आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की एबीसीडी

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, रिचर्ड ग्रे
- पदनाम, विज्ञान संवाददाता, बीबीसी
आपने ए फ़ॉर एप्पल और ज़ेड फ़ॉर ज़ेब्रा वाली एबीसीडी तो पढ़ी होगी. पर क्या आपने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की एबीसीडी पढ़ी है?
अगर नहीं, तो चलिए हम आज आप को पढ़ाते हैं आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की एबीसीडी...
ए यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस
तकनीक इंसान की देन है. लेकिन कई मायनों में मशीनें इंसान की सोच से आगे निकल चुकी हैं.
अक़्लमंद मशीनें यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने इंसान की ज़िंदगी पूरी तरह बदल दी.
ये हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल हो चुकी हैं.
ये मशीनें इंसान के सोचने समझने और काम करने के तरीक़े को चुनौती देने की हालत में पहुँच गई हैं.

इमेज स्रोत, Alamy
बी यानी बायस यानी पक्षपात
कंप्यूटर की मदद से चलने वाली सभी मशीनों में डेटा फीड होता है. ये डेटा एल्गोरिदम की बुनियाद पर काम करता है.
लेकिन मशीन बनाने वालों ने इनके साथ भी भेदभाव कर दिया. जैसे नौकरी देने वाले रोबोट में ऐसा डेटा फ़ीड किया जो मर्दों के मुक़ाबले महिलाओं को कम आँकता है. या गोरी रंगत वालों के मुक़ाबले गहरे रंगत वालों को बड़ा अपराधी मानता है.
तकनीक के दिग्गजों पर इस समस्या को हल करने का दबाव बढ़ने लगा है.
सी फॉर चैटबॉट
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें इंसानों की तरह बातें करती हैं.
ये भाषा के दो स्तर अपनाती हैं. पहला नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग और दूसरा नैचुरल लैंग्वेज जेनरेशन.
हम इन मशीनों से जैसे बात करते हैं, वैसे ही ये हमसे बातें करती हैं. इन्हें ही हम चैटबॉट यानी बातूनी मशीनें कहते हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
डी यानी डिज़ाइन
किसी भी चीज़ की डिज़ाइनिंग चुनौती भरा और वक़्त खाने वाला काम है. ख़ास तौर से कारों के डिज़ाइन बनाना आसान काम नहीं है.
लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए इस काम को ज़्यादा तेज़ी और बेहतर तरीक़े से किया जा रहा है.
जनरल मोटर्स और एयरबस जैसी कंपनियाँ तो नए डिज़ाइन और पार्ट्स बनाने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का ही इस्तेमाल कर रही हैं.
ई यानी इमरजेंसी
किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है.
इस वक़्त दुनिया में एक बड़ी आबादी पलायन कर रही है. एक अंदाज़ के मुताबिक़ लगभग 68 लाख लोग लड़ाई, जंग, बुरे हालात, और क़ुदरती आपदाओं की वजह से बेघर हो चुके हैं.
यूनाइटेड नेशंस के साथ काम करने वाले रिसर्चर्स ने ऐसा डेटा तैयार किया है जो एल्गोरिदम की मदद से संकट की संभावना बता सकता है.
अमरीका की पॉलिटिकल इनस्टेबिलिटी टास्क फ़ोर्स और ब्रिटेन का एलेन टुरिंग इंस्टिट्यूट इस तरह की आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीन बना रहे हैं.
यही नहीं ये मशीनें न्यूज़ रिपोर्ट का आकलन करके ये बता सकेंगी की किस इलाक़े में तनाव पैदा होने वाला है.

इमेज स्रोत, Getty Images
एफ़ यानी फ़ुटबॉल
खेल के मैदान में खिलाड़ी का एक फ़ैसला पूरे खेल का रूख़ बदल देता है.
फ़ुटबॉल की प्रीमियर लीग का सबसे बड़ा क्लब चेल्सी एफ़सी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए ये आकलन करने की कोशिश कर रही है कि कौन सा ख़िलाड़ी खेल के मैदान में कौन सा अगला दांव चलने वाला है.
इससे टीम को विरोधी टीम के दांव समझने में आसानी होगी. इस तकनीक का इस्तेमाल ना सिर्फ़ फ़ुटबॉल के खेल में किया जाएगा, बल्कि अन्य खेलों में भी किया जाएगा.
जी फ़ॉर गैन यानी जेनेरेटिव एडवर्सरियल नेटवर्क
बड़े लोगों की फ़ोटो के साथ अक्सर छेड़छाड़ कर दी जाती है. लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से इसे रोका जा सकता है साथ ही गेन यानी जेनेरेटिव एडवरसरियल नेटवर्क के ज़रिए नई तस्वीरें बनाई जा सकेंगे.
एल्गोरिदम की मदद से एक कंप्यूटर में सेलेब्रिटी की तस्वीरें फीड की जाएंगी और नई तस्वीरें बनाई जाएंगी. जबकि दूसरे कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग की मदद से असली और नक़ली तस्वीर की पहचान की जाएगी.
साथ ही ये भी पता लगाया जाएगा कि जो तस्वीर कंप्यूटर ने जेनरेट की है वो असली जैसी दिखाई देती है या नहीं.
शुरुआत में गेन तकनीक से बनने वाली तस्वीरों का रिज़ॉल्यूशन अच्छा नहीं था. लेकिन अब काफ़ी बेहतर तस्वीरें बनाई जा रही हैं.
एच फ़ॉर हैलुसिनेशन
इंसानों के दिमाग़ अक्सर मतिभ्रम या ग़लतफ़हमी के शिकार हो जाते हैं. ऐसा अक़्लमंद मशीनों के साथ भी होता है. हाल ही में अमरीका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने अल्गोरिदम का एक नया वर्जन मशीन में लगाया. जिसके बाद मशीन ने चीज़ों को कुछ का कुछ पहचानना शुरू कर दिया.
अगर सेल्फ़ ड्राइविंग कार में इस तरह की गड़बड़ी हुई तो वो बड़े हादसे की वजह बन सकता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
आई फ़ॉर इमैजिनेशन
किसी भी चीज़ को देखने का मशीन का नज़रिया इंसान से अलग होता है. वो कई मायनों में हम से बेहतर सोचती हैं, और इंसान को नई चीज़ों की प्रेरणा देती हैं.
जैसे कि मशीन विजन रिसर्चर और आर्टिस्ट हेलेना सरिन ने अपनी बनाई कुछ ड्राइंग गेन सॉफ़्टवेयर में फ़ीड कीं जिसके बाद मशीन ने एक ही तस्वीर के इतने शेड्स निकाले कि वो ख़ुद हैरान रह गईं.
जे यानी जाम
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का बसबे बड़ा फ़ायदा ट्रैफ़िक जाम की सूरत में लिया जा सकता है.
अगर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के हाथ में तमाम सिग्नल दे दिए जाएं तो पहले से पता लगाया जा सकता है कि कहां जाम लग सकता है और उसे कंट्रोल कैसे किया जा सकता है.
के फ़ॉर निटिंग यानी बुनाई
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल फ़ैशन और कढ़ाई बुनाई के कामों में भी ख़ूब हो रहा है.
मिसाल के लिए स्काईनिट की मदद से बुनाई के ऐसे पैटर्न तैयार किए गए हैं, जो अपने आप में अद्भुत हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
एल यानी लैंग्वेज
अक़्लमंद मशीनों की अपनी ज़बान होती है. अब इसकी मदद से मार्केटिंग की कॉपी भी तैयार की जा रही. साथ ही आर्थिक डेटा औऱ स्पोर्ट्स आंकड़ों के आधार पर न्यूज़ स्टोरी भी तैयार की जा रही हैं.
कुछ मशीनों में बच्चों के लिए कहानी, कविताएं लिखने का प्रोग्राम भी फ़ीड कर दिया गया है. हालांकि इस प्रोग्राम की बुनियाद पर तैयार होने वाली कहानियां और कविताएं ऊटपटांग ही होती हैं, लेकिन कला के लिहाज़ से अद्भुत होती हैं.
फ़ेसबुक चैटबॉट के साथ जब बात की जाती है तो वो अपनी ही भाषा में बात शुरू कर देते हैं.
एम फ़ॉर मशीन लर्निंग
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनों की डिज़ाइनिंग ऐसी हैं कि वो इंसान की तरह जानकारियां इकट्ठा करें. इंसान एक दो मिसालों की मदद से किसी भी बात या वस्तु के बनाने के पैटर्न को सीख लेता है.
वहीं मशीन को एक छोटी सी चीज़ सिखाने के लिए ढेर सारा डेटा फीड करना पड़ता है.
वैज्ञानिक मशीनों को ज़्यादा से ज़्यादा एडवांस बनाने के लिए ऐसे एल्गोरिदम तैयार कर रहे हैं जिनके फ़ीड होने के बाद मशीन इंसानी दिमाग़ की तरह सोचना शुरू कर देगी.
ओ यानी ओरेकल यानी भविष्यवक्ता
मशीनें, इंसान की नज़र से तेज़ काम करती हैं. आर्टिफ़िशयल इंटेलिजेंस की मदद से आंखों की बीमारियां और कैंसर जैसी बीमारियों के लक्षण उसके पनपने के पहले ही भांप लिए जाते हैं.
यहां तक कि अल्ज़ाइमर जैसी बीमारी की भविष्यवाणी भी की जा सकती है. डॉक्टरों को इस तकनीक से काफ़ी मदद मिल रही है.

इमेज स्रोत, Getty Images
पी यानी पुलिसिंग
दुनिया भर में अपराधियों को पकड़ने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है. मिसाल के लिए ब्रिटेन में अपराधियों के चेहरे के किसी हिस्से की पहचान के ज़रिए उन्हें पकड़ने का प्रयोग किया जा रहा है.
साथ ही आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से कोर्ट को फ़ैसला करने में आसानी हो रही है. कोर्ट को ये फ़ैसला करने में आसानी हो रही है कि किसी अपराधी को ज़मानत पर रिहा किया जाए या नहीं.
क्यू यानी क्वेक यानी ज़लज़ला
भूकंप ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसकी भविष्यवाणी असंभव है. लेकिन, अब ऐसी मशीनें बनाई जा रही हैं जो भूकंप के बाद आने वाले झटकों की जगह बता सकती हैं. इससे बड़ा नुक़सान रोकने में मदद मिलेगी.
आर फ़ॉर रैप
विदेशों में संगीत की दुनिया में अजीब चलन है. गानों के बीच में तेज़ गति से डायलॉग बोले जाते हैं.
इसे सरल भाषा में रैप कहते हैं. रैप इतनी तेज़ी से बोला जाता है कि इसके बोल आसानी से पकड़ में नहीं आते. लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से इस काम को आसान बनाने की कोशिश की जा रही है.

इमेज स्रोत, Getty Images
एस यानी स्मार्ट होम
जो देश तकनीकी रूप से ज़्यादा एडवांस हैं, वहां घर के बहुत से काम मशीन की मदद से हो रहे हैं.
ऐसे देशों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से उन मशीन को ऑन-ऑफ़ किया जा सकता है, जिनके इस्तेमाल की ज़रूरत नहीं है.
टी यानी टुरिंग टेस्ट
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का दायरा मापने के लिए टुरिंग टेस्ट सबसे विश्वसनीय माना जाता है. इस टेस्ट के मुताबिक़ मशीन की क़ाबिलियत की बुनियाद है कि वो किस हद तक बातों के ज़रिए इंसान को बेवकूफ़ बना सकती हैं.
चैट बॉट के ज़रिए ये काम हो भी रहा है. लेकिन बहुत से जानकार इस टेस्ट को सही नहीं मानते. उनके मुताबिक़ कॉपी करने की बुनियाद पर किसी मशीन की अक़्लमंदी का अंदाज़ा लगाना उचित नहीं है.
वी यानी वाइनयार्ड
यूरोप और अमरीका में किसानों की मदद के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जा रहा है. अंगूर की खेती में इसका ख़ूब इस्तेमाल हो रहा है.
इस काम में रोबोट की मदद ली जा रही है. रोबोट में ऐसा प्रोग्राम फ़ीड किया जाता है जो पता लगा लेता है कि शराब के लिए कौन से अंगूर सबसे बेहतर हैं. और कौन सी फसल कटने के लिए तैयार है.
डब्ल्यू यानी वाइल्डलाइफ
जंगलों में भारी मात्रा में क़ीमती संपदा मौजूद है, जिसकी बड़े पैमाने पर चोरी और तस्करी होती है. दुर्लभ जाति के जानवरों का शिकार भी ख़ूब होता है. हालांकि इस पर नज़र रखने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल काफ़ी समय से हो रहा है, लेकिन पूर्वी अफ़्रीक़ा के घने जंगलों में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से नज़र रखी जा रही है. इसकी वजह से हाथीदांत, बारह सिंघे और गैंडों के सींगों की तस्करी रोकने में काफ़ी मदद मिली है.

इमेज स्रोत, Getty Images
एक्स यानी एक्स-रेटेड
इंसान की जिस्मानी ज़रूरतें पूरा करने में भी मशीनें अहम किरदार निभा रही हैं और सेक्स इंडस्ट्री में इनका बड़ा रोल है.
सेक्स के नाम पर शोषण भी ख़ूब होता है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से अब इस पर रोक लगाने की कोशिश की जा रही है.
वाई यानी यमी या यकी
अगर रसोई में खाना बनाने का मन ना हो तो इसके लिए भी अब आपके पास विकल्प हैं. आप आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के ज़रिए खाना बना सकते हैं.
हां इतना ज़रूर है कि वो खाना बिल्कुल आपके हाथ वाला स्वाद शायद ना दे पाए. लेकिन पेट भरने का साधन तो हो ही जाएगा.
ज़ेड यानी ज़ू
न्याला हिरन गर्म जंगलों में पाया जाने वाला जानवर है जो कि दक्षिण अफ़्रीक़ा के जंगलों में पाया जाता है. लिहाज़ा सर्दी का मौसम उसके लिए मुसीबत बन जाता है.
इंग्लैंड के विन्चेस्टर के मार्वेल चिड़ियाघर में सर्दी के मौसम में इसके लिए खास इंतज़ाम किए जाते हैं. यहां ऐसे सेंसर वाले हीटर लगाए जाते हैं जो इस जानवर के शरीर की ज़रूरत के मुताबिक़ उसके लिए माहौल तैयार कर देते हैं. ये काम भी मशीनों की मदद से ही हो रहा है.
और, इस तरह से आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी मशीनी अक़्ल की एबीसीडी पूरी हुई.















