प्रेज़ेंटेशन के वक़्त आप नर्वस होते हैं?

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- Author, इरिक बार्टन
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
2013 में वेब सिक्योरिटी कॉन्फ़ेंस में एक्सपर्ट नावाफ़ बिटार को एक व्याख्यान देना था, पर वो बहुत नर्वस थे.
उनकी योजना थी कि वे डाटा सेंटर सॉफ़्टवेयर को आउटडेटेड बताने के लिए पोलरॉइड कैमरे का इस्तेमाल करेंगे.
बार-बार उनके मन में आ रहा था कि 3000 सहकर्मियों के बीच कहीं कैमरा उन्हें धोखा न दे दे.
आज वे सॉफ़्टवेयर निर्माता वीएमवेयर में जेनरल मैनेजर हैं और बताते हैं, "हां, मैं बहुत नवर्स था. आप देखें तो आपको पहले मिनट की मेरी आवाज़ में नर्वसनेस साफ़ महसूस होगी."
उस व्याख्यान की शुरूआत में उन्होंने तस्वीर खींची और डाटा सेंटर सॉफ़्टवेयर को ऑउट-ऑफ़-डेट गैजेट बताया. उन्होंने अपने श्रोताओं से कहा, "इंस्टाग्राम के ज़माने में ये पोलरॉइड कैमरा है."
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उनकी रणनीति कामयाब रही. उनकी स्पीच इतनी शानदार थी कि उसे अब बिज़नेस स्कूलों में ये बताने के लिए पढ़ाया जाता है कि पहले ही मिनट में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कैसे किया जा सकता है. दूसरी ओर उनकी नर्वसनेस उनके पूरे भाषण पर पानी भी फेर सकती थी
आप ही नहीं, सभी घबराते हैं
कई लोगों को सार्वजनिक जगहों पर बोलने से पहले घबराहट होती है. वहीं मैनेजरों के लिए तो घबराहट हर दिन की चुनौती है. औसत परफर्मेंस का रिव्यू देने वक्त नए बॉस तो फ़्रीज़ ही हो सकते हैं.

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यही स्थिति सप्ताहिक स्टॉफ़ मीटिंग के दौरान भी हो सकती है यदि उसमें पहले ख़ासा शोरगुल होता रहा हो.
किसी का भी नर्वस होना बहुत अचरज की बात नहीं है.
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स्टैन्फ़ोर्ड बिज़नेस स्कूल में संस्थागत व्यवहार विषय के शिक्षक मैट अब्राहमस कहते हैं, "मैनेजरों को लगता होगा कि उन्हें ही घबराहट हो रही है, लेकिन सच्चाई ये है कि हर कोई घबराहट महसूस करता है."
घबराहट तेज़ी से बढ़ भी सकती है और घातक भी हो सकती है. हो सकता है कि आपके हाथ कांपने लगे, आपकी आवाज़ में थरथराहट बढ़ जाए या फिर आपका गला सूखने लगे.
कई लोगों की सांस भी उखड़ने लगती है. किसी को तेज़ी से पसीना आने लगता है. अब्राहमस के मुताबिक - 'दरअसल आप अपने पर से नियंत्रण खोने लगते हैं.'
1960 में पूरे देश में लगभग सभी मीडिया पर प्रसारित बहस के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन पसीने से तर होकर चिंतित हो गए थे.
लेकिन इस मुद्दे पर चिंतित होने के बदले अपनी घबराहट पर काबू पाने का तरीका तलाशना चाहिए.
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मेसी को किक लगाते समय घबराते देखा है?
हाथ में ठंडे पानी का एक गिलास आपके शरीर का तापमान कम कर सकता है. आप गहरी सांस लीजिए और अपनी सांसों पर काबू पाएँ. ख़ुद को फोकस करें, ध्यान केंद्रित कीजिए.
ज़रा सोचिए कि फुटबॉलर लियोनल मेसी के लिए किसी भी मैच में पेनल्टी किक का कितना महत्व है. एक ही पेनल्टी किक उनका पूरा करियर प्रभावित कर सकती है. लेकिन क्या आपने मेसी को कभी घबराते देखा है?

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मेसी जिस नियंत्रण और सहजता के साथ निशाना साधते हैं, वहीं इस सारे मामले का हल है.
अब्राहमस के मुताबिक इसके पीछे कोई रहस्य नहीं है. बस पूरी एकाग्रता से उस पल को जीने ('लिविंग इन द मूमेंट') से आप भी ऐसा कर सकते हैं. ये सोचने की ज़रूरत ही नहीं है कि कुछ खराब हो जाएगा.
इस बात की चिंता करने की ज़रूरत ही नहीं कि अगर पोलरॉइड कैमरे ने काम न किया तो क्या होगा. इसकी जगह आपको बड़े व्याख्यान देते समय अपनी पहली बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. उसके बाद दूसरी बात और इसी तरह अंतिम बात तक पहुंचना चाहिए.
कहां लगाएं ध्यान?
अपनी स्पीच के बारे में आप ये भी सोच सकते हैं कि आप कुछ लोगों से आपस में बात कर रहे हैं. आप ऐसी ही स्थिति में स्पीच देने के लिए खुद को तैयार कीजिए. शांतचित्त होकर और सहज शैली में. हालांकि ये सब नए मैनेजरों के लिए आसान नहीं होता.
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यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास में बिज़नेस एडमिनेस्ट्रेशन के प्रोफेसर रिचर्ड पोस्टहुमा कहते हैं, "नए मैनेजरों को महत्वपूर्ण चीजों से निपटने के बारे में सीखने की जरूरत होती है और कई बार तो इसे लगातार करते रहना होता है."
कई कंपनियां अपने मैनेजरों को दबाव के पलों का सामना करने के बारे में प्रशिक्षण मुहैया कराती हैं. इसके जरिए ही आपको अलग अलग परिस्थितियों और उसके हल के बारे में मालूम होता है.
हालांकि सकारात्मक बने रहना भी इसमें अहम भूमिका निभाता है. शोध अध्ययनों से ये ज़ाहिर होता है कि अगर आप अपने शरीर को प्रसन्न रहने के लिए कहते हैं, तो आपका आत्मविश्वास बढ़ता है.
चाहे आप अपने कर्मचारी का आकलन कर रहे हों, या फिर स्टाफ़ मीटिंग में शामिल होने जा रहे हों, पोस्टहुमा सलाह देते हैं कि आपको मुस्कुराते हुए जाना चाहिए ताकि पॉजिटिव प्रभाव पड़े.
पॉजिटिव सोच और रणनीति
हालांकि केवल मुस्कुराना भर हर समस्या का हल नहीं है. अगर आपको किसी कर्मचारी के खराब प्रदर्शन की समीक्षा देनी हो तो घबराहट के बदले भविष्य पर ध्यान होना चाहिए.
आप कर्मचारी से कह सकते हैं कि इस बार अच्छा नहीं हुआ लेकिन अगली बार तुम ये - ये करके इसे बदल सकते हो.
पोस्टहुमा कहते हैं, "ये बताना अहम है कि भविष्य अभी तय नहीं हुआ है, आप चीजों को और भी बेहतर बना सकते हैं."
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बिटार ने 1999 तक सार्वजनिक जगहों पर बोलने को लेकर अपनी घबराहट पर काबू पा लिया था.

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तब वे नेटवर्क एपलायंस के मैनेजर थे और उन्हें हर तिमाही में 200 लोगों की बैठक को संबोधित करना पड़ता था. जब उन्हें पहली बार बैठक की ज़िम्मेदारी मिली, तो उन्होंने महसूस किया कि उनका गला सूख रहा था और सांस उखड़ने लगी थी.
लेकिन धीरे धीरे उन्होंने डर पर काबू पाया. पहले पहल उन्होंने ज्यादातर मौकों पर अपने भाषण के 90 फीसदी हिस्से को याद करके डर पर काबू पाया.
हालांकि अब वे इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि वे क्या कहना चाहते हैं. ऐसा ही अंदाज़ उन्होंने सिंगापुर के 2013 के आरएसए कांफ्रेंस पोलराइड कैमरे वाली स्पीच में भी अपनाया था.
उसके बाद बिटार बड़े समूहों को संबोधित करते रहे हैं. कई बार तो वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिए भी दसियों हजारों लोगों के समूह को संबोधित करते हैं.
अब वे नर्वस नहीं होते हैं. इस बदलाव के बारे में वे कहते हैं, "आप जो कहना चाहते हैं, उसके पीछे और आगे की सारी बातें, पूरी कहानी आपको मालूम है तो फिर कुछ ग़लत नहीं हो सकता."
<italic><bold>(अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20150320-nerves-of-steel-or-nervous-nellie" platform="highweb"/></link> यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)</bold></italic>
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