कनाडा का रिकॉर्ड बनाने वाला लड़ाकू विमान जिसका इस्तेमाल नहीं हो सका

कनाडा का लड़ाकू विमान

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आज भारत समेत दुनिया के बहुत से देश अपने यहां आधुनिक लड़ाकू विमान बनाते है, लेकिन दूसरे विश्व युद्ध तक ऐसा नहीं था. गिने चुने देश ही ऐसे थे, जिनके पास लड़ाकू विमान बनाने की तकनीक थी और वो इसे उन्हीं देशों को देते थे, जो भरोसेमंद हों.

दूसरे विश्व युद्ध से पहले उस समय की सुपरपावर ब्रिटेन ने अपने लड़ाकू विमान बनाने के ठेके कनाडा को दे रखे थे. जो ब्रिटेन के लिए हॉकर हरीकेन फाइटर और एवरो लैंकैस्टर बॉम्बर विमान बनाता था. जब शीत युद्ध शुरू हुआ, तो दुनिया में असुरक्षा को देखते हुए, हथियारों की मांग बढ़ गई. इनमें लड़ाकू विमान भी शामिल थे.

तब कनाडा ने दूसरे विश्व युद्ध के अपने तजुर्बे का फ़ायदा उठाते हुए एक लड़ाकू विमान बनाने की सोची.इस बार कनाडा, किसी ब्रिटिश या अमरीकी डिज़ाइन पर नहीं, बल्कि ख़ुद का डिज़ाइन किया हुआ विमान बनाना चाहता था.

इस काम को अंजाम दिया कनाडा की कंपनी एवरो एयरक्राफ्ट ने. 4 अक्टूबर 1957 को एवरो एयरक्राफ्ट के पहले लड़ाकू विमान ने उड़ान भरी. इसे देखने के लिए 14 हज़ार लोग कनाडा के टोरंटो शहर में जुटे थे. उस समय एरो फाइटर प्लेन माख 2 यानी 1500 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से उड़ सकता था. इसमें और तेज़ उड़ान की संभावनाएं थीं. कनाडा ने इस फाइटर विमान को डिज़ाइन करके, विमानन की दुनिया का सुपरपावर बनने का ख़्वाब देखा था.

एवरो विमान

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लेकिन, 20 फ़रवरी 1959 को अचानक एलान किया गया कि एवरो एयरक्राफ्ट कंपनी बंद की जा रही है. और एरो फाइटर प्लेन का निर्माण भी अब नहीं होगा. ये फ़ैसला कनाडा के उस वक़्त के प्रधानमंत्री जॉन डिफेनबेकर ने लिया था क्योंकि अमरीका या ब्रिटेन के मुक़ाबले कनाडा के पास इतने पैसे और संसाधन नहीं थे.

रातों रात एवरो एयरक्राफ्ट के क़रीब पंद्रह हज़ार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया. एरो फाइटर के सभी प्रोटोटाइप नष्ट कर दिए गए. कनाडा के विमानन इतिहास में 20 फ़रवरी 1959 को ब्लैक फ्राइडे कहा जाता है.

एरो ने कनाडा को फाइटर विमानों वाली महाशक्ति तो नहीं बनाया लेकिन उसने एक और महाशक्ति यानी अमरीका के चांद पर पहुंचने के ख़्वाब को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. एवरो एयरक्राफ्ट कंपनी से निकाले गए कनाडा के 32 इंजीनियरों ने नासा के अपोलो स्पेस मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. जिसकी मदद से अमरीका ने स्पेस रेस में सोवियत संघ को शिकस्त दी.

लड़ाकू विमान

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कनाडा के एविएशन और स्पेस म्यूज़ियम की निरीक्षक एरिन ग्रेगरी कहती हैं कि, 'दुनिया में ऐसे बहुत से कम देश हैं, जिन्होंने एक एयरक्राफ्ट विकसित करने में इतने पैसे ख़र्च किए और फिर उन्हें सेवा में नहीं लिया.'

कनाडा ने उस समय क़रीब 158 अरब डॉलर की रक़म से एरो फाइटर प्लेन का विकास किया था. पर आगे उसके लिए बाज़ार नहीं दिख रहा था. कनाडा की इतनी हैसियत नहीं थी कि वो इस विमान को लगातार बना कर इकट्ठा करता रहे और मौक़ा मिलने पर बेच सके. वो अमरीका या ब्रिटेन नहीं था.

एविएशन पर ब्लॉग लिखने वाले जो कोल्स कहते हैं कि, "उच्च तकनीक वाले रक्षा प्रोजेक्ट बहुत महंगे होते हैं. अगर अपने ही देश से बड़े ऑर्डर की गारंटी न हो, तो ऐसे प्रोजेक्ट चलाना बहुत मुश्किल होता है."

एरो लड़ाकू विमान

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कनाडा ने ये विमान इसलिए विकसित किया क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उसे बॉम्बर और फाइटर प्लेन बनाने का तजुर्बा था. 1949 में कनाडा के इंजीनियरों ने 102 नाम का जेट लाइनर यानी यात्री विमान भी बनाया था, जो पूरे उत्तरी अमेरिका में पहला यात्री विमान था. आगे चल कर एवरो एयरक्राफ्ट की योजना तश्तरी जैसे यान बना कर अंतरिक्ष में भेजने की भी थी. साथ ही कंपनी, अटलांटिक के आर पार के सफ़र के लिए एक सुपरसोनिक जेट बनाने पर भी काम कर रही थी.

कनाडा के रॉयल मिलिट्री कॉलेज के प्रोफ़ेसर रैंडल वेकलम कहते हैं , "एवरो कंपनी शानदार थी. उसकी उपलब्धियां कनाडा के विमानन क्षेत्र की सुपरपावर बनने के ख़्वाब को पूरा करती थीं. कनाडा की सरकार अपने देश को विमान बनाने वाले छोटे देश से अमरीका और ब्रिटेन जैसी महाशक्ति बनाना चाहती थी."

1950 में जब कोरिया में युद्ध छिड़ा तो कनाडा के रक्षा मंत्री ने एवरो से कहा कि वो जेटलाइनर बनाना छोड़े और फाइटर प्लेन बनाए. 1954 में कनाडा की एयरफ़ोर्स ने भी एक फाइटर प्लेन का टेंडर निकाला. इससे एवरो एयरक्राफ्ट के इंजीनियरों को अपने लिए एक मौक़ा मिला.

और 1957 में एरो फाइटर प्लेन पहली उड़ान भरने के लिए तैयार था. मगर ये इतना विकसित विमान था कि कनाडा के पास इसकी टेस्टिंग तक की सुविधा नहीं थी. इस विमान को अमरीका में नेशनल कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स के रिसर्च सेंटर में ले जाकर टेस्ट किया गया. यही अमरीकी कमेटी आगे जाकर नासा में तब्दील की गई. नासा के वैज्ञानिक, कनाडा के इंजीनियरों का कमाल देख कर हैरान थे. उन्होंने भी एरो फाइटर प्लेन में दिलचस्पी दिखाई. मगर, 1959 में कंपनी और प्रोजेक्ट दोनों को कनाडा की सरकार ने बंद कर दिया.

एवरो का लड़ाकू विमान

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कनाडा के इस फ़ैसले से अमरीका को बहुत फ़ायदा हुआ. एरो फाइटर प्लेन के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे अधिकतर कनाडाई इंजीनियरों को नासा ने अपने यहां रख लिया. जिन्होंने उसके मर्करी, जेमिनी और अपोलो मिशन को अंजाम तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी.

एरो फाइटर प्लेन प्रोजेक्ट बंद होने के साथ ही कनाडा का विमानन महाशक्ति बनने का ख़्वाब अधूरा रह गया. हालांकि जानकार कहते हैं कि अगर एरो फाइटर प्लेन बनाना जारी भी रहता, तो भी शायद कनाडा का ये सपना अधूरा ही रहता. क्योंकि, कनाडा की सरकार के पास इतने पैसे नहीं थे कि मांग न होने के बावजूद वो इस प्रोजेक्ट को जारी रख पाती.

हालांकि, उस वक़्त के कनाडा के नागरिकों का विज़न आज काम आ रहा है. आज कनाडा में दुनिया की पांचवीं बड़ी एरोस्पेस इंडस्ट्री काम कर रही है. जो कनाडा को भारी मुनाफ़ा कमा कर दे रही है.

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