क्या कायम रहेगा महिंदा राजपक्षे का राज?

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- Author, चार्ल्स हैवीलैंड
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
श्रीलंका में आठ जनवरी को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मौजूदा राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे तीसरी बार चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे हैं.
लेकिन इस सवाल पर ग़ौर करना ज़रूरी है कि राजपक्षे और उनके भाइयों के नियंत्रण वाली सत्ता में देश की स्थिति वास्तव में क्या बन गई है.
पिछले महीने एक दिन देश के सरकारी टेलीविज़न पर ज्योतिषियों को राष्ट्रपति चुनाव की भविष्यवाणी के लिए लाया गया.
इस बहस में सभी ज्योतिषियों ने राष्ट्रपति राजपक्षे की 'शानदार जीत' की घोषणा की और कहा कि 'प्रकृति' उन्हें चुनौती देने वालों के 'पूरी तरह ख़िलाफ़' काम करेगी.
'किंग' की सत्ता

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राजपक्षे पिछले एक दशक से श्रीलंका के निर्विवाद नेता बने हुए हैं. उनके चाहने वाले उन्हें 'किंग' भी पुकारते हैं.
पुरानी बात नहीं है जब सरकारी टेलीविज़न पर एक गीत के ज़रिए लोगों को ये बताने की कोशिश की गई कि 'किंग' ने किस तरह से देश को तमिल विद्रोही चीतों से बचाया है.
सही है कि उनके तीनों भाई सत्ता में अहम स्थान रखते हैं. एक रक्षा प्रमुख हैं, दूसरे श्रीलंका की आर्थिक विकास की जिम्मेदारी देखते हैं और तीसरे संसद के स्पीकर हैं, लेकिन किसी को भी महिंदा राजपक्षे की ताक़त पर संदेह नहीं है.
मैत्रिपाला सिरिसेना

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लेकिन श्रीलंका का ये 'किंग' अब मुश्किल में लग रहा है.
राजपक्षे ने जैसे ही चुनाव की घोषणा की, उनकी सत्ता को चुनौती देने वाला एक गंभीर उम्मीदवार मैत्रिपाला सिरिसेना उनके सामने आ गए.
सिरिसेना, राजपक्षे की ही पार्टी में वरिष्ठ नेता थे. वे न तो करिश्माई माने जाते हैं और न ही मिलनसार.
लेकिन सिंहलियों के असर वाले क्षेत्र के एक किसान परिवार से आने वाले सिरिसेना का अपने लोगों के बीच ख़ासा असर है.
विपक्षी गठबंधन

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सिरिसेना को विपक्षी गठबंधन का समर्थन हासिल है और उनके नाम को आखिरी लम्हें तक छिपाया गया था.
सत्तारूढ़ दल के कुछ नेता भी पार्टी छोड़कर सिरिसेना का रुख कर सकते हैं.
श्रीलंका की राजनीति में दल-बदल आम बात है लेकिन हाल के सालों में जितने भी लोगों ने पार्टी छोड़ी है, वे सरकार की ओर ही गए हैं.
लेकिन, इस बार धारा उल्टी बहती हुई दिख रही है और दग़ाबाज़ी के किस्से भी खूब कहे सुने जा रहे हैं.
राजनीतिक विभाजन

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ईसा मसीह को धोखा देने वाले जुडास इस्केरियट के ख़ुदकुशी कर लेने वाली घटना की नज़ीर देते हुए सरकारी अख़बार संडे ऑब्ज़र्वर ने लिखा, "मैत्रिपाला का हाल भी चुनावी हार के बाद जुडास की तरह हो जाएगा."
अख़बार के मुताबिक "मतदाता गद्दारों को सबक सिखाएंगे."
लेकिन 69 साल के महिंदा राजपक्षे असुरक्षित और थके हुए लग रहे हैं.
उनकी हालत का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाल में उन्हें एक चुनावी भाषण को बीच में छोड़ देना पड़ा था.
बहुसंख्यक सिंहलियों और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच दशकों तक चले संघर्ष की वजह से श्रीलंका में राजनीतिक विभाजन की रेखा बड़ी गहरी है.
तमिल और मुसलमान

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हालाँकि अब भी सिंहली समुदाय के कई लोग राष्ट्रपति राजपक्षे का तमिल चीतों को हराने में राजपक्षे की भूमिका को नहीं भूले हैं.
उन्हें लगता है कि देश में युद्ध जीतने के बाद बुनियादी ढांचे के विकास के लिए भी काफी काम किया गया है.
लेकिन श्रीलंका में ऐसे लोग भी हैं जो उन्हें सत्ता से बाहर देखना चाहते हैं. इनमें ज़्यादातर तमिल और मुसलमान अल्पसंख्यक हैं.
तमिलों को लगता है कि सिंहलियों और बौद्धों के वर्चस्व वाली सत्ता में उन्हें दरकिनार कर दिया गया है, जबकि मुसलमानों को अतिवादी बौद्ध भिक्षुओं के हमलों का सामना करना पड़ रहा है.
सार्थक बदलाव

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मुसलमानों को लगता है कि इन बौद्ध भिक्षुओं को राजपक्षे की शह हासिल है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि मैत्रिपाला सिरिसेना किस हद तक सार्थक बदलाव लाने में सक्षम हैं.
उन्होंने अपने घोषणापत्र में भ्रष्टाचार ख़त्म करने और संविधानिक सुधारों की बात कही है, लेकिन उनका गठबंधन अपनी जटिलताओं में उलझा हुआ है.
तमिल चीतों के ख़िलाफ़

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बौद्ध समुदाय की नुमाइंदगी करने वाली एक पार्टी है जो सत्तारूढ़ गठबंधन से अलग होकर उनके साथ आई है.
ये पार्टी इस बात से इनकार करती है कि तमिल चीतों के ख़िलाफ़ निर्णायक लड़ाई में हज़ारों तमिल नागरिक मारे गए थे.
मैत्रिपाला ने अपने चुनाव अभियान में अल्पसंख्यकों के किसी अधिकार की कोई बात नहीं की है और न ही किसी जातीय संघर्ष के किसी राजनीतिक समाधान का कोई फॉर्मूला सुझाया है.
शानदार जीत!

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लेकिन इन तमाम कमियों के बावजूद मैत्रिपाला सिरिसेना मुक़ाबले में हैं.
श्रीलंका में ये सवाल कई लोगों को परेशान कर रहा है कि अगर महिंदा राजपक्षे चुनाव हार जाते हैं तो क्या वह आसानी से नए राष्ट्रपति को सत्ता सौंप देंगे.
और श्रीलंका की राजनीति का ये ताक़तवर परिवार 'शानदार जीत' न पाने की सूरत में चुपचाप और शांति से रहेगा.
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