भारत-रूस दोस्ती से ‘सहमा’ पाक मीडिया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के उर्दू मीडिया में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का भारत दौरा और इस दौरान हुए समझौते छाए रहे.
औसाफ़ कहता है कि जो विश्लेषक मान रहे थे कि अमरीका की तरफ़ भारत के झुकाव की वजह से रूस उससे नाराज़ है और इसीलिए पाकिस्तान से रिश्ते बेहतर करना चाहता है, उन्हें आंख खोलकर देखना चाहिए कि भारत और रूस के बीच कितने बड़े और अहम समझौते हुए हैं.
अख़बार के मुताबिक़ दूसरी तरफ़ ‘हम हैं कि अपने सबसे अहम दोस्त चीन के राष्ट्रपति का दौरा स्थगित कराकर कोई अफ़सोस भी नहीं है कि कितना बड़ा नुक़सान करा बैठे हैं.’
भारत का जुनून

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जंग लिखता है कि मोदी और पुतिन के बीच समझौतों के तहत रूस अगले 20 साल में भारत में 12 परमाणु रिएक्टर बनाने के अलावा लड़ाकू और परिवहन विमानों की साझा तैयारी, सैन्य प्रशिक्षण, तेल की तलाश और आपूर्ति में सहयोग करेगा.
लेकिन अख़बार उम्मीद करता है कि बदलती दुनिया में रूस और भारत का सहयोग सैन्य साजो-सामान की तैयारियों के अलावा दक्षिण एशिया को भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई और अशिक्षा जैसी समस्याओं से निपटने में भी मददगार होगा.
दैनिक एक्सप्रेस लिखता है कि अमरीका के साथ भारत का परमाणु समझौता तो मनमोहन सरकार के दौरान ही हो गया था, लेकिन अब इस क्षेत्र में रूस भी खुले दिल से भारत की मदद कर रहा है.

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अख़बार के मुताबिक़ इससे भारत की युद्धक क्षमता बढ़ेगी और पाकिस्तान को लेकर उसके रवैये में और घमंड आएगा.
नवाए वक़्त ने भी अमरीका और रूस के साथ भारत के समझौतों को हथियारों के प्रति उसके जुनून का नाम दिया है और इसे पाकिस्तान की संप्रभुता को ख़तरा बताया.
अख़बार लिखता है कि इस जुनून को देखते हुए भारत से यह उम्मीद बेमानी है कि वह कश्मीर को लेकर पाकिस्तान से कोई बात करेगा. इसलिए ज़रूरी है कि कश्मीर मुद्दे पर भारत के दोहरे रवैये से दुनिया को अवगत कराएं.
तमाचा

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वहीं, एक्सप्रेस ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून की इस पेशकश पर संपादकीय लिखा है कि अगर भारत और पाकिस्तान चाहें तो वह कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं.
अख़बार कहता है कि बान ने बातचीत में कश्मीरियों को शामिल करने की पैरवी कर भारत को करारा जवाब दिया है, जो उन्हें बातचीत से अलग रखने की साज़िश रचता रहता है.
दैनिक दुनिया ने भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ शांति का नोबेल पाने वाली पाकिस्तान की मलाला यूसुफ़ज़ई के भाषण को संपादकीय का विषय बनाया है.

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अख़बार लिखता है कि मलाला का यह बयान दुनिया के ताक़तवर देशों के मुंह पर तमाचा है कि बंदूक़ बांटना आसान है पर किताब बांटना मुश्किल, टैंक बनाना आसान है और स्कूल बनाना मुश्किल.
अख़बार लिखता है कि दुनिया का जितना ध्यान आधुनिक हथियार बनाने पर है, उतना बच्चों की शिक्षा पर नहीं है.
माहौल बिगाड़ने की कोशिश

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रुख़ भारत का करें तो उर्दू अख़बारों में आगरा में कथित धर्मांतरण का मुद्दा छाया है.
हिंदोस्तान एक्सप्रेस लिखता है कि दरअसल असामाजिक तत्व यूपी का माहौल ख़राब करना चाहते हैं. पहले उन्होंने लव जिहाद का दुष्प्रचार कर माहौल बिगाड़ना चाहा, लेकिन जब उपचुनाव में मुंह की खाई तो अब दूसरे हथकंडे अपनाकर सियासी फ़ायदा उठाने की कोशिश हो रही है और यह आरएसएस के इशारे पर हो रहा है.
इसी विषय पर राष्ट्रीय सहारा कहता है कि अगर यह सब राशन कार्ड, घर और अच्छी शिक्षा देने के नाम पर हुआ, तो इसका मतलब है कि उनके पास ये चीज़ें नहीं हैं और नहीं है तो यह सब देना किसकी ज़िम्मेदारी है. क्या इसके लिए किसी को जवाबदेह नहीं बनाना चाहिए.
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