हिंदू और बौद्ध धर्म पुनर्जन्म के बारे में क्या कहते हैं

    • Author, मार्गरिटा रोडरिग्ज़
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

बुद्ध ने कहा है, "कुछ चीज़ें हैं जो सोच से परे हैं और अगर कोई मनुष्य उनके बारे में बहुत अधिक सोचने की कोशिश करता है तो वह उसे कभी भी हल नहीं कर पाएगा."

बौद्ध भिक्षु नंदीसेना ने बीबीसी मुंडो से कहा, "इनमें से एक है कम्म या कर्म के नियम को समझने की कोशिश करना और दूसरा है ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में कयास लगाना, चाहे वह बनाया गया हो या नहीं."

कम्म पाली भाषा का एक शब्द है. इस भाषा के बहुत से शब्द संस्कृत शब्दों से मिलते-जुलते हैं. भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश पाली भाषा में ही दिए हैं. इसे संस्कृत में कर्म कहते हैं.

मेक्सिको में हिस्पैनिक बुद्धिस्ट स्टडीज़ (आईईबीएच) से जुड़े नंदीसेना कहते हैं कि जब बौद्ध धर्म लोकप्रिय हुआ तो बहुत से विद्वानों ने संस्कृत का इस्तेमाल करना शुरू किया. हालांकि, बुद्ध ने इसका इस्तेमाल नहीं किया है.

ये कॉन्सेप्ट बुद्ध की परम वास्तविकता की खोज का हिस्सा है. यह एक अवर्णनीय सच्चाई है जो परंपरागत वास्तविकता से बिल्कुल अलग है.

हालांकि, पुनर्जन्म की तरह ही कर्म भी एक बेहद जटिल अवधारणा है. बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म में इससे जुड़ी कई शिक्षाएं और परंपराएं हैं.

दो शोधकर्ताओं की मदद से हमने इन्हें समझने की कोशिश की है.

बौद्ध धर्म में

राजकुमार सिद्धार्थ जिन्हें बाद में चलकर बुद्ध के नाम से दुनिया ने जाना, उनका जन्म 2500 साल पहले एक शाही परिवार में हुआ था. ये जगह अब नेपाल में है.

एक राज परिवार में पैदा होने के बावजूद एक घटना से उद्वेलित होकर उन्होंने राज-पाठ, विशेषाधिकार, भोग-विलास सबकुछ का त्याग कर दिया और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति में निकल पड़े. सालों के तप के बाद वह 'बुद्ध' हुए.

एक अनुमान के मुताबिक़,मौजूदा समय में दुनिया भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या 370 मिलियन से अधिक है और थेरावाडा जैसे कई स्कूल हैं.

नंदीसेना के मुताबिक़, बुद्ध के उपदेश के मुताबिक़, क्रिया के तीन द्वार हैं-

पहला शरीर

दूसरी ज़ुबान या भाषा और

तीसरा चित्त.

वह कहते हैं, "अपनी ज़ुबान और शरीर के माध्यम से हम दूसरों से संपर्क करते हैं और हम अपने अच्छे कर्म कर सकते हैं या हम चाहें तो बुरे कर्म कर सकते हैं और दूसरों को पीड़ा और नुकसान पहुंचा सकते हैं."

चित्त ही वह निजी द्वार है जो शरीर और ज़ुबान का नेतृत्व करता है.

बौद्ध भिक्षु के मुताबिक़, "हर बार जब हम अपने शरीर के द्वार से, भाषा के द्वार से या फिर चित्त के द्वार से कोई क्रिया करते हैं तो यह कर्म है."

क्षमता

बुद्ध कहते हैं- "पलक झपकने के साथ ही अनगिनत विचार पनपते और समाप्त हो जाते हैं."

एक जानकार के मुताबिक़, "कल्पना कीजिए कि एक मौखिक या शारीरिक क्रिया के दौरान, जो किसी एक निश्चित समय तक हो सकती है, उस दौरान अनगिनत विचार पनपते हैं जो हमें उस क्रिया को पूरा करने के लिए प्रेरित करते हैं."

"हर उस क्षण को हम एक कर्म कह सकते हैं. या फिर ईकाई और अगर तकनीकी तौर पर कहें तो यह कर्मा है."

यानी की, हर वक़्त जब हम यह कहते हैं कि कुछ करो या कुछ सोचो तो उसमें हमारी एक नीयत होती है और हम एक क्षमता पैदा करते हैं.

जब हम कोई क्रिया करते हैं, मसलन, वो चाहे दया और करुणा की क्रिया हो या भी किसी अन्य प्राणी को नुकसान पहुंचाने की तो हमारी निरंतरता में एक क्षमता उत्पन्न होती है.

और यह क्षमता तब तक बनी रहती है जब तक की परिणाम मिलने तक के लिए परिस्थितियां और शर्तें पूरी नहीं होतीं.

वह कहते हैं, "आज के समय में कर्म के बारे में बहुत से लोग परिणाम की बात करते हैं और कहते हैं कि यह मेरा कर्म है या फिर मेरे साथ ऐसा हुआ."

"लेकिन दरअसल, कर्म वास्तविक रूप से एक क्रिया है और उस क्रिया के परिणाम के बीच के संबंध को ही कर्म या कर्म का नियम कहा जाता है."

पुनर्जन्म

बौद्ध भिक्षु के मुताबिक़, हमारे आस-पास कुछ ऐसे गुण और भौतिक क्रियाएं ऐसी होती हैं जो हमारी अंतरात्मा की आवाज़ का आधार होते हैं.

हम सभी के शरीर में छह अलग-अलग तरह की जागृति होती है. आंख, कान, नाक, जीभ, स्पर्श और मन. और ये सभी गुणधर्मों के आधार पर बढ़ते हैं.

जब ये भौतिक गुण खो जाते हैं, तो मृत्यु हो जाती है.

लेकिन मानसिक जागृति, मृत्यु के तुरंत बाद ही एक क्रिया का अनुसरण करती है और यह जीवन के पनपने से जुड़ा होता है.

बौद्ध धर्म के अनुसार, जिस समय पुरुष के शुक्राणु और मादा के अंडाणु मिलते हैं, तो सिर्फ़ माता और पिता के अतिरिक्त एक बाहरी आरोपण भी होता है जिसे हम री-कनेक्शन कहते हैं.

यह वह समय होता है जब चेतना का आधार बनता है, जिसके विकास के लिए कई तरह की सेंसरी फ़ैकल्टी (संवेदी संकाय) विकसित होती हैं.

उनके मुताबिक़, "हम पुनर्जन्म शब्द का इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं होता है, जो एक क्षण से दूसरे तक हो. यह एक निरंतरता है, लेकिन इसकी कोई पहचान नहीं है. पिछली जागृति से जुड़ा ऐसा कुछ भी नहीं होता है जो एक साल के तौर पर अगली जागृति को मिलता है."

हालांकि, वह मानते हैं कि बौद्ध धर्म की कुछ शाखाएं ऐसी हैं जो पुनर्जन्म जैसे शब्द का इस्तेमाल करती हैं लेकिन वह आगे कहते हैं, "तकनीकी तौर पर हम री-कनेक्शन शब्द का इस्तेमाल करते हैं जो सीधे तौर पर पाली के एक शब्द का शाब्दिक अनुवाद है. हालांकि, पुनर्जन्म शब्द का इस्तेमाल करना, लोगों को अधिक समझ में आता है."

हिंदू धर्म में

जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है. इसलिए जो अटल है, अपरिहार्य है. उसके विषय में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए- भागवत गीता

बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के संस्कृत भाषाशास्त्र के शोधकर्ता ऑस्कर पुजोल ने बीबीसी मुंडो को बताया, "प्राचीन भारतीय दर्शन और विचारों में कर्म और पुनर्जन्म के अस्तित्व को लेकर पूर्ण सहमति है."

वह कहते हैं, "यह अजीब लग सकता है लेकिन प्राचीन भारतीय इतिहास में इसे इतने स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि इसके लिए शायद ही किसी प्रमाण की ज़रूरत हो."

दुनिया भर में क़रीब 900 मिलियन से अधिक लोग हिंदू धर्म को मानने वाले हैं. भारत और नेपाल हिंदू बहुल देश हैं.

बीबीसी रिलीजियस यूनिट के मुताबिक़, "दूसरे कई धर्मों की तरह हिंदू धर्म का कोई एक संस्थापक, एक ही धर्मग्रंथ और एक जैसी ही सर्व स्वीकृत शिक्षा नहीं है."

एक तरह से यह दुनिया का सबसे पुराना जीवित धर्म है.

यह मौजूदा पाकिस्तान में सिंधु घाटी के आसपास उत्पन्न हुआ.

वैचारिक रूप यह कई मामलो में जैन धर्म, बौद्ध धर्म और सिख धर्म से जुड़ा हुआ है.

कई विद्वान हिंदू धर्म को किसी एक धर्म के रूप में मानने के बजाय 'जीवन जीने का सार' या फिर 'धर्मों का परिवार' बताते हैं.

साधारण नियम

पुजोल के मुताबिक़, हिंदू दृष्टिकोण से कर्म एक तरह का नियम है. ख़ासतौर पर इस भौतिक दुनिया के लिए, इस दुनिया में रहने वाले लोगों के लिए.

कुछ लोगों का मानना है कि यह गुरुत्वाकर्षण के नियम की तरह है.

कर्म को समझना, कारण और उसके प्रभाव के नियम जितना ही आसान है. एक कारण और उससे उत्पन्न प्रभाव. जो किसी दूसरे प्रभाव के लिए कारण का काम करता है.

और यही कारण और प्रभाव की निरंतर चलती प्रक्रिया ब्रह्मांण और मनुष्य के अस्तित्व की रचना करती है. लेकिन यह सिर्फ़ भौतिक क्रिया तक ही सीमित नहीं है, इसके नैतिक आयाम भी हैं.

तो सकारात्मक क्रिया का परिणाम सकारात्मक होगा और नकारात्मक क्रिया का नाकारात्मक.

हिंदू धर्म में पुनर्जन्म

विशेषज्ञों के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो उसके पास जो विभिन्न प्रकार की शक्तियां होती हैं, उससे वापस ले ली जाती है.

"पहले शरीर मर जाता है, फिर इंद्रियां, फिर सांसें और फिर अति सूक्ष्म हिस्सा जो पुनर्जन्म लेने वाला होता है. वही बचता है."

"चित्त हमारे शरीर की हार्ड डिस्क की तरह होता है, जिसमें हमारे किये गए सभी कर्म दर्ज होते हैं."

जानकारों के मुताबिक़, अपने बारे में जानकारी पुनर्जन्म नहीं लेती है. तो नए जीवन में हमें नहीं पता होता है कि हम इससे पहले के जन्म में क्या थे. हम अपने पुराने जीवन की पहचान को खो चुके होते हैं.

कितने जन्म?

हालांकि इस संबंध में कई तरह के प्रचलित विचार हैं लेकिन पुजोल के मुताबिक़, आमतौर पर यह माना जाता है कि एक मनुष्य अपने अगले जन्म में किसी भी रूप में जन्म ले सकता है और यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है कि वह मनुष्य ही बने.

वहीं कितने जन्म...

तो प्रचलित विचार के मुताबिक़, यह कभी ना ख़त्म होने वाला चक्र है.

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