'मियां बीवी का एक ही सरनेम हो'

जापान

इमेज स्रोत, AFP getty

जापान के सुप्रीम कोर्ट ने उस क़ानून को बरकरार रखा है जिसके तहत पति-पत्नी का एक ही सरनेम होना ज़रूरी है.

इसे महिला अधिकारों की कार्यकर्ताओं के लिए बड़ी हार माना जा रहा है.

कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये कानून भेदभावपूर्ण है क्योंकि ज़्यादातर दंपती पति के सरनेम ही प्रयोग करते हैं.

सरकारी चैनल एनएचके के मुताबिक, अदालत ने कहा कि ये कानून संविधान का उल्लंघन नहीं करता.

अदालत ने एक अलग कानून पर भी विचार किया जो तलाक के छह महीने के भीतर महिलाओं के दोबारा विवाह पर रोक लगाता है और उसे असंवैधानिक करार देता है.

दोनों ही कानून 19वीं सदी के जापान में माइजी युग में बनाए गए थे जो अब भी चले आ रहे हैं.

जापान

इमेज स्रोत,

जज इत्सुरो टराडा ने कहा कि जापानियों में विवाहपूर्व अनौपचारिक नामों के इस्तेमाल का चलन आम है जिससे ये सरनेम वाला कानून हल्का पड़ जाता है.

उन्होंने कहा कि सांसदों को अब इस पर फैसला लेना होगा कि पति पत्नी के अलग अलग नामों के लिए नया कानून पारित किया जाए या नहीं.

द जापान टाइम्स ने पिछले चालीस सालों के अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि 96 फीसदी से ज़्यादा जापानी दंपति पति के सरनेम का ही इस्तेमाल करते हैं.

तीन महिलाओं और साथ रह रहे एक युगल ने इस केस को दायर किया था. उनका मानना है कि सरनेम वाला कानून पुराना और भेदभावपूर्ण है.

दो निचली अदालतों ने पहले ही इसके खिलाफ फैसला दिया है और इस पर लोगों का मत विभाजित है.

इन दोनों कानूनों पर 1990 के दशक में भी बहस हुई थी और एक सरकारी पैनल ने इन्हें बदलने का सुझाव भी दिया था.

जब रूढ़िवादी राजनेताओं ने इसका विरोध किया तो इनमें कोई बदलाव नहीं किया गया.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां <link type="page"><caption> क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक </caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link>और <link type="page"><caption> ट्विटर </caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link>पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>