13 साल, 37 देश, 46505 मील!

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    • Author, डेव सेमिनारा एवं एली कॉब
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

जेसन लुइस एक दिन अचानक लंदन के अपने घर से निकले. मक़सद था दुनिया की सैर. पर यह सैर कई मायनों में अलग थी. पहली बात यह कि वे बिना किसी मोटर वाहन से सफ़र करने वाले थे. दूसरी यह कि तब उनकी जेब में महज़ 319.20 पाउंड थे.

13 साल के लंबे सफ़र में साइकिल, पैदल चलते और नाव से सफ़र करते हुए जेसन लुइस ने 37 देशों में क़रीब 46,505 मील की यात्रा पूरी की. इसके लिए उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया.

जेसन अपनी इस यात्रा के बारे में कहते हैं, "मैं देखना चाहता था कि मैं अपने बारे में क्या सीख सकता हूं."

उन्होंने इस यात्रा के दौरान दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण पर ज़ोर दिया. उन्हें इस दौरान 37 देशों के 900 स्कूलों में बोलने का मौक़ा भी मिला.

जब<link type="page"><caption> बीबीसी ट्रैवल्स</caption><url href="http://www.bbc.com/travel" platform="highweb"/></link> टीम उनसे मिली, तो उन्होंने भविष्य में अपने नए मिशन की जानकारी दी. अब वे दुनिया भर के आदिम जनजातीय समुदायों को नज़दीक से देखना चाहते हैं.

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शुरुआत तब हुई, जब जेसन महज़ 26 साल के थे. इंग्लैंड में उनका खिड़कियां धोने और कारपेट साफ़ करने का बिज़नेस था. मगर वह दुनिया को अपनी आंखों से देखना चाहते थे.

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लिहाज़ा उन्होंने अपने दोस्त स्टीव स्मिथ के साथ रात के दो बजे बीयर पीते हुए दुनिया की सैर पर जाने की योजना बनाई.

फिर वे संभावित प्रायोजकों को अपनी योजना के बारे में ख़त लिखते रहे. इंग्लैंड में कोई उनकी यात्रा को स्पॉन्सर करने को तैयार नहीं हुआ.

ऐसे में दोनों ने अपने दोस्तों और परिवार वालों से 10 हज़ार पाउंड उधार लिए और मिशन पर निकल पड़े.

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हालांकि बाद में ब्रिटिश चैरिटी काउंसिल फ़ॉर एजुकेशन एंड वर्ल्ड सिटीज़नशिप ने कुछ मदद की और उन्हें यूनेस्को से जोड़ा. यही वजह है कि जेसन को 900 स्कूलों में बोलने का मौका मिला.

अपनी यात्रा में उन्होंने केवल इंसानी क्षमता का इस्तेमाल ही किया.

वे कहते हैं, "मैंने अपना दिमाग़, शरीर और अपने जज़्बे का इस्तेमाल किया. मैंने चीज़ों को रीसाइकिल किया."

जेसन और उनके दोस्त ने यात्रा के लिए कोई तैयारी नहीं की. न इसके लिए ख़ुद को फ़िट बनाया. इसके लिए उन्हें वक़्त ही नहीं मिला.

यात्रा की शुरुआत के बारे में जेसन ने बताया, "हम साइकिल से लंदन से पुर्तगाल तक गए. फिर पैडल बोट से मियामी पहुँचे. इसके बाद रोलर के ज़रिए सैनफ्रांसिस्को. फिर बाइकिंग के ज़रिए सेंट्रल अमरीका के रास्ते से पेरू आए. फिर नाव से सैनफ्रांसिस्को. इसके बाद नाव से ही हवाई द्वीप."

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हवाई द्वीप के बाद की यात्रा के बारे में जेसन बताते हैं, "हम हवाई द्वीप से पैडल बोट के ज़रिए ऑस्ट्रेलिया तक पहुँचे. इसके बाद नाव से सिंगापुर, फिर नाव से ही इंडोनेशिया और भारत. पैडल बोट के ज़रिए अफ्रीका गए और फिर वहां से साइकिलिंग करते हुए मध्य पूर्व के देशों के रास्ते फ़्रांस जा पहुँचे. फिर पैडल बोट के ज़रिए इंग्लिश चैनल पार कर लंदन लौटे. इसके बीच हमने कुछ नदियों में तैराकी भी की."

जेसन लुइस इस यात्रा के दौरान इस्तेमाल हुई बाइक, नाव, रोलर ब्लेड और पैडल बोट के बारे में बाते हैं, "इन सबका इंतज़ाम रास्ते में हमें मिलने वाले लोगों ने ही किया. हमारी यात्रा की सबसे ख़ास बात यह रही कि विभिन्न लोगों ने हमारी लॉजिस्टक समस्याओं को दूर किया. जैसे कोरियर कंपनी डीएचएल ने पुर्तगाल से मियामी तक जाने के लिए पैडल बोट मुहैया कराई, तो मियामी में एक स्थानीय दुकानदार ने रोलरब्लेड्स दिए."

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अपनी लंबी यात्रा के दौरान लुइस को सबसे ज़्यादा नाव पसंद आई. नाव में सफ़र के दौरान समुद्री जीव देखने को मिले. सबसे नापसंद तरीक़े के बारे में पूछे जाने पर जेसन ने बताया, "पैदल चलना सबसे मुश्किल भरा था. इसमें काफ़ी कोशिश करके भी आप कई मील तक नहीं चल सकते."

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वैसे जेसन के लिए यह इतना आसान नहीं था. मसलन, इंडोनेशिया तक नाव से पहुंचने पर उन्हें मुश्किल आई. इसके लिए उन्हें विशेष अनुमति लेनी पड़ी क्योंकि बाहरी नावों को इंडोनेशिया तक लाने की इजाज़त नहीं थी. ऐसी ही मुश्किल पूर्वी और पश्चिमी तिमोर में पेश आई.

यही नहीं मियामी तक पहुंचने पर जेसन और स्टीव के पास महज़ 30 पाउंड बचे थे, लेकिन इसके बाद उन्होंने वहां के लोगों के बीच अपने मिशन की प्रदर्शनी लगाकर पैसे जुटाए.

फिर आगे के सफ़र की योजना बन पाई. छह महीने के फंडरेज़िंग अभियान का ऐसा असर हुआ कि यात्रा शुरू करने के लिए उधार लिए पैसे भी दोनों ने चुका दिए.

जेसन कहते हैं, "जब आप एक अमीर देश से जाकर किसी दूसरे देश में पैसा जुटाने की कोशिश करते हैं, तो यह बेहूदगी भरा लगता है. हमें पैसा जुटाने की तरकीबें लगानी पड़ीं."

यात्रा की शुरुआत के 11 साल बाद जेसन को सिंगापुर में एक स्पॉन्सर मिला और उसने उन्हें 15 हज़ार डॉलर की मदद दी.

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मगर मुश्किलें केवल आर्थिक ही नहीं थीं, बल्कि भावनात्मक भी थीं. होम-सिकनेस भी अपना असर दिखा रही थी. यही वजह है कि यात्रा के सिर्फ़ साढ़े चार साल के बाद स्टीव स्मिथ ने यात्रा बीच में छोड़कर स्वदेश जाने का फ़ैसला कर लिया.

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स्टीव के बारे में जेसन ने बताया, "उसे अपने परिवार और दोस्तों की याद आ रही थी. घर के खाने की याद आ रही थी. उसने मुझसे कहा कि वह यात्रा जारी रखना नहीं चाहता."

जेसन ने खुद को मोटिवेट करना जारी रखा. कभी यात्रा छोड़ने का मन हुआ, पूछे जाने पर जेसन ने कहा, "कई बार बीमार पड़ा तो सोचा ज़रूर था. लेकिन मैं अपने जीवन के कई साल इसमें लगा चुका था और कई लोगों ने मुझे मदद की थी. टी-शर्ट खरीदकर दिए थे, बोट दी थी. इसलिए मुझे अपने लिए न सही, उन सबके लिए इसे पूरा तो करना ही था."

यात्रा के दौरान कोलोराडो में एक शराबी कार चालक ने जेसन को टक्कर मार दी. हादसे से उबरने में उन्हें नौ महीने लग गए लेकिन उन्होंने यात्रा जारी रखी.

दोबारा किन जगहों पर जाना चाहेंगे, ये पूछने पर जेसन कहते हैं, "इंडोनेशिया और उत्तरी सूडान. मुझे ये दोनों जगह खूब पसंद आईं."

अब जेसन लुइस 49 साल के हैं. उनके दोस्त नौकरियों पर लग चुके हैं, शादियां हो चुकी हैं, सबके परिवार बस चुके हैं लेकिन लुइस को अपने फ़ैसले पर कोई अफ़सोस नहीं है.

हार्पर कॉलिंस ने उन्हें इन अनुभवों पर किताब लिखने के लिए कुछ लाख डॉलर की रकम का आकर्षक ऑफ़र दिया लेकिन शर्त थी कि घोस्ट राइटर ही पूरी किताब को लिखेगा.

जेसन कहते हैं कि उन्हें ये ठीक नहीं लगा और उन्होंने पेशकश ठुकरा दी. उन्होंने 44 कॉपियों पर लिए नोट्स की मदद से एक अन्य़ प्रकाशक के लिए तीन हिस्सों में अपने अनुभव लिखे जो किताब और ईबुक की शक्ल में अब उपलब्ध हैं.

<italic><bold>अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/travel/bespoke/story/20150326-travel-pioneers/jason-lewis/index.html" platform="highweb"/></link> यहां पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी ट्रैवल</caption><url href="http://www.bbc.com/travel" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.</bold></italic>

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