.
इसमें अफ़्रीकी, ऑस्ट्रेलिया, उत्तरी अमरीका और एशिया के देश शामिल हैं. डॉक्टर मलिक का कहना था कि संगठन काफ़ी बड़ा है लेकिन इसकी कोई बड़ी उपलब्धियाँ अभी तक सामने नहीं आयीं हैं. अभी तक इसके सम्मेलन मिलने-जुलने तक सीमित रहे हैं. उनका कहना था कि राष्ट्रमंडल को अपने आपको बदलना पड़ेगा. इसे एक मानवाधिकार घोषणापत्र देना पड़ेगा और ग़रीब देशों में जहाँ मानवाधिकारों का हनन होता है वहाँ प्रभावित लोगों की मदद करनी होगी, केवल देशों को बाहर कर देने से बात नहीं बनेगी. |
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