भारत-अमरीकी गठजोड़ के ख़िलाफ़ ‘ठोस संदेश’

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में देश की विदेशी नीति पर ख़ास तौर से चर्चा हो रही है.
नवाए वक़्त ने पाकिस्तान दिवस पर होने वाले वाली सैन्य परेड में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को मुख्य अथिति बनाए जाने पर लिखा है कि ये दुनिया को अमरीका–भारत गठजोड़ के ख़िलाफ़ ठोस पैग़ाम है.
अख़बार लिखता है कि भारत के गणतंत्र दिवस पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा का दिल्ली जाना और दोनों देशों के बीच परमाणु रक्षा सहयोग के समझौते होना पाकिस्तान के लिए एक खुली चुनौती थी.
अख़बार के मुताबिक़ चीन और पाकिस्तान के हित साझा हैं और इसलिए उनका दुश्मन भी साझा है, ऐसे में चीन ने साफ़ कर दिया है कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान के हितों से ही चीन के हित भी जुड़े हैं.
एक्सप्रेस लिखता है कि ओबामा ने अपने भारत दौरे में जिस तरह भारत पर मेहरबानियों की बारिश की और उसे सुपर पावर बनाने के लिए समझौते किए, वो पाकिस्तान को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर रहे हैं.
पाक को मदद छह गुना

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औसाफ़ ने अपने संपादकीय में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के एक इंटरव्यू का ज़िक्र किया है जिसमें वो कहते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत जाने से पहले उन्हें भरोसे में लिया था.
लेकिन अख़बार की टिप्पणी है कि ये ऐसा बदक़िस्मत दौर है जब पाकिस्तान की कोई विदेश नीति नहीं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे अलग थलग किया जा रहा है. इसलिए ज़रूरी है कि एक मज़बूत रक्षा, विदेश नीति के अलावा प्रभावी क़ानून बनाए जाएं.
वहीं जंग ने पाकिस्तान को दी जाने वाली अमरीकी सैन्य मदद छह गुना करने की राष्ट्रपति ओबामा की सिफ़ारिश पर संपादकीय लिखा है.
अख़बार के मुताबिक़ इससे साफ़ होता है कि अमरीका ने दहशतगर्दी और चरमपंथ से निपटने के पाकिस्तान के प्रयासों को मान्यता दी है, लेकिन पाकिस्तान ने इस लड़ाई में जितना जानो-माल का नुक़सान झेला है और झेल रहा है, उसके मुक़ाबले ये ज़्यादा नहीं है.

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दैनिक दुनिया ने अपने संपादकीय में कश्मीर मुद्दे को उठाते हुए लिखा है कि पाकिस्तान कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन चंद वर्ग हज़ार किलोमीटर के इलाक़े की ख़ातिर नहीं करता और न ही वो भारत की तरह विस्तारवादी रवैया रखता है, बल्कि वो तो अपने वजूद के लिए लड़ रहे सवा करोड़ कश्मीरियों के संघर्ष के साथ है.
अख़बार के मुताबिक़ कश्मीरियों का समर्थन करने की पाकिस्तान ने भारी क़ीमत अदा की है लेकिन फिर भी वो अपने उस संकल्प से नहीं डिगा है जो उसने 14 अगस्त 1947 को लिया था.
बीजेपी का यूटर्न
रुख़ भारतीय उर्दू अख़बारों का करें तो हमारा समाज का संपादकीय है- बीजेपी का यूटर्न.
अख़बार के मुताबिक़ लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने काला धन वापस लाकर सब लोगों को 15-15 लाख रुपये देने का जो वादा किया था, अब पार्टी उससे किनारा कर रही है.

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पार्टी प्रमुख अमित शाह ने साफ़ कर दिया है कि ये तो बस चुनावी बयानबाज़ी थी. अख़बार की राय में इस यूटर्न ने सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दिया है.
रोज़नामा खबरें ने बिहार की सियासी उठापटक पर लिखा है कि असल में ये जंग मांझी बनाम नीतीश कुमार नहीं है, क्योंकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पटना पहुंच गए हैं और हालात पर नज़र रखे हुए हैं.
अख़बार की राय में भाजपा चाहती है कि मांझी जेडीयू को ज़्यादा से ज़्यादा नुक़सान पहुंचाए, लेकिन उनकी सरकार को समर्थन देना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा.
अख़बार के मुताबिक़ मांझी चाहे जो कर लें लेकिन एक अच्छी सरकार देना उनके बस में नहीं है और चुनाव से पहले ऐसी सरकार का साथ देने का ख़तरा बीजेपी नहीं उठाना चाहेगी.
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