'मैं जीते जी नरक भोगती रही'

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जोआना गियानॉली जब पैदा हुईं तो उनका गर्भाशय और योनि का अंदरुनी हिस्सा नहीं था.
वो रॉकिटिन्स्की सिंड्रोम की शिकार हैं. ये सिंड्रोम लगभग हर 5000 में से एक महिला को होता है.
गर्भ न होने और योनि से जुड़ी परेशानी के कारण 27 साल की जोआना को कई तरह की शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक परेशानियों से जूझना पड़ा.
बीबीसी के हैरी लो को उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई.
जब मैं पहली बार डॉक्टर के पास गई तब मेरे पिता ने तो हालात का बहादुरी से सामना किया लेकिन मां ऐसा नहीं कर पाईं.
मां को लगता था कि उनसे गर्भावस्था के दौरान कोई ग़लती हो गई है. मैंने उन्हें समझाया था कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया था, यह तो बस जीन्स की वजह से हुआ था.

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मैं तब 14 साल की थी. मां मुझे हमारे पारिवारिक डॉक्टर के पास ले गई. क्योंकि मेरा मासिक धर्म शुरू नहीं हुआ था. लेकिन उन्होंने मुझे देखने से इनकार कर दिया क्योंकि वह मेरे निजी अंगों को नहीं छू सकते थे.
फिर जब मैं 16 की हुई तो उन्होंने मुझे जांच के लिए एक अस्पताल में भेजा. वहां पता चला कि मेरा योनि मार्ग तो है ही नहीं. उन्होंने बताया कि मैं रॉकिटिन्स्की सिंड्रोम से पीड़ित हू.

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रॉकिटिन्स्की सिंड्रोम का पहला लक्षण तो यह है कि आपको मासिक धर्म नहीं होता. इसके अलावा संपूर्ण योनि तंत्र नहीं होने से आप यौन संबंध नहीं बना सकते.
इसलिए 17 साल की उम्र में मेरा एक बड़ा ऑपरेशन हुआ. डॉक्टरों ने मेरे लिए एक नया योनि मार्ग बना दिया. एथेन्स में यह क्रांतिकारी ऑपरेशन था.
मैं करीब दो हफ़्ते तक अस्पताल में रही. इसके बाद तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ी रही, क्योंकि मैं उठ ही नहीं पा रही थी.
फिर पता चला कि डॉक्टरों ने जो मेरा नया योनि मार्ग बनाया था वह बहुत संकरा और छोटा था. यौन संबंध बनाने के दौरान मुझे बहुत दर्द हुआ.
मेरी योनि में फिर से चीरा लगाना पड़ा ताकि उस रास्ते को सही किया जा सके.
अब मैं शारीरिक रूप से तो ठीक हो गई थी लेकिन भावनात्मक रूप से मेरी परेशानियों का सिलसिला थमा नहीं.
मेरी ये स्थिति एक बोझ की तरह थी. ऐसी किसी चीज़ की तरह जिससे आप छुटकारा नहीं पा सकते.
उस दौरान मेरे साथी मेरी हालत के लिए भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया करते थे. मेरी शारीरिक स्थिति के कारण कई साल तक मेरे स्थायी संबंध नहीं बन पाए.

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मैं लगातार परेशान रहती थी. मेरी खुशी, सुकून सब छिन गया था. स्थायी संबंध बनाने के अवसर छिन गए थे. मैं एक ऐसे शून्य में थी जिसे भरा नहीं जा सकता था. गुस्सा, अवसाद, शर्मिंदगी, अपराधबोध मेरे साथी थे.
अधिकांश लोग मेरे बारे में नहीं जानते थे. मैं इसे एक राज़ रखना चाहती थी.
पर मां ने परिवार के सदस्यों को इस बारे में बता दिया. मुझे बहुत अच्छा नहीं लगता क्योंकि लोग आप पर दया करते हैं. मैं नहीं चाहती कि लोग मेरे ऊपर तरस खाएं.
मैं मर नहीं रही हूं, मैं ख़तरे में भी नहीं हूं. फिर भी लोग ऐसी दया भरी सूरत बनाते थे कि इससे मुझे खुद को लेकर दुख होने लगता था.
मैं इस बारे में बात नहीं कर सकती थी क्योंकि एथेन्स में या आमतौर पर ग्रीस में लोग सचमुच संकुचित सोच वाले हैं. कई बार तो ऐसा लगता था कि मैं मध्यकालीन युग में जी रही हूं.
मुझे यूनान में कोई सपोर्ट ग्रुप नहीं मिला. मुझे एक भी व्यक्ति नहीं मिला जिससे मैं इस बारे में बात कर पाऊं. मैं बात करना चाहती थी.

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यह बहुत बड़ी समस्या थी और इस हालत को झेलने वाली ज़्यादातर महिलाएं सचमुच शर्मिंदा होती हैं. मुझे कुछ महिलाएं मिलीं जो इस बारे में बात करना चाहती थीं लेकिन कुछ समय बाद वह गायब हो गईं क्योंकि वे इससे शर्मिंदा थीं.
बहरहाल अब करीब 10 साल बीत चुके हैं. हालांकि मुझे अब भी इस बारे में ख़राब लगता है लेकिन अब मैं शर्मिंदा नहीं हूं.
और अब मुझे यह भी समझ में आ गया है कि मैं इसे बदल नहीं सकती. मुझे इसे स्वीकार करना होगा और इसके साथ जीना सीखना होगा.
मेरा पुनर्जन्म हुआ था. इसने मुझे एक नई ज़िंदगी, एक नई पहचान दी है. मेरी ज़िंदगी की दिशा बदल दी.
अब मैं हर दिन को जीती हूं. मैं भविष्य के लिए कोई योजना नहीं बनाती क्योंकि मुझे पता नहीं कि मैं ज़िंदा रहूंगी भी या नहीं.
मैं मां बनना चाहूंगी. चाहे वह जैविक ढंग से हो, सरोगेट मां हो या एक फ़ॉस्टर मां.

आज इस बारे में बात करते हुए मुझे लगता है मैं इससे आज़ाद हो गई हूं.
आज मैं हर उस औरत की मदद करना चाहूंगी जिसे यह समस्या है. क्योंकि मैंने जीते जी नरक भोगा है.
मुझे शक्ति और हिम्मत इसलिए मिली क्योंकि मैं इस हालत वाली अन्य महिलाओं की मदद करना चाहती हूं.
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