अल्पसंख्यक बन सकता है ब्रितानी प्रधानमंत्री ?

साज़िद जावेद

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इमेज कैप्शन, साज़िद जावेद ब्रिटेन के मंत्रिमंडल में बिज़नेस सेक्रेटरी हैं.
    • Author, जावेद इक़बाल
    • पदनाम, एनालिसिस ऐंड इनसाइट एडिटर

पिछले साल नवंबर में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा कि उनकी यह ख़्वाहिश है कि एक नस्ली अल्पसंख्यक ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनकर यह साबित करे कि यहां हर पृष्ठभूमि के नागरिक ऐसी सफलता हासिल कर सकते हैं.

हालांकि वक़्त ही बताएगा कि उनकी इच्छा पूरी होगी या नहीं.

ब्रिटेन में केवल गिने-चुने अश्वेत कैबिनेट मंत्री ही हैं. मई में चुनाव में मिली जीत के बाद कैमरन की नई कैबिनेट में महज दो नस्ली अल्पसंख्यक कैबिनेट मंत्री हैं.

पॉल बॉटेंग

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इमेज कैप्शन, पॉल बोटेंग ब्रिटेन में पहले अल्पसंख्यक सांसद बने.

वर्ष 1987 में लेबर पार्टी के चार अश्वेत और अल्पसंख्यक सांसद संसद में जीतकर आए थे.

पॉल बोटेंग मंत्री के तौर पर काफ़ी सफल रहे हैं और अक्सर उनके पहले अश्वेत कैबिनेट मंत्री होनी की बात कही जाती है.

कुछ लोगों ने यह अटकलें भी लगाई थीं कि वे शीर्ष स्तर तक जा सकते हैं. हालांकि ऐसा नहीं हुआ और अब वह संसद के ऊपरी सदन के सदस्य हैं.

समान प्रतिनिधित्व नहीं

कीथ वाज़

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इमेज कैप्शन, कीथ वाज़ को गृह मामलों की सेलेक्ट कमिटी के अध्यक्ष के तौर पर कई चुनौतियां का सामना करना पड़ता है.

1999 में कीथ वाज़ ब्रिटेन के संसद के निचली सदन में पहले एशियाई मंत्री बने. वे लंबे समय से गृह मामलों के सेलेक्ट कमिटी के अध्यक्ष रहे हैं.

डियान एबट का एक बड़ा राजनीतिक और मीडिया प्रोफाइल है लेकिन वे हाशिए पर नज़र आती हैं जैसे कि अपनी आकस्मिक मौत से पहले बर्नी ग्रांट.

कंजरवेटिव पार्टी में उस वक्त काले और अन्य अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व ना के बराबर माना जाता था.

वर्ष 1992 में जब जॉन टेलर को चेल्टनम से चुनाव लड़ने के लिए चुना गया तो स्थानीय संगठनों ने उनका विरोध किया और चुनाव अभियान में भी जातिवादी टिप्पणियों से नुकसान पहुंचाया गया. टेलर चुनाव हार गए.

डियान एबट

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इमेज कैप्शन, डियान एबट की दिलचस्पी लेबर पार्टी का नेतृत्व करने में भी थी.

वाकई में टोनी ब्लेयर और गॉर्डन ब्राउन के कार्यकाल में इस मामले में मंत्री स्तर बदलाव दिखे.

मुखर सांसद

सांसद डेविड लैम शुरुआती दौर के सितारे थे. वह महज़ 27 साल में निर्वाचित हुए और जल्द ही उन पर ब्रिटेन के अगले अश्वेत प्रधानमंत्री का ठप्पा लगने लगा.

उन्होंने अपने आप को एक मुख़र सांसद के तौर पर पेश किया. लेबर पार्टी की तरफ से लंदन मेयर के लिए वह पसंदीदा उम्मीदवार हैं.

पहले नस्ली अल्पसंख्यक अटॉर्नी जनरल के तौर पर बैरनेस स्कॉटलैंड की नियुक्ति अहम थी. इसके बाद वर्ष 2007 में शाहिद मलिक ब्रिटेन के पहले मुस्लिम मंत्री बने.

सादिक़ ख़ान

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इमेज कैप्शन, सादिक़ ख़ान की दिलचस्पी लंदन के मेयर पद में भी है

जब वर्ष 2010 में डेविड कैमरन सत्ता में आए तब उन्होंने सईदा वारसी को मंत्री बनाया वह पहली मुस्लिम महिला कैबिनेट मंत्री थीं.

कुछ समय तक उनके सितारे बुलंद रहे लेकिन वह अब सरकार में नहीं हैं. इसके बजाए वह मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों की अहम आवाज़ बन गई हैं.

भारतीय मूल के गुजराती शैलेश वारा को भी सरकारी पद खोना पड़ा. वह फिलहाल न्याय मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं. वे ब्रितानी एशियाई समुदाय के प्रभावशाली शख़्स हैं.

नज़रिए में बदलाव

प्रीति पटेल

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इमेज कैप्शन, भारतीय मूल की प्रीति पटेल ब्रिटेन सरकार में उभरती सितारा हैं.

कुछ लोग कंजरवेटिव पार्टी के सांसद साज़िद जाविद को भविष्य के नेता के तौर पर देखते हैं हालांकि उनके राजनीति विचार उनके नस्ली मुद्दे से ज़्यादा अहम हैं. यह भी नज़रिए में बदलाव का एक दूसरा संकेत है.

प्रीति पटेल पिछले महीने भारतीय मूल की पहली महिला मंत्री बनीं.

वेस्टमिंस्टर के दक्षिणपंथी विचारधारा वाले चंद अल्पसंख्यक नस्ली नेताओं में जाविद और पटेल रहे हैं.

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. अब पटेल अपने नस्ली मुद्दों से ज़्यादा कल्याणकारी सुधारों पर ज़ोर देती हैं.

उत्साहजनक रुझान

लेबर पार्टी की बात करें तो सूका उमन्ना को कई लोग नए लेबर नेता के प्रमुख उम्मीदवार के तौर पर देखते थे जब तक कि वे इस दौड़ से बाहर नहीं हो गए.

चुक उमन्ना

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इमेज कैप्शन, चुक उमन्ना को लेबर पार्टी के नेता के तौर पर पेश किया गया.

वे महज पांच साल पहले संसद में आए हैं और वे लेबर पार्टी के प्रमुख नेता बन चुके हैं और वह टीवी पर नियमित रूप से दिखते हैं.

वेस्टमिंस्टर के बड़े और प्रभावशाली नेताओं में सादिक़ ख़ान एक दूसरी मिसाल हैं जो लंदन मेयर के उम्मीदवार हो सकते हैं.

संसद की निचली सदन में अश्वेत सांसदों की तादाद बढ़ी है और नए संसद में इनकी हिस्सेदारी क़रीब 6 फ़ीसदी तक है. वर्ष 2010 में इनकी तादाद 4 फ़ीसदी थी.

आलोचकों का कहना है कि यह रुझान उत्साहजनक है लेकिन अगर संसद को वास्तव में पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व करना है तो ये उसके के लिए पर्याप्त नहीं है.

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