यह 56 इंच का दिल कहां मिलता है...

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- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
पिछले महीने अल्लामा इक़बाल के पोते वलीद इक़बाल को पश्चिमी बंगाल की उर्दू अकादमी ने जश्ने इक़बाल में अपना मेहमान बनाया था.
यहां राज्य की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने इक़बाल को तराना-ए-हिंदी सम्मान दिया, जिसे उनके पोते ने ग्रहण किया.
वही इक़बाल जिनका 'सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा', पूरे भारत में ग़ैर सरकारी राष्ट्रीय गीत है.
वही इक़बाल जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान का ख़्वाब देखा जिसे मोहम्मद अली ज़िन्ना ने सच कर दिखाया.
मैं पिछले हफ़्ते वलीद इक़बाल के पिताजी और सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज और अल्लामा इक़बाल के सबसे प्यारे बेटे जावेद इक़बाल का एक साक्षात्कार देख रहा था.
मैंने सोचा कि आप लोग सीमा के आर-पार उड़ने वाली तड़ियां सुन-सुनकर उकता गए होंगे तो अल्लामा इक़बाल के सुपुत्र की बात भी सुन लें.
नेहरू, पटेल ने बनाया पाकिस्तान

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वह कहते हैं कि मेरे पिता ने 1930 में मुस्लीम लीग के इलाहाबाद सम्मेलन में किसी स्वतंत्र देश की बात नहीं की बल्कि भारतीय संघ के अंदर मुस्लिम बहुल इलाक़ों के स्वशासन की बात की थी.
बिल्कुल यही बात 1946 के कैबिनेट मिशन प्लान में भी की गई थी जिसे ज़िन्ना ने तो तुरंत स्वीकार कर लिया लेकिन नेहरू अड़ गए तो ज़िन्ना भी एक अलग देश पर अड़ गए.
इसलिए यह कहना ग़लत है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग ने बनाया बल्कि पाकिस्तान तो नेहरू और पटेल की ज़िद ने बनाया.
और यह बात मौलाना अबुल कलाम की मौत के बाद सामने आने वाले 'इंडिया विन्स फ़्रीडम' के पन्नों और जसवंत सिंह की किताब 'ज़िन्नाः इंडिया, पार्टीशन, फ़्रीडम' में भी मानी गई.
जावेद इक़बाल कहते हैं कि हमारा भविष्य मुस्लिम दुनिया से नहीं बल्कि दक्षिण एशिया से जुड़ा हुआ है.
सेक्युलर आइडिया

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वह कहते हैं, ' मैं खुद कश्मीरी हूं और अगर इस वक़्त वादी में रह रहा होता तो भारत और पाकिस्तान दोनों से आज़ादी चाहता. यह पूरा इलाक़ा नफ़रत मुक्त हो सकता है अगर कश्मीर को भूटान और नेपाल जैसी आज़ादी मिल जाए और पाकिस्तानी कश्मीर भी इस नए कश्मीर का अंग बन जाए.'
'नए कश्मीर के स्वशासन और नावाबस्तगी की ज़मानत भारत और पाकिस्तान के साथ-साथ चीन, रूस और अमरीका भी दें. फिर देखें कि कश्मीर स्विट्ज़रलैंड की तरह अपने पांवों पर खड़ा होता है या नहीं.'
इस भारी पत्थर के हटने के बाद कश्मीर समेत सब सार्क देशों को यूरोपीय यूनियन के रास्ते पर चलने का मौका मिल जाएगा और गुर्बत के बादल छंटने शुरू हो जाएंगे.
मगर मुसलमान और हिंदू मौलवी के लिए यह विचार हज़म करना बहुत मुश्किल है क्योंकि यह एक सेक्युलर आइडिया है.
एक ख़्वाब इक़बाल ने देखा और दूसरा ख़्वाब इक़बाल का बेटा देख रहा है.

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वैसे एक बात तो बताइए, हम लोग बुद्धिजीवियों और युद्धिजीवियों में फ़र्क करना कब सीखेंगे. 56 इंच के सीने तो भारत और पाकिस्तान में बहुत हैं, 56 इंच का दिल कहां पाया जाता है.
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