रौशनी से रौशन होता कला का संसार

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कला को किसी भी रूप में पेश किया जा सकता है. कभी रंगों की मदद से तो कभी पत्थरों को तराशकर. या फिर कभी रौशनी की मदद से. चौंक गए न! जी हां, रौशनी की मदद से भी कला का मुज़ाहिरा किया जा सकता है.
दुनिया में ऐसे बहुत से कलाकार हैं जिन्होंने रौशनी की मदद से एक से एक कला रची है. अभी हाल ही में एक किताब आई है. इसका नाम है, 'सिक्स फैसेट्स ऑफ लाइट'. यानी रौशनी के छह चेहरे. इसे लिखा है एन रो ने.
वो इसे रौशनी के नाम प्यार का गीत कहती हैं. इस किताब का ख़्याल उन्हें उस वक़्त आया जब वो इंग्लैंड मे ब्राइटन और ईस्टबोर्न के बीच स्थित कला की एक नुमाइश देख रही थीं. इस चमकदार नुमाइश का नाम है 'डाउन्स'.
इसमें टर्नर और एरिक रैविलियस जैसे पेंटर्स और कूलरिज जैसे कवियों की रचनाओं को दिखाया गया है. इन सभी ने अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा रौशनी का पीछा करते हुए बिताया.

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अगर एन की किताब में दर्ज रौशनी के क़िस्सों को एक ख़ास नज़रिए से देखें तो पता चलता है कि रौशनी, सदियों से कलाकारों को नई रचना के लिए प्रेरित करती रही है.
सत्रहवीं सदी में फ्रेंच कलाकार क्लॉड ने सुबह और शाम के वक़्त की सूरज की किरणों की बड़े सलीक़े से नक़ल करके तमाम रचनाएं कीं. इसी तरह डच पेंटर पीटर डे हूच ने रौशनी की वजह से बनते सायों को ख़ूबसूरती से अपनी रचनाओं में उकेरा था. इसी तरह ब्रिटिश कलाकार टर्नर के रौशनी के साथ प्रयोग मशहूर हैं.
बीसवीं सदी में फ्रेंच कलाकार हेनरी मातिसे ने दुनिया भर का दौरा करके रौशनी से कला की रचना की प्रेरणा ली. 1912 में जब वो मोरक्को गए तो बारिश के चलते क़रीब पंद्रह दिन अपने होटल के कमरे से नहीं निकल सके. सूरज की कमी उन्हें बहुत खली.
उन्होंने अपने दोस्त को ख़त लिखकर अपनी तकलीफ़ बयां की. अगले कुछ सालों में उन्होंने प्रशांत महासागर के द्वीप ताहिती से लेकर अमरीका के न्यूयॉर्क शहर तक कई जगह का दौरा किया. हर जगह की रौशनी को लेकर उनका अलग ख़याल था. जैसे कि न्यूयॉर्क की रौशनी को हेनरी ने क्रिस्टल जैसी बताया. वो रौशनी के इश्क़ में मुब्तिला मालूम होते थे.

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बहुत से कलाकारों ने रौशनी की ख़ूबियों को पेंटिंग में उतारा. बीसवीं सदी में तो कई कलाकार सिर्फ़ रौशनी से ही आर्ट रचने लगे. इसके अगुवा अमरीका के डैन फ्लैविन माने जाते हैं. इनकी एक नुमाइश हाल ही में बर्मिंघम की आइकन गैलरी में लगी थी.
न्यूयॉर्क में जन्मे फ्लैविन को उनके पिता पादरी बनाना चाहते थे. लेकिन ख़ुद फ्लैविन के इरादे कुछ और ही थे. उन्होंने पढ़ाई तो इतिहास की की. मगर ख़ुद की कोशिशों से बन गए पेंटर.
फ्लैविन को बड़ी कामयाबी मिली, साठ के दशक में जब उन्होंने सफ़ेद या रंगीन लाइट की मदद से कला की रचना की. जैसे कि उनकी मशहूर कला पिंक, जिसमें उन्होंने ग़ुलाबी लाइट की मदद से एक नई रचना पेश की थी. इसकी नुमाइश आज भी ब्रिटेन की आइकन आर्ट गैलरी में की गई है.
रौशनी से बनाई अपनी कला को फ्लैविन ने अक्सर ग़ैरपरंपरागत जगहों पर प्रदर्शित किया है. जैसे कि सीढ़ियों पर या किसी हाल के बीच में. उनकी चमकदार रचनाएं बरबस लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचती हैं.

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कला की दुनिया के जानकारों की नज़र में फ्लैविन की आर्ट आध्यात्म की दुनिया से जुड़ी मालूम होती है. हालांकि ख़ुद फ्लैविन इस बात का पुरज़ोर विरोध करते थे. वो कहते थे कि रौशनी एक सच्चाई है. और इसे ऐसे ही देखा जाना चाहिए. इसमें किसी रहस्य की तलाश बेमानी है. फ्लैविन कहते थे कि उनकी कला ट्यूब या फिटिंग नहीं है. ये तो रौशनी है. बत्ती बुझा दीजिए और कला ख़त्म.
इसी तरह रॉबर्ट रौशेनबर्ग ने जलने-बुझने वाली लाइट्स के इस्तेमाल से अपनी बात कहने की कोशिश की थी. पचास से दशक में लाइट से बनी उनकी कलाकृति कंबाइन काफ़ी चर्चित हुई थी. इसी तरह साठ के दशक में फ्रांस के मार्शल रेशे ने नियॉन लाइट्स का अपनी कला में इस्तेमाल किया. बरसों बाद ट्रेसी एमिन ने भी नियॉन लाइट्स की मदद से रचनाएं कीं.
मार्शल के हमवतन फ्रांस्वा मॉर्ले भी मशहूर लाइट आर्टिस्ट हैं. इसी तरह अमरीकी कलाकार जेम्स टरेल भी बल्ब और नियॉन लाइट्स के इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं.
उन्होंने स्काईस्पेस के नाम से अब तक लाइट की मदद से अस्सी से ज़्यादा कलाकृतियां बनायी हैं. इनमें ख़ास तौर से बनाए गए चैम्बर्स में लोग छत पर एक ख़ाली जगह से आसमान को निहार सकते हैं.

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लाइट का इस्तेमाल करने वाले ब्रितानी कलाकार एंथनी मैक्काल भी हैं. वो कहते हैं कि जेम्स टरेल के काम में वो आर्ट तलाशने की कोशिश करते हैं. वो बताते हैं कि टरेल की रचनाओं में जो ख़ाली जगह होती है. असल में वो एक फ्रेम होता है. बाक़ी सारी चीज़ें उस फ्रेम के पीछे होती हैं, जो अपनी गवाही ख़ुद देती हैं. वो अपनी रचनाओं को शिल्पकला का नाम देते हैं.
वैसे मैक्काल सत्तर के दशक में अपनी ठोस लाइट से बनी कला के लिए मशहूर हुए थे. 1973 में उनकी कोन नाम की रचना बड़ी मशहूर हुई थी जिसमें एक अंधेरे कमरे में प्रोजेक्टर से एक सफ़ेद रौशनी निकलती है. जो दीवार से जुड़े एक गोल खंभे से जाकर टकराती है. जैसे जैसे रौशनी आगे बढ़ती है ये माहौल में मौजूद धूल और धुएं पर पड़ती है. इससे एक ख़ाली, भुतहे कोने का आभास होता है.
सत्तर के दशक में मैक्काल ने ऐसी छह और कलाकृतियां रौशनी की मदद से गढ़ीं. फिर उन्होंने कला की दुनिया छोड़कर कारोबार शुरू कर दिया. बाद में नब्बे के दशक में वो कला की दुनिया में फिर लौटे.

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आज वो एक बार फिर रौशनी की मदद से रचनाएं गढ़ रहे हैं. इनकी नुमाइश स्टॉकहोम से लेकर सैन फ्रैंसिस्को तक हो रही है. हर रचना मानो एक कविता कहती है. किसी में दर्द होता है. किसी में तकलीफ़ बयां होती है. हालांकि वो किसी रचना में आध्यात्म खोजने के विरोधी हैं.
मैक्काल कहते हैं कि वो लोगों से जानना चाहेंगे कि उन्हें मैक्काल की रचना में क्या दिखा. वो उन लोगों का काम है. बनाने का काम कलाकार का है. कलाकार ने कोई चीज़ बना दी. वो कुछ-कुछ बढ़ई या फिर नल का काम करने वाले जैसा है. अब आम लोगों का काम होता है उसे देखना और समझना.
वैसे वो मानते हैं कि रौशनी को हमेशा से ही आध्यात्म की दुनिया से जोड़ा जाता है. तो जो लोग रौशनी से बनी रचनाएं देखते हैं उनमें आध्यात्म की तलाश करते हैं. इससे उन्हें रोका नहीं जा सकता.
जब मैक्काल से ये पूछा गया कि आख़िर रौशनी से बनी आर्ट को कौन सा रूप धरना चाहिए. तो वो कहते हैं कि रौशनी तो रौशनी है. वो कोई कला नहीं. हां, आप बत्ती बुझा दें तो वो आर्ट हो सकती है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां पढ़ें</caption><url href="http://www.bbc.com/culture/story/20160504-the-radiant-beauty-of-art-made-from-light" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कल्चर</caption><url href="http://www.bbc.com/culture" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)
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