खेतिहर हरिया के घर में भूख के बादल

गेवरा की महिलाएँ
    • Author, राजेश जोशी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, गेवरा गाँव, बुंदेलखंड से

बीती रात परमार्थ संस्था के मानवेंद्र तालबेहट क़स्बे से गेवरा चले आए थे. उन्होंने भी कोठरी में एक खाट बिछा ली थी. आते हुए वो ढाबे से मेरे लिए कुछ रोटियाँ और दाल लेते आए थे.

उन्हें हरियाँ की स्थिति का मुझसे बेहतर अंदाज़ा रहा होगा. मुझे नहीं था. मैंने एक बारगी सोचा ज़रूर था कि रात ढलने पर भी हरियाँ ने मुझसे एक बार भी खाने का ज़िक्र क्यों नहीं किया होगा. जबकि उन्होंने मुझे अपने घर में रात को ठहरने की ख़ुशी ख़ुशी अनुमति दी थी.

मैंने संकोचवश पूछा नहीं और दूसरे दिन बातचीत के दौरान हरियाँ ने बताया कि घर में आटा नहीं था. बच्चों के लिए गाँव के दूसरे घरों से माँग कर काम चला लिया गया.

“कभी कभी ऐसी परेशानी आ जाती है साहब कि हम भूखे भी पड़े रहते हैं. कल रात भी हम दोनों प्राणी भूखे सो गए क्योंकि घर में आटा नहीं था”, हरियाँ की आवाज़ निर्विकार और भाव-रहित थी. वो मुझसे करुणा की उम्मीद नहीं कर रहे थे.

रात बड़ी देर तक मैं आँगन में पड़ी चारपाई पर बैठा रहा था. हरियाँ की कोठरियों से आती सरगोशियों को सुनता हुआ.

बदलाव

“सुना है मीडिया वाले आए हैं” -- दरवाज़ा धड़ाके से खुला और अँधेरे में मुझे सिर्फ़ रोशनी की दो पतली लकीरें दिखाई पड़ती हैं. शायद ये पेंसिल टॉर्च की रोशनी है.

कोठरी से होते हुए दो आकृतियाँ बिना पूछे धड़धड़ाती हुई दालान में घुस आईं हैं.

सितारों के उजास में मैं देखता हूँ उनके पास पेंसिल टॉर्च नहीं मोबाइल फ़ोन हैं जिनका टॉर्च की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है.

“मेरा नाम नरेंद्र सिंह बुंदेला ‘मधुकर’ है. मैं साहित्यकार हूँ”, एक दुबली पतली काया और छोटे क़द वाले सज्जन ने अँधेरे में ही अपना परिचय देते हैं.

उनकी आवाज़ से ही पता चल जाता है कि उनके साथ आया दूसरा व्यक्ति सहायक है. प्रभावशाली व्यक्ति मधुकर ही हैं. वो वहीं दालान में पड़ी खटिया में बिना औपचारिकता से बैठ जाते हैं.

हरियाँ तुरंत दो बीड़ी सुलगाकर उनकी ओर बढ़ाता है.

नरेंद्र सिंह बुंदेला ‘मधुकर’ इस गाँव के पुराने सामंती परिवार के वारिस हैं. उनके पास बेतवा के बीच में ढाई सौ एकड़ ज़मीन है. वो गाँव में अपने पुरखों की बनाई लगभग छह सौ साल पुरानी क़िले नुमा हवेली में संयुक्त परिवार के साथ रहते हैं.

पुरानी शान

नरेंद्र 'मधुकर' के घर पर पुराने दिनों की कई निशानियाँ अब भी मौजूद हैं.
इमेज कैप्शन, नरेंद्र 'मधुकर' के घर पर पुराने दिनों की कई निशानियाँ अब भी मौजूद हैं.

अगले दिन मैं उनके घर पहुँचता हूँ. दीवारों पर पुराने पड़ चुके काँच के फ़्रेमों में बीते दिनों की निशानी के तौर पर कुछ तस्वीरें लटकी हैं. ए

क पुरानी मोटरकार की हेडलाइट्स के दोनों तरफ़ दो मरे हुए बाघ रखे हए हैं. ‘मधुकर’ के दादा अपने एक फ़्रांसीसी दोस्त, रिश्तेदारों और शिकार पार्टी में शामिल दूसरे लोगों के साथ बंदूक़ लिए खड़े नज़र आते हैं.

सभी ने शिकारियों की ड्रेस पहनी है. बीते ज़माने की ऐसी ब्लैक-एंड-व्हाइट फ़्रेमजड़ी तस्वीरों से उनके बक्से भरे हुए हैं.

लेकिन उन्हें हरियाँ जैसे दलित-आदिवासी के दरवाज़े आकर, उसकी चारपाई पर बैठकर उसी के हाथ से बीड़ी स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होता. समय बदला है.

‘मधुकर’ और हरियाँ दोनों इस बात को अलग अलग समय पर अलग अलग तरह से स्वीकार करते हैं. हरियाँ कहते हैं अब हम पर कोई दबाव डालकर काम नहीं करवा सकता.

‘मधुकर’ भी कहते हैं कि सामंती राजा प्रजा पर ज़ुल्म करते थे. अब वो नहीं चल सकता. ये मायावती की राजनीतिक सफलता का बहुत ज़मीनी उदाहरण है. अगर कोई न देखना चाहे तो न देखे.

बीड़ी के कश खींचते हुए नरेंद्र सिंह ‘मधुकर’ दलित-आदिवासियों की स्थिति पर मुझे अपनी चिंताओं से अवगत करवाते हैं. “ये लोग जितना कमाते हैं उतना सब ख़र्च कर देते हैं. हर शाम को इन्हें दारू चाहिए.”

मैं हरियाँ से चारपाई पर बैठने का इशारा करता हूँ लेकिन हरियाँ दीवार से टिककर खड़े ही रहते हैं और चुपचाप ठाकुर साहब की बातें सुनते रहते हैं.

कोठरी से अपनी डायरी और क़लम लेने के लिए मैं अंदर जाता हूँ. तभी वहाँ एक साया अंदर तक आता महसूस होता है. पंद्रह वॉट के बल्ब के मटमैले उजाले में मैं हरियाँ की बहू विमला को वहाँ खड़े पाता हूँ.

भूख का एहसास

हरिया
इमेज कैप्शन, हरिया के परिवार को कई बार भूखे सोना पड़ता है.

मुझे इस घर में 12 घंटे से ज़्यादा समय हो चुका है और इस दौरान चेहरा देखना तो दूर मैंने हरियाँ की बहू की आवाज़ तक नहीं सुनी थी. पर अब वो नीम अँधेरी कोठरी में अकेले मेरे सामने खड़ी है.

वा में एक भीनी-भीनी मगर तीखी गंध को मैं सूँघ सकता हूँ. हरियाँ की बहू नरेंद्र सिंह बुंदेला की बात सुनकर अपना विरोध दर्ज करवाने मेरे पास आईं. ये वो महिला नहीं थी जो दिनभर घूँघट काढ़े अपने कामों में उलझी रहती है. इस समय उसमें अगाध आत्मविश्वास है.

वो अस्फुट मगर आत्मविश्वास से भरे शब्दों में कहती है कि दाऊजी (नरेंद्र बुंदेला) हम लोगों के बारे में ऐसी बातें क्यों करते हैं.

मैं देख रहा हूँ एक और साया विमला के पीछे आ खड़ा हुआ है. ये उसकी सास यानी हरियाँ की पत्नी है. कोठरी में एक भीनी-भीनी मगर तीखी गंध कुछ और गहरा गई है.

वहाँ ख़ुद को सास-बहू के साथ अकेला खड़ा पाकर मैं अब थोड़ा असहज होने लगता हूँ. उनकी बातों पर ग़ौर करते हुए मैं बाहर जाने का रास्ता या बहाना खोजने लगता हूँ. हरियाँ बाहर ‘मधुकर’ के साथ बातचीत में व्यस्त है.

उस वक़्त परिवार के इन तीन सदस्यों को देखकर मेरे ख़याल में दूर दूर तक ये बात नहीं आई कि उस रात उनका पेट ख़ाली था.

उनके घर में आटा नहीं था और इसीलिए वो शहर से आए अपने मेहमान से खाने तक को नहीं पूछ पाए. मगर साल भर के आँकड़ों को जोड़ा जाए तो भूखे पेट सोने वाले इन तीनों प्राणियों के नाम प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति 26 रुपए से ज़्यादा ख़र्च बनेगा.

इस हिसाब से हरिया ग़रीब नहीं है लेकिन फिर उन्हें और उनकी पत्नी को भूखे क्यों सोना पड़ता है?

(समाप्त)