पाक मीडिया: 'दो साल सत्ता संभाले फ़ौज'

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पेशावर हमले के बाद चरमपंथियों पर नकेल कसने के लिए पाकिस्तान सरकार की ओर से उठाए जा रहे क़दमों और ख़ासकर सैन्य अदालतों का गठन वहां उर्दू मीडिया की सुर्ख़ियों में है.
चरमपंथ से जुड़े मामलों की तेज़ रफ़्तार सुनवाई के लिए सैन्य अदालत बनाने के फ़ैसले पर नवा-ए-वक़्त लिखता है कि हर काम फ़ौज को सौंपना समझदारी नहीं है.
अख़बार के मुताबिक़ सैन्य अफ़सरों के नेतृत्व में विशेष अदालतें बनाना मौजूदा न्यायपालिका पर अविश्वास करने जैसा होगा, वहीं इसमें कई क़ानूनी और संवैधानिक दिक़्क़तें आ सकती हैं.
लिखा गया है कि पाकिस्तानी सेना दहशतगर्दों को तहस-नहस करने में तो सक्षम है पर फ़ौजी अफ़सरों को क़ानूनी और संवैधानिक तक़ाज़ों के तहत इंसाफ़ करने में न तो उन्हें महारथ है और न उन्हें इसके लिए तैयार किया जाता है.
'सेना सत्ता संभाले'
इंसाफ़ लिखता है कि चूंकि विशेषज्ञों के मुताबिक़ संविधान में सैन्य अदालतें बनाने की कोई गुंजाइश नहीं है, इसीलिए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने इन्हें सैन्य अदालतों की बजाय स्पेशल ट्रायल कोर्ट कहा है, जिनमें कहीं सैन्य अफ़सर शामिल होंगे तो कहीं मौजूदा जज उनका नेतृत्व करेंगे.

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साथ ही अख़बार ने अपने संपादकीय में सेना प्रमुख राहील शरीफ़ के इस बयान को भी जगह दी है कि अगर दहशतगर्दी को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए क़ानून और संविधान में बदलाव करना पड़े तो उससे गुरेज़ नहीं होना चाहिए.
लेकिन रोज़नामा औसाफ़ के संपादकीय में सैन्य अदालतों के गठन पर एमक्यूएम के विरोधी तेवर सुनाई पड़ते हैं.
अख़बार के मुताबिक़ पार्टी का कहना है कि फ़ौजी अदालतें कायम करने की बजाय फ़ौज दो साल के लिए सत्ता संभाल ले, क्योंकि सरकार तो दहशतगर्दी से नहीं निपट सकती.
औसाफ़ ने भी लोकतांत्रिक दौर में सैन्य अदालतों के गठन को अचंभे वाली बात बताया है.
प्लान नाकाम
दूसरी तरफ़ जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव के नतीजों पर जंग का संपादकीय है- मोदी का प्लान नाकाम.

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अख़बार लिखता है कि कश्मीर के लोग अपनी कोशिशों में पूरी तरह कामयाब रहे. एक तरफ उन्होंने छह साल से राज करने वाली सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया तो दूसरी तरफ़ बीजेपी के मंसूबों पर पानी फेर दिया.
अख़बार की राय है कि चुनावी नतीजों ने प्रधानमंत्री मोदी के इस मंसूबों पर फिलहाल पानी फेर दिया है कि जम्मू-कश्मीर को पूरी तरह एक भारतीय राज्य बनाकर कश्मीर मुद्दे को दबा ही दिया जाए.
वहीं, रोज़नामा एक्सप्रेस ने भारतीय संसद में धर्मांतरण के मुद्दे पर कई दिन तक हुए हंगामे पर संपादकीय लिखा है.
अख़बार कहता है कि भारत यूं तो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है जहां हर किसी को अपने धर्म को मानने की आज़ादी है, लेकिन असल में भारत एक कट्टर हिंदू राष्ट्र में तब्दील होता दिख रहा है.
अख़बार की राय है कि भारत जैसे ग़रीब देश में लालच या फिर दबाव में किसी का धर्म बदलवाना मुश्किल बात नहीं है, लेकिन ऐसा काम सत्ताधारी पार्टी के तत्वाधान में होना निंदनीय है.
सख़्त रुख़
रुख़ भारत का करें तो राष्ट्रीय सहारा ने असम में हुए चरमपंथी हमलों पर लिखा है- बोडो दहशतगर्दी पर सख़्त रुख़ ज़रूरी.

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अख़बार की राय है कि एक तरफ इन हमलों में मरने वालों की तादाद 78 तक पहुंच गई है, दूसरी तरफ़ इससे न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि पूरा देश हिल गया है और इसीलिए सरकार बोडो दहशतगर्दों को ख़त्म करने के लिए हर मुमकिन कोशिश का वादा कर रही है.
वहीं हमारा समाज ने अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को 'भारत रत्न' देने की सरकार की घोषणा पर लिखा कि भारत रत्न देश का सबसे बड़ा सम्मान है, इसलिए इसे लेकर सियासत नहीं होनी चाहिए.
अख़बार की राय में इसे सिर्फ़ ऐसे लोगों को नहीं दिया जाना चाहिए जो सत्ता में बैठी पार्टी की पार्टी की विचारधारा से जुड़े हों.
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