अमरीका ने 'दहशतगर्दी' को घटाया या बढ़ाया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों में एक तरफ़ अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के 'स्टेट ऑफ़ द यूनियन' भाषण की चर्चा है तो दूसरी तरफ़ उनकी आगामी भारत यात्रा पर टिप्पणी की गई हैं.
नवाए वक़्त लिखता है कि जब भी किसी अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत का दौरा किया वो पाकिस्तान भी आए, लेकिन ओबामा पाकिस्तान को नज़र अंदाज़ करके पड़ोसी देश का दौरा कर रहे हैं.
अख़बार ने इसे भेदभावपूर्ण रवैया बताते हुए कहा है कि फिर अमरीका कैसे कह सकता है कि भारत और पाकिस्तान दोनों की उसके लिए समान अहमियत है.
अख़बार लिखता है कि अमरीका ने जहां भारत को एक तरह से परमाणु क्लब का मेंबर मान लिया है, वहीं पाकिस्तान की राह में वो रोड़े अटकाता है.
रणनीति पर सवाल
जंग ने बराक ओबामा के स्टेट ऑफ़ द यूनियन भाषण पर संपादकीय लिखा है जिसमें सबसे ज़्यादा ज़ोर चरमपंथ से निपटने पर दिया गया. अख़बार ने इस दिशा में अमरीकी रणनीति पर सवाल उठाए हैं.

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अख़बार लिखता है कि पाकिस्तान के सहयोग से ही अल-क़ायदा की कमर टूटी जिसके नतीजे में पाकिस्तानी शहरों, बाज़ारों और सार्वजनिक स्थलों के साथ सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमले हुए, लेकिन उल्टे पाकिस्तान की ही नियत पर सवाल उठाए जाते हैं.
जंग कहता है कि अमरीका ‘डू मोर’ की मांग करने के बजाय और संसाधन मुहैया कराए ताकि दहशतगर्दी को पनपने ही ना दिया जाए.
एक्सप्रेस की टिप्पणी है कि अमरीका ने आज तक दहशत के ख़िलाफ़ जितनी भी कार्वराई की हैं, उनसे पता चलता है कि दहशतगर्दी कम नहीं हुई है बल्कि बढ़ी ही है और अब भी दहशतगर्दी ख़त्म होने की सूरत नहीं दिखाई देती है.
उदारवादी शासक

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सऊदी अरब के शाह अब्दुल्लाह को श्रंद्धांजलि देते हुए दैनिक दुनिया ने लिखा है कि उन्हें एक उदारवादी शासक माना जाता था. अख़बार के मुताबिक़ उन्होंने एक तरफ़ सऊदी महिलाओं को ओलंपिक तक में खेलने की अनुमति दी, वहीं अमरीका और ब्रिटेन के साथ क़रीबी रिश्ते बनाए जबकि पाकिस्तान से उन्हें बहुत लगाव था.
अख़बार ने 1999 में नवाज़ शरीफ़ के तख़्तापलट का ज़िक्र करते हुए कहा है कि अगर शाह अब्दुल्लाह बीच में न आते तो शरीफ़ परिवार के मुश्किलों के दिन कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह और लंबे होते.
औसाफ़ ने पाकिस्तान में पेट्रोल संकट पर सरकार को खरी खोटी सुनाई है.
अख़बार लिखता है कि आज सारे राजनेता ये कहने को मजबूर हैं कि प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पीएमएल (एन) के ख़िलाफ़ कोई साज़िश नहीं कर सकता क्योंकि वो अपनी दुश्मन ख़ुद है.
अख़बार लिखता है कि गुड गवर्नेंस की बात करने वाली नवाज़ शरीफ़ की अनुभवी टीम कहां गई. अख़बार की टिप्पणी है कि अगर सरकार ने कुप्रबंधन को दूर नहीं किया तो ऐसे संकट आते रहेंगे.
अंदरूनी खींचतान

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रुख़ भारत का करें तो दिल्ली विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र हमारा समाज का संपादकीय है- भाजपा की अंदरूनी खींचतान.
अख़बार लिखता है कि पार्टी में टिकटों के बंटवारे और चुनाव लड़ने की होड़ के बीच किरण बेदी का पार्टी में शामिल होना क़द्दावर नेताओं पर पहाड़ टूटने जैसे है.
अख़बार कहता है कि ऐसे नेता अपनी नाराज़गी तो ज़ाहिर नहीं कर रहे हैं लेकिन पार्टी के भीतर अंदरूनी खींचतान साफ़ देखी जा सकती है.
वहीं बिहार के आरा में एक अदालत परिसर में हुए धमाके पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस की टिप्पणी है कि पहले भी देखा गया है कि अराजक तत्व अदालतों, जेलों और सार्वजनिक जगहों को निशाना बनाकर अपना मक़सद हासिल करने की कोशिश करते हैं.
ऐसे में, अख़बार के मुताबिक़ निगरानी का व्यापक बंदोबस्त न होना और सरकारी दफ़्तरों में सुरक्षा पुख़्ता न होना कहीं न कहीं किसी बड़े ख़तरे को दावत देने से कम नहीं है.
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