बुरी ख़बरें लगातार क्यों आने लगती हैं?

इमेज स्रोत, GETTY
- Author, विलियम पार्क
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
अक्सर हम ये महसूस करते हैं कि जब बुरी ख़बरें आना शुरू होती हैं, तो उनकी बाढ़ सी आ जाती है. ये महज़ इत्तेफ़ाक़ होता है या इसके पीछे कोई क़ुदरती वजह?
मसलन पिछले दिनों तुर्की के शहर इस्तांबुल से बांग्लादेश की राजधानी ढाका और इराक़ की राजधानी बग़दाद तक से बेगुनाहों के क़त्ल की ख़बरें आईं. ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का फ़ैसला कर लिया. वहां के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
इंग्लैंड की फुटबॉल टीम के मैनेजर को भी कुर्सी छोड़नी पड़ी. यही नहीं ब्रिटेन की पार्टी यूकिप के अध्यक्ष, बीबीसी के शो टॉप गियर के होस्ट और ब्रिटेन की लेबर पार्टी के 63 अहम सदस्यों ने अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया.

इमेज स्रोत, ALAMY
बुरी ख़बरों का दौर यहीं नहीं थमा. अमरीका में हराम्बे नाम के गोरिल्ला को गोली मार दी गई, क्योंकि उससे एक बच्चे को ख़तरे की आशंका था. वहीं अमरीका के ही फ्लोरिडा में एक मगरमच्छ दो साल के बच्चे को खा गया. इंटरनेट पर तमाम सेलेब्रिटीज़ की मौत की अटकलें भी लगाई जाती रहीं.
बुरी ख़बरों की इतनी सुर्ख़ियां ये इशारा करती हैं कि हम असल में बुरी ख़बरें ही सुनने के आदी हो गए हैं.
इत्तेफ़ाक़ की बात मानने से इन्कार करने वाले ये कहते हैं कि दुनिया इतनी बड़ी है. अरबों लोग रहते हैं. किसी न किसी के मरने की हर पल ख़बर आती ही रहेगी.

इमेज स्रोत, GETTY
अमरीका की वर्जिनिया यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफेसर बर्नार्ड बीटमैन कहते हैं कि आप किसी सिक्के को हज़ार बार उछालेंगे तो सात-आठ बार हेड भी आएगा और कई बार ऐसा होगा कि ये लगातार आ सकता है. इसमें चौंकाने वाली बात क्या है? चौंकाने वाली बात तो तब होती जब आठ बार सिक्का उछाला जाता और हर बार हेड ही आता.
बर्नार्ड कहते हैं कि दुनिया में रोज़ हज़ारों विमान उड़ान भरते हैं. कई हादसे के शिकार भी होते हैं. मगर एक बड़ा विमान हादसा हुआ नहीं कि लोगों को लगता है कि कई विमान हादसे होने वाले हैं. लोगों को हवाई सफ़र से डर लगने लगता है. इसका ये मतलब नहीं है न कि अचानक की हवाई सफर बहुत ख़तरनाक हो गया है.
इत्तेफ़ाक़ की बात से इन्कार करने वाले यही तर्क देते हैं कि इंसानों की इतनी बड़ी आबादी में तमाम हादसे होने लाजिमी हैं. इनका एक दूसरे से ताल्लुक़ तलाशना ठीक नहीं. ये अचानक हुई घटनाएं होती हैं. लोग इनमें इत्तेफ़ाक़ी ताल्लुक़ खोजने लगते हैं.
इसके लिए लोग टेलीफोन के आविष्कार की मिसाल देते हैं. 14 फरवरी 1876 को अलेक्ज़ेंडर बेल और एलिशा ग्रे, दो लोगों ने अलग अलग जगहों पर टेलीफ़ोन के पेटेंट की अर्ज़ी लगाई. उन दोनों की मशीन में कई समानताएं थीं. कुछ फ़र्क़ भी था. मगर ये बेहद मामूली था. दोनों ही बरसों से ये मशीन बनाने के लिए रिसर्च कर रहे थे. ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि दोनों ने एक ही दिन में अपनी अपनी मशीनों के पेटेंट की अर्ज़ी लगाई. क्योंकि उस दौर में कई लोग एक मशीन के ज़रिए लोगों के बीच बात कराने का ज़रिया तलाशने की कोशिश कर रहे थे.

इमेज स्रोत, National Archives and Records Administration
इस साल तमाम सेलेब्रिटी की मौत की ख़बरों के बारे में भी यही कहा जा सकता है. बीबीसी के श्रद्धांजलि संपादक निक सर्पेल कहते हैं कि 2016 के पहले तीन महीनों में कई बड़े कलाकारों की मौत की ख़बर आई. इनमें डेविड बोवी से लेकर प्रिंस तक शामिल हैं. एक जनवरी से 31 मार्च 2016 के बीच 24 सेलेब्रिटीज़ की मौत की ख़बर पश्चिमी मीडिया मे आई. साल 2012 में इन्हीं तीन महीनों में केवल पांच सेलेब्रिटी़ज़ की मौत की ख़बर आई थी.
निक सर्पेल कहते हैं कि आबादी बढ़ने, सोशल मीडिया की पहुंच की वजह से आज सेलेब्रिटीज़ की तादाद काफ़ी बढ़ गई है. साठ और सत्तर के दशक में मशहूर हुए लोग आज सत्तर और अस्सी की उम्र के हो रहे हैं. इस उम्र में लोगों की मौत होती ही है. अब ज़्यादा सेलेब्रिटीज़ हैं तो मौत की ख़बरें भी ज़्यादा आएंगी.
1951 में एक अजीबो-ग़रीब इत्तेफ़ाक़ हुआ. अमरीका और ब्रिटेन में एक कॉमिक सीरीज़ छपी. दोनों में एक लड़का था और उसका एक साथी कुत्ता था. दोनों के मिलकर शरारतें करने की कहानी इस सीरीज़ में थीं. इत्तेफ़ाक़ सिर्फ़ यही नहीं था. दोनों का नाम भी एक ही रखा गया था, 'डेनिस द मेनास'. अमरीका और ब्रिटेन में छपी इन कॉमिक सीरीज़ में कोई ताल्लुक़ नहीं था. दोनों का एक सी कहानी और एक ही नाम होना असली वाला इत्तेफ़ाक़ था.

इमेज स्रोत, Thinkstock
बर्नार्ड बीटमैन इसे ज़माने के चलन का ज़ोर कहते हैं. वो कहते हैं कि हर दौर में कुछ ख़ास चीज़ों का, कुछ ख़ास तरह की बातों का चलन हो जाता है. ये कॉमिक सीरीज़ उसी चलन की देन थी. कॉमिक सीरीज़ तैयार करने वाले एक ही दौर के सदस्य थे. वो समाज में चल रही सोच की बुनियाद पर ही कहानी बुन रहे थे. और समाज में एक जैसी सोच ही थी. वो अमरीका में भी वैसी ही थी और ब्रिटेन में भी.
बर्नार्ड की बात सच के क़रीब मालूम होती है.
हम अक्सर देखते हैं कि हर दौर में एक तरह की ख़बरें आनी शुरू होती हैं. संपादक भी अपने रिपोर्टर्स से उस चलन के हिसाब से ख़बरें लाने को कहते हैं. फिर वो अपराध की ख़बरें हों या सेलेब्रिटीज़ के बारे में. ये ज़माने का चलन ही है.
अक्सर लोग ये भी सोचते हैं कि बुरी ख़बर कभी अकेले नहीं आती. अपनी इस सोच को सही साबित करने के लिए हम ऐसी घटनाओं को जोड़ने लगते हैं जिनका दूर-दूर तक आपस में ताल्लुक़ नहीं होता.
तो, अगली बार जब बुरी ख़बरें आने का सिलसिला शुरू हो, तो ये समझिएगा कि ये इत्तेफ़ाक़ नहीं, ये हमारी सोच का नतीजा है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.com/future/story/20160708-why-true-coincidences-are-hard-to-find" platform="highweb"/></link> करें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी फ्यूचर</caption><url href="http://www.bbc.com/future" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक कर</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












