चरमपंथ का गढ़ बन गया है पाकिस्तानी पंजाब

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- Author, मोहम्मद आमिर राणा
- पदनाम, विश्लेषक, इस्लामाबाद
पाकिस्तानी के पंजाब प्रांत में आतंकवाद और चरमपंथ का ज़ोर तेजी से बढ़ रहा है.
इस इलाक़े की अच्छी खासी सीमा भारत से लगी हुई है, हालांकि पाकिस्तान की सरकार के लिए ये ज़्यादा सिरदर्द बने हुए हैं.
जब पाकिस्तानी पंजाब में चरमपंथ की बात आती है तो सुई दक्षिणी पंजाब पर आकर टिक जाती है. लेकिन जिन प्रमाणों और सबूतों के आधार पर इसे चरमपंथ का गढ़ माना जाता है, वो कारक पूरे प्रांत में मौजूद हैं.
आमतौर पर माना जाता है कि ज़्यादातर चरमपंथी संगठन, दक्षिणी पंजाब में केंद्रित हैं. लेकिन तथ्य यह है कि इन संगठनों का नेटवर्क पूरे राज्य में फैला हुआ है.
अगर केवल इन संगठनों के केंद्रीय कार्यालयों पर नज़र डाली जाए तो उनकी संख्या भी पूरे प्रांत में समान रूप से फैली मिलेगी.
प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा के मुख्य कार्यालय मध्य पंजाब, पूर्व हरकतुल मुजाहिदीन के कार्यालय इस्लामाबाद और रावलपिंडी के बीच स्थित हैं.

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प्रतिबंधित सिपाहे सहाबा का नेटवर्क लाहौर, झंग, टोबा टेक सिंह और कराची में फैला है, लेकिन प्रतिबंधित जैश-ए-मोहम्मद ने बहावलपुर को अपना केंद्र बनाया हुआ है.
अगर धार्मिक दलों के फैलाव को देखा जाए तो उनका असर मध्य पंजाब में अधिक है.
लाहौर को धार्मिक आधार पर काम करने वाले दलों की राजधानी कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. यहां छोटे-बड़े 180 धार्मिक दल काम कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश के केंद्रीय कार्यालय इसी शहर में मौजूद हैं.
मदरसों और मस्जिदों के प्रसार को भी धार्मिक चरमपंथ के प्रसार के एक कारक के रूप में देखा जाता है.
अगर यह पैमाना मान लिया जाए तो चरमपंथ को किसी एक क्षेत्र में केंद्रित नहीं माना जा सकता है.
नए मदरसों और उनके प्रसार के दो पैटर्न हैं. ये बड़े शहरी और औद्योगिक केंद्रों के आसपास तेजी से फैलते हैं या बड़े राजमार्गों के साथ.
कारण स्पष्ट है कि धार्मिक संस्थाओं को चलाने के लिए जिन संसाधनों की ज़रूरत होती है, वो यहीं से मिलते हैं.

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सभी संप्रदायों के बड़े मदरसे कराची, लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, गुजरांवाला, फ़ैसलाबाद और मुल्तान में अधिक केंद्रित हैं.
छोटे शहरों में अगर बड़े मदरसे हैं भी तो या तो वो लंबे समय से हैं या वहां छात्रों की संख्या काफी कम है.
लेकिन यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि बड़े शहरों और औद्योगिक केंद्रों के पास स्थित मदरसों में स्थानीय छात्रों और शिक्षकों की संख्या कम है.
अगर केवल लाहौर और फ़ैसलाबाद के मदरसों को देखा जाए तो वहां क्रमशः आदिवासी क्षेत्रों, कश्मीर और पंजाब के छात्र अधिक दिखेंगे.
इस पृष्ठभूमि में इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि मुख्य रूप से पंजाब के दक्षिणी क्षेत्र चरमपंथियों की भर्ती के केंद्र बने हुए हैं.
अस्सी और नब्बे के दशक तक यह बात कुछ हद तक सही कही जा सकती थी. इसकी वजह हरकतुल मुजाहिदीन, हरकतुल जिहादे इस्लामी, सिपाहे सहाबा जैसे संगठनों की इन क्षेत्रों में विशेष सरगर्मी थी, लेकिन इसी दौरान जमात-ए-इस्लामी की सोच से जुड़े संगठनों के लिए मध्य और उत्तरी पंजाब भर्ती के लिहाज से अधिक मुफ़ीद थे.
तो फिर आतंकवाद की चर्चा में पंजाब क्यों महत्वपूर्ण है?

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इसकी एक और वजह गरीबी और पिछड़ापन बताई जाती है, लेकिन ऐसे ही कारक न केवल आंतरिक सिंध और बलूचिस्तान में अधिक मौजूद हैं बल्कि मध्य और उत्तरी पंजाब के कई ग्रामीण ज़िले ऐसे ही हालात का सामना कर रहे हैं.
रहीम यार ख़ान और राजनपुर के डेल्टाई क्षेत्रों में आपराधिक गिरोहों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन से इस राय को काफी बल मिला है कि पंजाब में ऐसे इलाक़े मौजूद हैं जो कानून की जद से दूर हैं और वहां अपराधी, राष्ट्र विरोधी और चरमपंथी अपनी पनाहगाह बना लेते हैं लेकिन ऐसे क्षेत्र रावी और चिनाब के बीच भी मौज़ूद हैं.
पाकिस्तानी पंजाब में चरमपंथ और उग्रवाद की चुनौती बहुत महत्वपूर्ण है. उसे किसी विशेष इलाक़े से जोड़कर नहीं देखा जा सकता.
इसे समझने के लिए दो कारण मुख्य हैं.
पहला, प्रतिबंधित संगठनों के बारे में आम लोगों की सोच से संबंधित है. ये संगठन सांप्रदायिक और सैन्य प्रकृति के हैं.
इन संगठनों का दावा है कि वे पाकिस्तान के अंदर आतंकवाद में लिप्त नहीं हैं बल्कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ राज्य के सहायक हैं. लेकिन ये संगठन अलकायदा, इस्लामिक स्टेट, तालिबान पाकिस्तान, जमाते-अल-अहरार और लश्करे झांगवी जैसे चरमपंथी समूहों की दो तरह से मदद करते हैं.

प्रतिबंधित संगठन न केवल चरमपंथी समूहों को ताक़त देने में सहायक हैं बल्कि चरमपंथियों को इन संगठनों से बल भी मिलता है.
न तो इनका संगठनात्मक नेतृत्व और न ही सरकार, प्रतिबंधित संगठनों और चरमपंथी समूहों के बीच संबंधों को समाप्त या कमज़ोर कर पाई है.
दूसरे पहलू का संबंध राज्य की नीति से है और सरकार अभी असमंजस की स्थिति में है.
क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए चरमपंथी समूहों के ख़िलाफ़ रणनीति में हमेशा एक बुनियादी ग़लती रह जाती है, वो है चरमपंथी गुटों का प्रतिबंधित संगठनों के साथ संबंध.
कुछ मामलों में चरमपंथ विरोधी उपलब्धियां इसलिए प्रभावी नहीं हो सकतीं कि वो अपने अभियान का दायरा प्रतिबंधित संगठनों तक नहीं फैला सकते.

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सरकार इन संगठनों की सड़क पर उतरने की क्षमता और राजनीतिक प्रभाव से अधिक उनकी हिंसक प्रतिक्रिया से डरती है. स्थिति उस समय अधिक गंभीर हो जाती है जब ये प्रतिबंधित संगठन आज भी ख़ुद को राज्य के लिए मददगार के रूप में पेश करते हैं.
सरकार भी इस धारणा को दूर करने की कोशिश नहीं करती है.
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