कोरोना वायरस के दौर में बेरोजगारी: नौकरी जाने पर क्या क्या गुजरती है

कोरोना वायरस, नौकरियां जाने का ख़तरा

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    • Author, डेमियन फाउलर
    • पदनाम, बीबीसी वर्कलाइफ़

कोरोना वायरस के प्रसार के साथ ही लगभग हर हफ्ते किसी न किसी क्षेत्र से हजारों कर्मचारियों को बिना वेतन के छुट्टी देने, नौकरियों से निकालने, वेतन में भारी कटौती की खबरें आ रही हैं.

माल्स, रेस्तरां, बार, होटल सब बंद हैं, विमान सेवाओं और अन्य आवाजही के साधनों पर रोक लगी हुई है. फ़ैक्टरियां, कारखाने सभी ठप पड़े हैं.

ऐसे में संस्थान लगातार लोगों की छंटनी कर रहे हैं और हर कोई इसी डर के साये में जी रहा है कि न जाने कब उसकी नौकरी चली जाए.

इसके अलावा स्वरोजगार में लगे लोग, छोटे-मोटे काम धंधे करके परिवार चलाने वाले लोग सभी घर में बैठे हैं और उनकी आमदनी का कोई स्रोत नहीं है.

बॉस्टन कॉलेज में काउंसिलिंग मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर और 'द इंपोर्टेन्स ऑफ वर्क इन अन एज ऑफ अनसर्टेनिटी : द इरोडिंग वर्क एक्सपिरियन्स इन अमेरिका' क़िताब के लेखक डेविड ब्लूस्टेन कहते हैं, "बेरोज़गारी की वैश्विक महामारी आने वाली है. मैं इसे संकट के भीतर का संकट कहता हूँ."

जिन लोगों की नौकरियाँ अचानक चली गयी हैं या लॉकडाउन के कारण रोज़गार अचानक बंद हो गया है, उन्हें आर्थिक परेशानी के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है.

सरकारों, स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आर्थिक मदद दी जा रही है, लेकिन सवाल यह भी है कि नौकरी जाने या रोज़गार का ज़रिया बंद होने पर अपनी भावनाओं को कैसे संभालें? कैसे नकारात्मक भावनाओं को खुद पर हावी न होने दें?

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इमेज कैप्शन, लॉकडाउन के कारण दफ्तरों और कारखानों में काम बंद हो गया है.

हालात कठिन हैं

39 वर्ष के जेम्स बेल जिस बार में काम करते थे, उसके बंद होते ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अपने पाँच लोगों के परिवार को चलाने के लिए वेतन और टिप पर पूरी तरह निर्भर जेम्स के लिए यह एक बड़ा झटका था.

वो कहते हैं, "मुझे अंदाजा था कि कोरोना की ख़बरों के बाद बार में बहुत कम लोग आ रहे हैं, लेकिन यह अंदेशा नहीं था कि मेरी नौकरी ही चली जाएगी."

अब वह बेरोज़गारी भत्ते और विभिन्न चैरिटेबल संस्थाओं से वित्तीय सहायता पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन अचानक आजीविका चली जाने के दुख पर एक सुकून यह भी है कि अब उन्हें हर दिन वायरस से संक्रमित होने के डर से मुक्ति मिल गयी है.

वो कहते हैं, "नौकरी जाने से एक हफ्ते पहले तक मैं बार के दरवाज़ों के हैंडल को बार-बार डिसिनफ़ेक्ट कर रहा था."

उनके मुताबिक़ उनकी भावनात्मक स्थिति बहुत डांवाडोल है. नौकरी जाने का तनाव और महामारी का डर दोनों उन्हें परेशान करता रहता है.

जेम्स कहते हैं कि उन्हें इस बातका आभास है कि यह स्थिति हर व्यक्ति के साथ है. वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि मेरी असली चिंता यह है कि ये सब कब तक चलेगा. ये हालात जितने अधिक समय तक रहेंगे, हमारा वित्तीय संकट बढ़ता ही जाएगा."

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नौकरी न रहने पर भावनात्मक रूप से टूटना बेहद स्वाभाविक है, लेकिन आजकल के बेहद अनिश्चित माहौल में नौकरी जाना और भी ज़्यादा तनावपूर्ण हो सकता है.

न्यूयॉर्क में 20 वर्षों से निजी प्रैक्टिस कर रहे मनोवैज्ञानिक एडम बेन्सन कहते हैं, "आज के हालात में कई लोग कंट्रोल मोड में चले गए हैं और वे चीजों को नियंत्रित करना चाहते हैं. लेकिन हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि हम कितना भी चाहें, आज की हमारी स्थितियों पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है."

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रोज़गार जाने का दुख किसी अपने को खोने के दुख के बराबर ही होता है, और व्यक्ति रोज़गार जाने की स्थिति में भी दुख को महसूस करने और उससे निपटने के किसी भी चरण- यानि सदमा लगना और परिस्थिति को स्वीकार न करना, फिर गुस्सा और अंत में स्वीकार भाव और आगे की उम्मीद- से गुज़र सकता है.

बेन्सन कहते हैं, "मैं लोगों को बताता हूँ कि वे लॉस की भावना से गुज़र रहे हैं और जब वो यह मान लेते हैं तो अपने प्रति ज़्यादा उदार हो जाते हैं और अपनी भावनाओं को ठीक से महसूस कर पाते हैं."

"लेकिन कई लोग अपनी भावनाओं को स्वीकार नहीं करना चाहते. जैसे इस माहौल में नौकरी जाने पर वे खुद को कहेंगे कि जब महामारी के कारण सभी के साथ यही स्थिति है तो मैं ही क्यों इतना दुखी महसूस कर रहा हूँ. मुझे इतना दुखी नहीं होना चाहिए वगैरह-वगैरह."

"लेकिन किसी भी दुख से उबरने के लिए ज़रूरी है कि पहले हम स्वीकार करें कि हम दुखी हैं और हमारा दुख स्वाभाविक है. इसलिए जब हम यह महसूस करते हैं कि हमने निजी तौर पर कुछ खोया है, उम्मीद, अवसर या कोई रिश्ता खोया है, तब हम खुद को दुखी होने की अनुमति देते हैं और आगे बढ़ना शुरू कर पाते हैं."

नक्शे पर

दुनिया भर में पुष्ट मामले

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

अपनी भावनाएं व्यक्त कर पाना ज़रूरी

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि नौकरी खोने से जुड़ी भावनाओं को प्रोसेस होने में बहुत समय लगता है.

एक अध्ययन में 100 लोगों से नौकरी जाने के 12 हफ्ते बाद और फिर एक साल बाद अपनी भावनाएँ बताने को कहा गया था.

अध्ययनकर्ता सारा दमस्क, जो पेनिसेलविया स्टेट यूनिवर्सिटी में 'समाजशास्त्र, श्रम और रोजगार संबंध' की एसोसिएट प्रोफ़ोसर हैं, कहती हैं, "शुरुआत में लोग बेहद नाराज़ रहते हैं."

लेकिन वह यह भी कहती हैं कि उनका अध्ययन इस संकट से पहले का है जब प्रचुर आर्थिक समृद्धि थी. वो मानती हैं कि हो सकता है इस अनपेक्षित माहौल में नौकरी जाने पर उतनी नाराज़गी न हो.

सारा कहती हैं, "निश्चित रूप से कुछ भी नहीं कहा जा सकता. जिन लोगों को नौकरी से हटाया जाता है वो अपने मालिकों से नाराज़ रहते हैं. मेरा मानना है कि यह नाराज़गी इसलिए होती है कि आपको लगता है आपकी जगह कोई और ले सकता है, उन्हें आपसे सस्ते में काम करने वाला कोई मिल गया या आपको लगता है कि आपको कभी टीम का हिस्सा ही नहीं माना गया था जबकि आपको हमेशा यही लगता था कि आप टीम के लिए ज़रूरी हैं... वगैरह-वगैरह."

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सारा दमस्क कहती हैं कि इसके साथ ही बहुत से लोग नौकरी जाने पर शुरू में आज के माहौल को दोषी ठहराएँगे.

लेकिन कुछ समय बाद, जैसा कि मेनचेस्टर यूनिवर्सिटी में संगठनात्मक मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर केरी कूपर कहते हैं, "उनका ध्यान महामारी से पहले से कार्यबल में बदलाव से जुड़ी जो अनिश्चितताएँ रही होंगी, उन पर जाएगा."

"लोग नौकरी जाने के लिए खुद की बजाय महामारी को दोषी मान सकते हैं, लेकिन संभावना यह है कि अगर यह अनिश्चितता और लॉकडाउन का दौर लंबा चलेगा तो संगठनों को लग सकता है कि उनका काम कम लोगों से चल सकता है. उन्हें और लोगों की ज़रूरत ही नहीं. टेक्नालजी कई कर्मचारियों की जगह ले लेगी. यही सबसे बड़ा डर है."

संतुलन बनाए रखना

अध्ययनों से पता चलता है कि महामंदी के दौरान जिन लोगों को वित्तीय या नौकरी संबंधी दिक्कतों या आवास की समस्या का सामना करना पड़ा, उन्हें मानसिक बीमारियों का ख़तरा अधिक था. अब ऐसे में सवाल यह है कि इस अभूतपूर्व परिस्थिति की मार झेल रहे लोग अपना संतुलन कैसे बनाए रखें?

बेन्सन कहते हैं, "किसी भी नुक़सान के बाद लोगों को अपने हालात का मूल्यांकन कर यह तय करना चाहिए कि इनमे से किन चीजों को वे नियंत्रित कर सकते हैं और किन को नियंत्रित नहीं कर सकते और फिर उन्हीं चीजों पर फ़ोकस करना चाहिए जिन्हें वे नियंत्रित कर सकते हैं. जो समस्या अभी सामने है, उसकी पहचान करने, जैसे नौकरी जाने पर घर खर्च में कमी लाने और उसके लिये कुछ उपाय करने के साथ-साथ अगर हम यह मान कर चलेंगे कि कुछ समय के लिए हालात मुश्किल होने वाले हैं और जब तक स्थितियाँ नहीं सुधरतीं, जीवनशैली में बदलाव ज़रूरी हैं, तो कुछ आसानी होगी."

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आज की बेरोज़गारी की स्थिति बाकी दिनों से अलग है क्योंकि सभी मानते हैं कि यह अस्थायी है और जब स्थिति नियंत्रण में आ जाएगी तो लोग दुबारा काम पर लौटेंगे. जेम्स बेल जैसे कर्मचारी के लिए यह बहुत तसल्ली देने वाला विचार है.

वो कहते हैं, "मैं कल्पना करता हूँ कि सब कुछ ठीक हो जाने के बाद लोग दुबारा बार और रेस्तरां में आएंगे और अच्छी ख़ासी टिप देंगे."

इसके अलावा यह एहसास कि इस विपदा में परिवार सब एक साथ है, बहुत आश्वस्त करने वाला है. महामारी के इस दौर में कई दुकानों के मालिक संवेदनशीलता का परिचय दे रहे हैं. वो कर्मचारियों को पहले ही वेतन दे दे रहे हैं, लोग बेरोज़गारों के लिए धन इकट्ठा कर रहे हैं, उनके परिवारों की मदद कर रहे हैं.

हालांकि, जैसा कि बेन्सन कहते हैं, "इससे अंतर्निहित सामाजिक और आर्थिक समस्या नहीं सुलझेगी, लेकिन कम से कम लोग अपनी हालत के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं मानेंगे. वे अपने दुख और नाराज़गी की भावनाओं का मुक़ाबला कर पाएंगे क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी नौकरी उनकी किसी गलती की वजह से नहीं गई."

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दीर्घावधिक अवरोध

डोना बी. की मानें तो आज की सच्चाई को स्वीकार कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं, फिर चाहे वह सच्चाई कितनी ही डरावनी क्यों न हो?

क्नेक्टिकट में 35 वर्ष से अपने पति के साथ एक फिल्म और टेलेविजन कंपनी चला रही डोना को महामंदी के दौरान गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा था. लोगों ने हाथ पीछे खींच लिए और उनका सारा कामकाज ठप हो गया. अभी इस दिसंबर से हालात कुछ बेहतर होने शुरू हुए थे, लेकिन अब कोरोना वायरस ने फिर खेल बिगाड़ दिया है.

डोना के सारे प्रोजेक्ट रुके हुए हैं लेकिन उन्हें आशा है कि हालात सुधरेंगे और उनके पास काम वापस आएगा. वो कहती हैं, "मुझे लगता है किसी न किसी रूप में आज हम सब की हालत एक जैसी है, इसलिए इतना अकेलापन नहीं लगता."

चिंता से निपटने के लिए वे मौजूद संसाधनों की पूरी जानकारी रख रही हैं. सरकार द्वारा उद्योगों के लिए घोषित पैकेज से वे उत्साहित हैं, लेकिन उनका असली हथियार है सकारात्मक रहने की क्षमता को विकसित करना और ईश्वर के प्रति आभारी रहना.

"ज़िंदगी पल भर में बादल सकती है", वे कहती हैं, "इंतज़ार की घड़ियाँ लंबी हैं, लेकिन उम्मीद के भरोसे ही हम अपना संतुलन बनाए रख सकते हैं."

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

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