वीडियो गेम्स क्या महज़ वक़्त की बर्बादी हैं? - दुनिया जहान

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वीडियो गेम्स खेलना दुनिया में अब एक बेहद सामान्य गतिविधि है और बहुत से लोगों को इससे जुनूनी तौर का लगाव भी है. रोडरैश, अलादीन, नीड फ़ॉर स्पीड जैसे कंप्यूटर गेम्स हों या एंग्री बर्ड्स, कैंडी क्रश, पब्जी, कॉल ऑफ़ ड्यूटी जैसे मोबाइल गेम्स हों, हममें से कई ने कभी ना कभी इस पर हाथ आज़माया होगा या औरों को खेलते देखा होगा.
आपने ऐसी ख़बरें भी सुनी होंगी कि इन खेलों के शौक में पागल हो चुके लोगों ने ख़तरनाक क़दम उठाए हों या जीटीए जैसा गेम खेलते खेलते किसी को अपराध की प्रेरणा मिल गयी हो या मां बाप के द्वारा फ़ोन का इस्तेमाल रोकने की वजह से किसी बच्चे ने आत्महत्या तक कर ली हो.
अमेरिका के प्रोफे़सर एरिक हर्स्ट के एक शोध ने कुछ और चौंकाने वाले तथ्य पेश किए जिसके अनुसार अमेरिका में 2015 में 20 की उम्र के आसपास के एक चौथाई लोग कोई काम नहीं कर रहे थे और यह संख्या अब कहीं अधिक बढ़ गयी है. तो यह लोग क्या करते हैं?
एरिक हर्स्ट कहते हैं युवा हर रोज़ काफ़ी समय वीडियो गेम्स खेलने में बिताते हैं. उनके अनुसार ऐसे लोगों को भविष्य में किसी रोज़गार के मिलने की संभावना काफी कम है, क्योंकि जिस उम्र में उन्हें हुनर सीखना है वह अपना समय वीडियो गेम्स में बिता रहे हैं.
प्रोफ़ेसर हर्स्ट के अनुसार इस बात की संभावना भी अधिक है कि यह लोग भविष्य में अपने माता-पिता या रिश्तेदारों पर आश्रित रहें, स्कूली शिक्षा पूरी ना करें या कॉलेज ना जाएं. वहीं रोज़गार में कमी की वजह से ऐसे लोग काम करने लायक ना रहें. इतनी बड़ी संख्या में लोगों में प्रशिक्षण की कमी से अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ना लाज़मी है.
इस शोध से इस बात पर बहस और तेज़ हो गयी कि क्या वीडियो गेम्स की वजह से युवा पीढ़ी का भविष्य बर्बाद हो रहा है?
तो इस हफ़्ते हम दुनिया जहान में यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या वीडियो गेम्स खेलना महज़ वक़्त की बर्बादी है या इसके कुछ फ़ायदे भी हैं?

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गेमिंग की दुनिया
वीडियो गेम्स की दुनिया को समझने के लिए बीबीसी ने कैथरिन इसबिस्टर से बात की और जानने की कोशिश की कि कंप्यूटर गेम्स दरअसल हैं क्या और कौन लोग इसे खेलते हैं?
कैथरिन कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के कंप्यूटेशनल मीडिया विभाग में प्रोफ़ेसर हैं.
वह कहती हैं, "वीडियो गेम्स का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में एक तस्वीर उभरती है कि कुछ लड़के एक कमरे में बैठकर कंप्यूटर पर कोई गेम खेल रहे हैं. लेकिन अब लड़कियां भी उतने ही चाव से खेलती हैं और अब वीडियो गेम्स खेलने वालों में ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जिनकी उम्र तीस साल के आस पास है."
कंप्यूटर गेम्स की लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि यह सौ अरब डॉलर का उद्योग बन चुका है. लगभग दो अरब लोग इसे कंप्यूटर, मोबाइल फ़ोन या प्ले स्टेशन के कंसोल पर खेलते हैं.
कैथरिन इसबिस्टर कहती हैं कि पिछले दस सालों में कंप्यूटर गेम्स की दुनिया में भारी विकास हुआ है. वो पहले से अधिक आकर्षक हुए हैं. वहीं वो खेलने वालों में अलग-अलग तरह की भावनाएं पैदा करते हैं और इस कदर प्रभावी होते हैं कि लोग घंटों तक इन गेम्स में खोए रह सकते हैं. एकतरफ जहां इससे मनोरंजन होता है वहीं इससे समाज को कुछ ख़तरा भी हो सकता है. मिसाल के तौर पर जीटीए जैसे कुछ गेम्स चिंता का विषय बन चुके हैं.
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''ग्रैंड थेफ़्ट ऑटो एक गेम है जिसकी काफ़ी आलोचना हो रही है. इसमें अत्यधिक हिंसा होती है और जोख़िम उठाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जाता है. मेरे ख़्याल से वो ध्यान आकर्षित करने के लिए ऐसा कंटेट बनाते हैं."
कैथरिन इसबिस्टर आगे कहती हैं, "यह गेम खेलने वाले लोग कई भावनाओं से गुज़रते हैं, ख़ुशी, गुस्सा, दुख और अपराध-बोध. यह भावनाओं की एक पूरी दुनिया ही है जिसमें लोग खो सकते हैं. इसमें खेलने वालों को कई फ़ैसले करने पड़ते हैं जिसका उन पर असर पड़ता है. जो कि किताब पढ़ने या फ़िल्म देखने के अनुभव से बिल्कुल अलग है."
गेम्स के बारे में एक आम धारणा यह भी है कि यह खेलने वालों को एकाकी बनाते हैं. मगर कैथरिन इसबिस्टर इससे सहमत नहीं हैं.
वह कहती हैं, "गेम्स के बारे में एक अच्छी बात यह है कि आप इसे और लोगों के साथ मिलकर भी खेलते हैं. उनके साथ मिलकर फ़ैसले करते हैं. यह फ़ुटबाल या किसी दूसरे स्पोर्ट जैसा ही है जिसमें आप लोगों से जुड़ते हैं. कई पेचीदा अनुभवों गुज़रते हैं."
यही वो बातें हैं जो वीडियो गेम्स को लोकप्रिय और आकर्षक बना रही हैं मगर क्या यह अच्छी बात है?

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पिक्सेल का चक्रव्यूह
जाने माने मनोवैज्ञानिक फ़िलिप ज़िंबार्डो कहते हैं कि जब वो स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाया करते थे तब उनके बेटे एडम को कंप्यूटर गेमिंग की ऐसी लत लग गयी थी कि वो पूरी-पूरी रात गेम खेलता रहता था. यहां तक कि उसके दुश्मन भी बन गए थे क्योंकि वो गेम में और बच्चों से कहीं अधिक माहिर हो गया था.
फ़िलिप कहते हैं कि उनका बेटा गेम में इतना उलझ गया था कि वो दूसरा कोई काम या पढ़ाई नहीं करता था जिससे उसके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा था.
यह देखने के बाद ही प्रोफ़ेसर जिंबार्डो ने गेमिंग के मानसिक और सामाजिक परिणामों पर शोध करने का फ़ैसला किया था. वह कहते हैं कि बहुत लोगों की ज़िंदगी और भविष्य पर इसका नकारात्मक असर पड़ रहा है.
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"गेमिंग दूसरी गतिविधियों को रोक देती है. आप इससे कुछ नहीं बनाते. ना आप कसरत करते हैं और ना परिवार के साथ बैठ कर खाना खाते हैं. ना आप खब़रें देखते हैं और ना ही पढ़ते-लिखते हैं. इससे आप सिर्फ़ वीडियो गेम के खिलाड़ी बनकर रह जाएंगे और अशिक्षित भी."
फ़िलिप ज़िंबार्डो कहते हैं, "गेमिंग एक तरह की जीवनशैली है. इसके लिए उनके पास शब्द भी है. 'इसे प्रेसेंट हेडोनिस्टिक' यानी वर्तमान में मशगूल रहना."
"आप हमेशा कुछ नया और रोमांचक चाहने लगते हैं. आप बिना भविष्य की सोचे फ़ैसले करने लग जाते हैं. बचपन में तो यह चल भी जाए लेकिन बड़े होने के बाद ऐसा नहीं चल सकता. और वीडियो गेम लोगों को इसी दिशा में धकेलता है. यह महज़ गेम है कोई ज़िंदगी नहीं है. यह आपको अच्छा नागरिक, पिता या पति बनने के लिए तैयार नहीं कर सकता. यह गेम आपको रोज़मर्रा की सामाजिक सच्चाई से निपटने के लिए तैयार नहीं करते."
आम धारणा है कि अधिकांश तौर पर लड़के गेमिंग करते हैं. मगर लड़कियां भी इसमें काफ़ी रुचि रखती हैं. लेकिन अभी भी जब यह कहा जाता है कि गेमिंग समय की बर्बादी है तो यह लड़कों को ध्यान में रखकर कहा जाता है.
फ़िलिप ज़िंबार्डो ने एक किताब लिखी है जिसका शीर्षक है 'मेन डिसकनेक्टेड'. वो कहते हैं कि कुछ युवा पुरुषों के लिए समस्या गेमिंग का आकर्षण नहीं बल्कि सामाजिक यथार्थ से निपटने की चुनौती है.
फ़िलिप ज़िंबार्डो का कहना है, "वीडियो गेम की ओर युवा पुरुष ज़्यादा आकर्षित हो रहे हैं. इसका मतलब है कि वो बदलावों से गुज़र रहे हैं. शिक्षा के क्षेत्र में महिलाऐं बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं और पुरुष उनका मुकाबला नहीं कर पा रहे. जहां वीडियो गेम रोमांचक होते हैं वहीं स्कूल ऊबाऊ लगता है क्योंकि वहां अधिकांश लोग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तक नहीं करते."

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ज़िंबार्डो के अनुसार अशिक्षित रह जाने की वजह से इन युवाओं के लिए नौकरियां पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में वो सामाजिक सच्चाई से निपटने के बजाय वीडियो गेम की दुनिया में खो जाना ज़्यादा पसंद करने लगते हैं.
वो कहते हैं, "यह बहुत बड़ी समस्या है. हमें दिखाई दे रहा है कि जापान, कोरिया, पोलैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में यह समस्या बढ़ती जा रही है. जो युवा समाज के विकास में भूमिका निभा सकते हैं उनका वीडियो गेम की दुनिया में खो जाना समाज के लिए बहुत महंगा साबित होगा."
मगर क्या यह हर जगह लागू होता है?
गेम खेलने वाले वैज्ञानिक
प्रोफ़ेसर झोरान पोपोविच बचपन से आर्केड गेम खेलते आ रहे हैं लेकिन अब वो वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर गेमिंग साइंसेस में प्रोफ़ेसर हैं. लेकिन यहां वो सिर्फ़ गेम नहीं खेलते बल्कि मस्तिष्क वैज्ञानिकों को गेमिंग तकनीक का इस्तेमाल करना सिखाते हैं. नौ साल पहले उन्होंने एक समाजोपयोगिक गेम बनाया जिसका नाम है 'फ़ोल्ड इट.'
वो इस बारे में बताते हैं कि, "दरअसल दुनिया की एक सबसे गूढ़ पहेली है कि प्रोटीन हमारे शरीर में क्या करते हैं? 'फोल्ड इट' इस पहेली को समझने के लिए बनाया गया एक गेम है."
प्रोटीन का काम उनके 3डी आकार पर निर्भर करता है और 3डी आकार की संभावनाएं तो असंख्य होती है. इन सारे आकारों में कौन सा सबसे बेहतर होता है यह समझना तो सुपर कंप्यूटरों के लिए भी बड़ी चुनौती है. ज़ोरान पोपोविच ने इस पहेली को फोल्ड इट गेम के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया.
पोपोविच कहते हैं, "यह टेट्रस गेम की तरह है लेकिन 3डी रूप में और टेट्रस से कई गुना विशाल. यह एक तरह से हवा में तैरती पहेली जैसा है. इसमें कई सारे हिस्से होते हैं जिन्हें आप कहीं भी खिसका सकते हैं उनके आकार को तोड़-मोड़ कर पहेली को सुलझा सकते हैं. इसमें म्यूज़िक होता है और देखने में यह काफ़ी आकर्षक भी लगता है. इसमें एक स्कोरिंग सिस्टम भी है जो पूरी दुनिया के लिए एक समान है."
आज तक कम से कम पांच लाख लोग फ़ोल्ड इट का इस्तेमाल कर चुके हैं. यह बीमारियों के इलाज और औषधियों के अनुसंधान में भी काम आ रहा है.
कई वैज्ञानिक तेरह साल तक एक प्रोटीन की संरचना समझने की कोशिश कर रहे थे. मगर फ़ोल्ड इट के माध्यम से किसी ने केवल दस दिन में इसे सुलझा लिया और प्रयोगशाला में इस फ़ार्मूले की पुष्टि भी हो गयी. अब झोरान पोपोविच की टीम ने एक नया गेम बनाया है जिसका नाम है 'मोज़ैक' जो मस्तिष्क की पेशियों को समझने में मदद करता है.
पोपविच कहते हैं सैकड़ों गेम बेस्ड मस्तिष्क वैज्ञानिक उन्हें इस शोधकार्य में गेम के ज़रिए ऑनलाइन मदद कर रहे हैं. यह दरअसल आम लोग हैं जैसे कि वकील, इलेक्ट्रिशियन, सचिव जिनका विज्ञान से कोई लेना देना नहीं है.
लेकिन क्या इससे उन लोगों को रोज़गार भी मिल सकता है?
झोरान पोपोविच कहते हैं, "नज़दीकी भविष्य में यह भी संभव हो सकता है. आने वाले एक दो सालों में कई ऑनलाइन न्यूरो साइंस प्रयोगशालाएं खुल सकती है. उनकी टीम स्कूल के छात्रों के लिए भी कई गेम बना रही है जिससे विज्ञान में उनकी रुचि बड़े."
प्रोफ़ेसर पोपोविच के अनुसार गेम समाज कल्याण और ज्ञानवर्धन के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं. मगर फ़ोल्ड इट और मोज़ैक बस इसके कुछ गिने-चुने उदाहरण ही हैं जो दरअसल गेम कम और विज्ञान अधिक हैं.
क्या मुख्यधारा के गेम्स से यह अपेक्षा की जा सकती है?

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गेमिंग करियर
लेकिन क्या वीडियो गेम को एक उथले शौक की तरह देखना सही है?
ब्रिटेन की मैनचेस्टर मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर टॉम ब्रॉक ऐसा नहीं मानते हैं. टॉम एक गेमिंग विशेषज्ञ भी हैं. वो कहते हैं गेमिंग से कई उपयोगी कौशल भी सीखे जा सकते हैं.
"अगर आप किसी यूट्यूब वीडियो में किसी माहिर गेमर के हाथों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि वो एक मिनट में 800 से ज्यादा हरकतें करते हैं जो एक विलक्षण कौशल है. यह पियानो बजाने जैसा ही है."
पियानो का रियाज़ और गेमिंग दोनों बंद कमरे में किए जाते हैं. दोनों एकाकी गतिविधियां हैं और दोनों में हुनर होता है फिर भी पियानो वादन को जो आदर मिलता है वो गेमिंग के हुनर को नहीं मिलता. लेकिन धीरे धीरे यह भी बदल रहा है. प्रतिस्पर्धात्मक गेमिंग अब फैल रही है और इसके लिए अब एक नया नाम है- ई-स्पोर्ट. दुनियाभर में अब गेमिंग चैंपियनशिप होने लगी हैं जिनमें पुरस्कार की राशि लाखों डॉलर तक भी होती है.
टॉम ब्रॉक कहते हैं, "यहां तक कि अब इसे ओलंपिक खेलों में शामिल किए जाने की मांग भी हो रही है. इसकी नैतिकता में एक अजीब बात तो यह है कि जिससे पैसे कमाए जाते हैं उसी को अच्छा माना जाता है."
ओलंपिक खेलों की तरह गेमिंग में भी पुरस्कार जीतने वाले तो कम ही होंगे. लेकिन टॉम ब्रॉक कहते हैं कि जिस तरह गेमिंग या ई-स्पोर्ट बढ़ रहा है उससे धीरे धीरे लोग इसकी सराहना शुरू कर देंगे
टॉम ब्रॉक का मानना है कि, "अब नियमित तौर पर नए शोधकार्यों में यह सामने आ रहा है कि गेमिंग से लोगों में एक दूसरे के साथ समन्वय बनाने, संयम, जीवटता, रचनात्मकता और नेतृत्व के कौशल विकसित होते हैं क्योंकि लोग यह खेल मिलकर खेलते हैं. और वीडियो गेम प्लेयर आपसी समस्याएं सुलझाने के गुर सीखने लगते हैं जिसका उन्हें दूसरे काम में भी फ़ायदा होता है."
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य सवाल पर कि क्या वीडियो गेम वक़्त की बर्बादी मात्र हैं?
हमारे चार एक्सपर्ट ने जहां यह चिंता व्यक्त की कि यह गेम लोगों को सामाजिक सच्चाई से दूर ले जाते हैं, एकाकी और विफल बना सकते हैं वहीं उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ाई के साथ साथ मनोरंजन भी ज़रूरी है. गेमिंग के गुणों का समाज में योगदान के लिए इस्तेमाल भी हो सकता है. और जैसा कि टॉम ब्रॉक कहते हैं, रोज़गार के काम और वीडियो गेम एक दूसरे से कुछ सीख भी सकते हैं.
टॉम ब्रॉक का सुझाव है, "इसे नैतिक चिंता का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए. बल्कि हमें सोचना चाहिए कि क्या सामान्य काम को गेम की तरह रोचक बनाया जा सकता है? अगर नहीं, तो क्या कम से कम जो गुण गेम से सीखे जा सकते हैं उनका आदर किया जा सकता है? इसे अच्छे या बुरे या ब्लैक एंड व्हाईट में नहीं देखा जाना चाहिए."
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