पाक मीडिया: तस्वीर ने की 'ख़ुशी काफ़ूर'

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में बीते हफ़्ते काठमांडू में हुई सार्क बैठक की ख़ासी चर्चा रही.

औसाफ़ ने लिखा है कि सार्क कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ न तो भारत की तरफ़ से राष्ट्राध्क्षों या सरकार प्रमुखों के लिए मुहैया कराई गई बुलेटप्रूफ़ गाड़ी में बैठे और न उन्होंने भाषण के लिए जाते समय भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दुआ सलाम की.

अख़बार के मुताबिक़ ये सब देखकर पाकिस्तान के ज़्यादातर लोग बड़े ख़ुश हुए, लेकिन हैरत उस वक़्त हुई जब मुस्कराते हुए नरेंद्र मोदी और नवाज़ शरीफ़ की हाथ मिलाते हुए तस्वीर सामने आई.

अख़बार को ऐतराज़ है कि शरीफ़ ने इस मुलाक़ात में विदेश सचिव स्तर की वार्ता टालने पर तो शिकवा किया पर यह नहीं कहा कि भारत नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी क्यों नहीं रोकता.

ख़ुशफ़हमी न पालें

वहीं जंग ने सार्क को मज़बूत और फ़ायदेमंद बनाने पर ज़ोर दिया है.

बिजली का खंभा
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में बिजली की किल्लत एक बड़ी समस्या है

अख़बार लिखता है कि सार्क कांफ्रेस अपने आठ सदस्य देशों के लगभग दो अरब लोगों की शांति, विकास और तरक़्क़ी से जुड़ी उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर सकी लेकिन रीज़नल इलेक्ट्रिक ग्रिड के ज़रिए बिजली समझौते पर हस्ताक्षर करके यह सम्मेलन पूरी तरह विफलता के दाग़ से बच गया है.

अख़बार ने सार्क की मज़बूती के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर समेत सभी लंबित मुद्दों के हल की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है.

उधर नवा-ए-वक़्त की सलाह है कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भारत को लेकर पहले जैसी ख़ुशफ़हमी में न रहें.

निशाने पर पोलियो टीमें

क्वेटा में पोलियो टीम पर हमले में चार लोगों की मौत पर पेशावर से छपने वाला मशरिक़ लिखता है कि हमले के बाद पोलियोरोधी दवा पिलाने का अभियान रोक दिया गया है.

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अख़बार कहता है कि मुश्किल यह है कि जो लोग इस बीमारी को खत्म करने में लगे हैं, उन्हें ही मौत के घाट उतारा जा रहा है.

वहीं वक़्त ने 30 नवंबर यानी आज होने वाली विपक्षी नेता इमरान ख़ान की रैली पर लिखा है कि इमरान का यह कहना कि अगर उन्हें रोका गया तो मुकाबला करेंगे, क्या लोकतांत्रिक कहा जा सकता है.

अख़बार की हिदायत है कि विरोध की राजनीति करने वाले सकारात्मक रवैया अपनाएं क्योंकि रचनात्मक तब्दीली के लिए संवैधानिक रास्ता ही चुनना होगा.

मोदी जवाब दें

रुख़ भारत के अख़बारों का करें तो बदायूं मामले में सीबीआई जांच से आए नए मोड़ पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस लिखता है कि दो बहनों ने आत्महत्या की या फिर उनका क़त्ल किया गया, सच क्या है, इस पर से पर्दा उठना अभी बाक़ी है.

अख़बार के मुताबिक़ यूपी पुलिस की थ्योरी और सीबीआई जांच से मेल नहीं खाती है.

अख़बार कहता है कि ये मामला परत-दर-परत हालात और घटनाक्रम की उलझी हुई गुत्थियां हैं.

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अख़बार-ए-मशरिक़ का संपादकीय है- सौ दिन में काला धन वापस लाने का सवाल, मोदी जवाब दें: क्या हुआ.

अख़बार कहता है कि काले धन पर जो बातें यूपीए सरकार कहती थी, वही अब वित्त मंत्री अरुण जेटली घुमा-फिराकर कह रहे हैं.

अख़बार का कहना है कि काश कि चुनावी वादों पर कोई रोक लग पाती जिनसे प्रभावित होकर लोग राजनेताओं के झांसे में आ जाते हैं.

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