ब्लॉग: ओबामा जी आयो म्हारे देश...

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- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
बस एक ही दिन की तो बात है, कल दोपहर के बाद से दिल्ली में लोकतंत्र बहाल हो जाएगा. जनता फिर से राजपथ पर चल सकेगी. एयरपोर्ट और मेट्रो स्टेशन पहले जैसे हो जाएंगे. न कोई पूछेगा और न बताएगा कि दिल्ली की हवा में आज कितने प्रतिशत प्रदूषण है.
कुछ भले मानस शायद ये भी कहें कि जैसे तीन दिन दिल्ली वालों के गुज़रेंगे उससे तो अच्छा था कि गणतंत्र दिवस की परेड अमरीका में ही शिफ़्ट हो जाती. मगर ऐसा सोचने वालों को माफ़ कर दीजिएगा.
बचपन में जब हमारे घर में भी मेहमान आते थे तो घर के बड़े बेकल रहते थे कि कहीं हम बच्चे कोई बदतमीजी न कर दें, मेहमान के सामने रखी चीज़ें उठा-उठाकर खाना न शुरू कर दें.
मगर हम बच्चे ये सोच-सोचकर ख़ुश होते रहते थे कि आज हमारे यहाँ मुर्गी पकेगी, मिठाई भी आएगी और कोल्ड ड्रिंक का ढक्कन ठपाक से खुलेगा, और हो सकता है कि मेहमान जाते-जाते गाल पर चुटकी लेता हुआ दस-बीस रुपए भी थमा जाए और हम ना-ना करते हुए उसे जेब में रख लें.
मेहमान आने का फायदा

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अब देखिए ना, मेहमान के आने से कितना फ़ायदा हुआ. नई दिल्ली की बड़ी-बड़ी सड़कें नहा लीं. मीडिया पर मिशेल ओबामा के जंपर के तुरपाई किस धागे से हुई है उसतक का ब्योरा सुनने को मिल गया.
ताजमहल का तालाब फिर से शीशा हो गया, ताजमहल की तरफ़ जाने वाली सड़कों की मुफ़्त में इतनी रगड़ाई हुई कि सड़कें ख़ुशी से चीख पड़ीं.
अंतरराष्ट्रीय चैनलों पर एक बार फिर इंडिया शाइनिंग, शाइनिंग इंडिया हो गया. तीन दिन के लिए सही दिल्ली की चुनावी मुहिम में गाली-गलौज और इल्जामबाज़ी फीकी पड़ गई. सब राजी, सब ख़ुश.
पाकिस्तान में बिल क्लिंटन साहब पाँच घंटे के लिए एक दफ़ा आए थे तो समझ में नहीं आ रहा था कि ख़ुद कहाँ, खड़े हों और उन्हें कहाँ बिठाएं. इस्लामाबाद में ड्राइविंग तक राइट हैंड से लेफ्ट हैंड हो गई. फिर भी क्लिंटन साहब हाथ दिखाकर चले गए.
आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि ओबामा जी एक बार नहीं दूसरी बार दिल्ली आए हैं. इसलिए किसी नागरिक को थोड़ी बहुत तकलीफ़ हुई भी तो भूल जाएं.
दोस्ती में करना पड़ता है

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पाकिस्तान में तो ओबामा छोड़ कोई देसी मंत्री भी सड़क से गुज़र जाए तो सड़क ख़त्म हो जाए मगर मंत्री जी की गाड़ियों का काफ़िला ख़त्म नहीं होता. कई बार तो ऐसा हुआ कि जच्चा अस्पताल तक नहीं पहुँच पाई और बच्चा रिक्शे में ही हो गया.
मगर ये सब तो करना ही पड़ता है. दोस्ती निभाना आसान थोड़ी है, नो पेन नो गेन.
अब आप कहीं ये न पूछ लीजिएगा कि हमारे नेता जब लंदन, पेरिस या वाशिंगटन जाते हैं तो उन्हें ख़ुद ही टैक्सी पकड़कर क्यों 10 डाउनिंग स्ट्रीट, एलीजी पैलेस या व्हाइट हाउस जाना पड़ता है.

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लंदन, पेरिस या वाशिंगटन तीन दिन के लिए क्यों बंद नहीं होते. बकिंघम पैलेस पर चूना क्यों नहीं फेरा जाता, ऐफिल टावर पर नया रंग क्यों नहीं किया जाता और व्हाइट हाउस रात को गुलाबी क्यों नहीं होता. उन्हें इतनी ख़ुशी क्यों नहीं होती जितनी हम लोगों को उनके आने पर होती है.
दोस्तों, ऐसी शुभ घड़ी में ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते...सयानों की बातें मूर्ख क्या जानें!
बस तुम्हारा हमारा काम ख़ुश रहना और ख़ुश करना है. ख़ुश रहने के सिवा विकल्प ही क्या है?
और अगर ऐसा कोई विकल्प हो तो मुझे भी बताइएगा.
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