पाक मीडिया: मोदी को कब जवाब देंगे शरीफ़

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    • Author, अशोक कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत-पाक सीमा से भले ही अब गोलीबारी की ख़बरें रुक रुक कर आ रही हों लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में ये विषय लगातार छाया है.

जंग का संपादकीय है- आक्रामकता से बाज़ आए भारत. अख़बार की राय है कि नई सरकार आने के बाद से भारत के रवैये में अचानक बदलाव आ गया है जबकि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से इस मुद्दे पर दखल देने को कहा है ताकि क्षेत्र में शांति लागू की जा सके.

नवाए वक्त ने अपने संपादकीय में भारत की कथित आक्रामकता के ख़िलाफ़ पंजाब और राष्ट्रीय असेंबली में पारित प्रस्तावों का जिक्र किया है.

अख़बार कहता है कि ये प्रस्ताव अपनी जगह हैं लेकिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की ज़हर बुझी बातों का उन्हीं की भाषा में जवाब नहीं दिया है जैसा कि पाकिस्तान की जनता चाहती है.

वहीं रोज़नामा इंसाफ़ का संपादकीय है- पाकिस्तान की रक्षा के लिए सारा राष्ट्र एकजुट है.

'जंग ख़त्म नहीं हुई'

आजकल ने धार्मिक गुरु ताहिरुल क़ादरी का सरकार विरोधी धरना ख़त्म होने पर सवाल किया है कि वो इंकलाब यानी क्रांति कहां है, जिसका वादा किया गया था.

इसी विषय पर रोज़नामा दुनिया लिखता है कि क़ादरी को समझना चाहिए था कि सीमित संसाधनों के साथ हज़ारों लोगों के धरने को देर तक जारी रखना मुमकिन नहीं होता.

कादरी का धरना खत्म होने के बाजवूद इमरान ख़ान ने कहा है कि वो अपना धरना जारी रखेंगे

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इमेज कैप्शन, कादरी का धरना खत्म होने के बाजवूद इमरान ख़ान ने कहा है कि वो अपना धरना जारी रखेंगे

अख़बार के मुताबिक़ धरने के दौरान ऐसा भी समय आया था जब सरकार प्रदर्शनकारियों के साथ बात कर रही थी और उनकी ज़्यादातर मांगें मान भी ली गई थीं, उस वक़्त अगर लचक दिखाई गई होती तो क़ादरी के पास धरने को ख़त्म करने का ठोस औचित्य होता.

औसाफ़ का इस पर कार्टून है जिसमें क़ादरी बेगलाम भागते घोड़े पर उल्टे बैठे मिसाइल दाग रहे है. उसके नीचे क़ादरी का बयान है- हमारी जंग ख़त्म नहीं बल्कि शुरू हुई है.

दैनिक ख़बरें ने बलूचिस्तान के शहर क्वेटा में एक दिन में तीन चरमपंथी घटनाएं होने पर संपादकीय लिखा है जिनमें 14 लोग मारे गए. एक हमले में तो जेयूआई (एफ) के प्रमुख मौलाना फजलुर्रहमान बाल-बाल बचे.

अख़बार लिखता है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में पाकिस्तान ने बड़ी क़ुरबानियां दी हैं लेकिन हैरानी होती है कि उसे ही दहशतगर्दों की जन्नत बताया जाता है.

'सियासी दिवाली'

दिवाली और मोदी

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इमेज कैप्शन, मोदी ने बाढ़ पीड़ितों के साथ मनाई दिवाली

रुख़ भारत का करें तो कश्मीर में जाकर दिवाली मनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के क़दम पर जदीद ख़बर का संपादकीय है- सियासी दिवाली.

मोदी के दौरे को वहां होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ते हुए अख़बार लिखता है कि मोदी कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों को मदद और सांत्वना देने के नाम पर सियासी फ़ायदा हासिल करना चाहते हैं.

हिंदोस्तान एक्सप्रेस का कहना है कि आम चुनावों के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र में भी भाजपा को कामयाबी मिली तो अब उसे जम्मू-कश्मीर में भी अप्रत्याशित नतीजों की उम्मीद है.

वहीं मुंसिफ ने मोदी सरकार के कामकाज पर टिप्पणी की है, दिखावे की नहीं, काम करने की ज़रूरत है.

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