'उस दिन मैं चॉकलेट में डूबकर मर जाता'

फ्रांस के तटवर्ती कस्बे काले के बाहर जंगल के एक जीर्ण-शीर्ण शरणार्थी शिविर से एक सीरियाई शरणार्थी ने ब्रिटेन जाने वाले ट्रकों में चोरी से 18 बार घुसने का प्रयास किया.
एक बार तो वह तरल चॉकलेट से भरे टैंक में डूबते-डूबते बचे. उस दिन वह मरते-मरते बचे थे.
उनकी पूरी कहानी उन्हीं की ज़ुबानी.
हम लोग उस मानव तस्कर से रात के दो बजे पेट्रोल गैराज में मिले. ब्रिटेन जाने वाले ट्रक, ट्रेन स्टेशन के नज़दीक, वहीं पार्क होते थे.

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सामान्यतः हम रात को उनमें चढ़ने की कोशिश करते जब ड्राइवर सो रहे होते और वहां पुलिस भी कम होती.
उस दिन हम 25 लोग थे, इसलिए उसने (मानव तस्कर) हमें समूहों में बांट दिया. हर समूह को एक अलग ट्रक में घुसने की कोशिश करनी थी.
तस्कर ने हम सबसे लंबे सात लोगों को चुना. हममें से पांच सीरियाई थे और दो मिस्र के. 25 साल की उम्र में मैं सबसे जवान था, बाकी सब 32-35 साल के थे.
हम लोग जानते थे कि वह ट्रक ब्रिटेन जा रहा था क्योंकि तस्कर ने उस पर लगने वाले कार्ड में देख लिया था. वह इराक़ का एक कुर्द था और काले में सालों से रह रहा था.
मैं सीरिया से खाली हाथ निकला था इसलिए अपना खर्च अदा करने के लिए दो महीने से उसके साथ काम कर रहा था.
उसने कहा कि इन ट्रकों में, जिनमें तरल भरा होता है, वह बिना एक्सरे के सीधे ट्रेन तक जाती हैं.
ड्राइवर अपनी टैक्सी में सोया हुआ था, इसलिए हम चुपचाप टैंक पर चढ़ गए. ऊपर टैंकर का ढक्कन बंद था, लेकिन तस्कर ने उसकी तारें काट दीं.

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हमें यह नहीं पता था कि उसमें क्या है लेकिन जैसे ही ढक्कन खुला एक गंध हमारे नथुनों में भर गई- यह चॉकलेट था. हम तरल चॉकलेट के गर्म टैंक में घुसकर ब्रिटेन में चोरी से प्रवेश करने वाले थे.
कहीं जम न जाएं
उस रात बाहर बहुत ठंड थी इसलिए जब हम पहले-पहल गर्म चॉकलेट में उतरे तो काफ़ी अच्छा लगा. लेकिन करीब 15 मिनट बाद उस गरमी से दिक्कत होने लगी.
मैं करीब 185 सेमी (छह फ़ीट एक इंच) लंबा हूं लेकिन मेरे पैर टैंक की तल तक नहीं पहुंच पा रहे थे.
हम सब लोग एक हाथ से ढक्कन के किनारे को पकड़कर लटके हुए थे और दूसरा हाथ एक-दूसरे के कंधे पर रखे हुए थे. अगर एक का भी हाथ छूटता तो वह डूब जाता तो उसे निकालना संभव नहीं था.

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इस तरह हम लोग गर्दन तक चॉकलेट में ड़ूबे एक गोले में लटके रहे. तस्कर ने ढक्कन इस तरह बंद किया कि हमें सांस लेने के लिए हवा मिलती रहे.
टैंक में गर्मी भयानक थी. हमें अपनी टांगें हिलाती रहनी थी ताकि हम पूरी तरह चॉकलेट में जम न जाएं.
ट्रक को ट्रेन तक पहुंचने में सिर्फ़ 20-30 मिनट ही लगने थे और एक बार हम जांच से पार निकल जाते तो बाहर निकल सकते थे.
लेकिन दो घंटे से भी ज़्यादा वक्त तक ट्रक नहीं हिला. हमारे पास कहने को कुछ नहीं, हम बस बशर अल-असद को कोसते रहे कि उनकी वजह से हम इस हालत में आए.
चाटते चले वापस

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आखिरकार लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि गरमी बहुत ज़्यादा है और हमें बाहर निकलना होगा. मैं वहीं रुकना चाहता था लेकिन एक भी बाहर निकलता तो ट्रक के एक ओर चॉकलेट ही चॉकलेट हो जाता और हम सब पकड़े जाते.
फिर एक या दो आदमियों ने- जो मुझसे बड़े थे- रोना शुरू कर दिया. अंततः हम सब बाहर निकलने को तैयार हो गए.
चॉकलेट इतना चिपचिपा था कि हम पांच या छह लोगों को बाहर निकलने में हर आदमी की मदद करनी पड़ी. पहले व्यक्ति ने धक्का मारकर ढक्कन खोला और बाहर निकला.
फिर उसने नीचे झुककर हम सबको बाहर खींचा.
सबसे आखिरी व्यक्ति को बहुत मशक्कत करनी पड़ी क्योंकि उसे ऊपर धक्का देने के लिए कोई नहीं था. हम सब मिलकर उसे खींच रहे थे लेकिन वह चॉकलेट में फंस गया था.
बाहर निकलने की छटपटाहट में उसके जूते उतर गए जो टैंक में ही रह गए.

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जंगल में बने टेंट तक पहुँचने के लिए हमें लंबी यात्रा करनी पड़ी. हम सर से पांव तक चॉकलेट में सने हुए थे- हमारे हाथों, बालों, आंखों- सबमें चॉकलेट लगा हुआ था.
वैसे वह अच्छी क्वालिटी का चॉकलेट था और हम अपने शिविर तक लौटते हुए उसे चाटते रहे. हमारे पीछे चॉकलेट से भरे कदमों से निशान थे.
यह कहानी सुनाने वाले आदमी को अंततः गाड़ियों से भरे एक ट्रक में घुसकर ब्रिटेन पहुंचने में कामयाबी मिल गई. उन्होंने ट्रक में लदी सभी गाड़ियों के दरवाज़ों को खोलकर देखा और एक जो खुली मिली उसमें घुस गया. उन्हें ब्रिटेन में शरण मिल गई और अब वह शेफ़ील्ड के एक अरबी रेस्तरां में काम कर रहे हैं.
डेनियल सिलास एडैम्सन मैमडॉह अक्बी
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