ख़ुद को तुर्रमखां समझने वालों से कैसे निपटें?

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    • Author, मारिया अतानासोव
    • पदनाम, बीबीसी कैपिटल

ऑफ़िस में कई लोग आपको हौसले से लबरेज़, ज़िंदादिल और कई बार नटखट दिखते होंगे. असल में ये लोग आत्मविश्वास से भरे लोग हैं. उन्हें लगता है कि हर काम वे चुटकी बजाते ही कर लेंगे.

मगर कई बार ये आत्मविश्वास घमंड में बदल जाता है. घमंड इस बात का कि मुझे तो सब आता है. गुरूर इस बात का कि मेरे पास हर मुश्किल का हल है. अहंकार इसलिए कि हर आदमी मुझसे ही मदद मांगता है.

आत्मविश्वास और घमंड में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं होता. और जैसे ही कोई व्यक्ति घमंड दिखाना शुरू करता है , दफ़्तर में लोग उससे कन्नी काटने लगते हैं. कोई भी घमंडी इंसान के साथ काम नहीं करना चाहता.

आख़िर ऐसे लोगों से कैसे निपटा जाए? हमने सवाल-जवाब वाली वेबसाइट क्वोरा के सदस्यों से जवाब जानने की कोशिश की.

कुछ लोगों को लगता है कि मेरे ही पास हर समस्या का हल है.

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इमेज कैप्शन, कुछ लोगों को लगता है कि मेरे ही पास हर समस्या का हल है.

क्वोरा की सदस्य एंजी नीक कहती हैं कि जैसे लोगों को सांस लेने के लिए हवा की ज़रूरत होती है, वैसे ही घमंडी इंसान तवज्जो चाहता है. उन्हें हर वक़्त ख़ुद की तारीफ़ सुनना पसंद होता है. अगर आप ऐसा नहीं करते तो, या तो आप उनसे दूर हो जाइए, या फिर बहस में घंटों का वक़्त गंवाइए. क्योंकि वो बात नहीं करते, हमेशा बहस करते हैं.

सुरेटा विलियम्स का कहना है कि जो वाक़ई महान होते हैं, उन्हें दूसरों पर रोब गांठने की ज़रूरत नहीं होती.

घमंडियों के बारे में एना बटलर के ख़्याल अलग हैं. उनका मानना है कि घमंडी अकसर बेहद क़ाबिल इंसान होते हैं. वे होशियार और कामयाब होते हैं. उन्हें ये भी लगता है कि अपनी लगन, मेहनत और होशियारी से यदि वो इस मुकाम पर आ पहुंचे हैं तो दूसरे ऐसा क्यों नहीं कर सकते.

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इयान विदरो कहते हैं कि ऐसे लोगों को वहम होता है कि वो बहुत होशियार और कामयाब हैं. ऐसे लोगों से रिश्ता बनाने के लिए ज़रूरी है कि आप या तो उन्हें मूर्ख बनाएं, या उनकी तारीफ़ करें या फिर खुलकर बहस करें. दोनों ही बातों के लिए ज़रूरी है कि पहले आप घमंडी इंसान के गुरूर की वजह समझें.

जिल उचियामा मानती हैं कि घमंड अक्सर किसी विषय के बारे में आपकी आर या पार की राय से आता है. जब आप बीच का रास्ता नहीं जानते, तो आपको लगता है कि 'माइ वे ऑर हाइवे'. मतलब या तो आप सामने वाले की राय मानते हैं या विरोध करते हैं. बीच का कोई नहीं होता. ये बात कई लोगों की शख्सियत में दिखाई देती है, ख़ास तौर से युवाओं के. युवाओं को तो लगता है कि उन्हें ही हर बात की सही जानकारी है.

घमंड करने वालों में समझ और गहराई की कमी होती है. ये कुछ ऐसा है मानों किसी के आंखों पर पट्टी बंधी है, कान में हेडफ़ोन लगा है और ऐसे व्यक्ति को आप कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में आपको तो खीझ होगी ना. क्योंकि सामने वाला तो न कुछ देखेगा और न ही सुनेगा.

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जिल उचियामा के पास ऐसे लोगों से निपटने के लिए तीन नुस्खे हैं.

पहला यह कि आप ऐसे घमंडी इंसान से थोड़ी दूरी बना लीजिए. उसकी बातों को अनदेख़ा कीजिए और चुप रहकर अपना विरोध जताइए.

दूसरा तरीक़ा यह है कि उसकी बात सुनिए और कहिए कि, ठीक है. फिर मुस्कुराते हुए उससे दूर हट जाइए. इससे दोनों के बीच तनाव भी कम होगा.

तीसरा और आख़िरी तरीक़ा यह है कि आप उसका मज़ाक़ बनाइए. व्यंग में कहिए कि, मुझे पता है कि आप सब जानते हैं. फिर भी चलिए खरी-खरी बात कर ली जाए.

कई मामलों में तो घमंडी लोगों को एहसास ही नहीं होता कि उनकी बातों का दूसरों पर कितना बुरा असर पड़ता है.

अंकिता बताती हैं कि ऐसे जाहिलों और घमंडी लोगों से खरी बात की जानी चाहिए. आप उनके बारे में जो भी सोचते हैं, उन्हें खुलकर बताइए. कोई अच्छी चीज़ है तो उसकी तारीफ़ कीजिए. और कमी के बारे में बताते हुए ये सुझाव दीजिए कि इसमें सुधार की ज़रूरत है. उन्हें ये भी कहिए कि कोई बात बोलने से पहले ज़रा सोच-समझ लिया करें.

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अगर आपकी सलाह के बावजूद कोई इंसान अपना बर्ताव नहीं बदलता, तो आपको भी डटकर मुक़ाबला करना चाहिए.

बटलर कहते हैं कि आप ऐसे लोगों का विरोध पुख़्ता तर्क और तथ्यों के साथ कीजिए. वरना मात भी मिल सकती है.

बटलर ने बताया कि उन्होंने कई घमंडी बॉस के साथ काम किया. उनमें से ज़्यादातर बटलर के विरोध का सम्मान करते थे. ख़ास तौर से उन लोगों से ज़्यादा जो उनकी चापलूसी में लगे रहते थे.

आकांक्षा जोशी की सलाह है कि अगर किसी घमंडी से निपटने में सब फॉर्मूले फेल हो जाएं तो उनकी बातों को हंसी में टाल दीजिए.

वे कहती हैं कि उन्हें घमंडी लोगों को देखकर हंसी आती है, जैसे वे किसी कार्टून का किरदार हों. आकांक्षा कहती हैं कि अपने बड़बोलेपन से ऐसे लोग अपनी कमी ख़ुद ही उजागर कर देते हैं.

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उन्होंने अपने ही दफ़्तर में काम करने वाले एक शख़्स के बारे में बताया. आकांक्षा के मुताबिक़ वो ख़ुद को बड़ा अंग्रेज़ीदां समझता था. अंग्रेज़ी के मुश्किल लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करके वह सब पर रोब झाड़ता था. दूसरों के अंग्रेज़ी बोलने के लहजे का मज़ाक़ उड़ाता था.

एक दिन उसने एक साधारण सी बात को इतना घुमा-फिराकर कहा कि सब लोग एक साथ हंस पड़े. आकांक्षा कहती हैं कि उसके बाद उस शख़्स का हौव्वा उनके ज़ेहन से उतर गया.

(अंग्रेज़ी में मूल लेख <link type="page"><caption> यहां</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20160415-the-thin-line-between-self-esteem-and-self-obsession" platform="highweb"/></link> पढ़ें. यह <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल </caption><url href="http://www.bbc.com/capital/" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)

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