कैसा रहेगा दुनिया के लिए 2015

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साल की शुरुआत हो चुकी है और उम्मीदों, आशंकाओं और संभावनाओं की आंधी उमड़ रही है.
सुलगते मध्यपूर्व, गरजते मध्य एशिया, उभरते चीन और झुंझलाते रूस के बीच इंटरनेट और कारोबार का नया संसार क्या कुछ बदलाव ला सकता है.
तो क्या कुछ हो सकता है इस साल में...
पढ़िए, बीबीसी संवाददाताओं के अनुमानों का सार
सुरक्षा, शरणार्थी और इस्लामी गुटों के ख़िलाफ़ जंग
लिस ड्यूसेट, मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता

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मध्य पूर्व और दूसरे देशों के लिए 2015 अंतरराष्ट्रीय महत्व का एक और साल होगा.
साल 2014 का अंत पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान दोनों के लिए सुरक्षा की चुनौतियों के साथ हुआ है. 2015 में यह चुनौती और बढ़ सकती है. पाकिस्तान, भारत और अफ़ग़ानिस्तान में बेहतर संबंध का होना भले ही मुश्किल हो, लेकिन ज़रूरी है.
अमरीका अपनी सैन्य दख़लंदाज़ी ख़त्म करने की कोशिश करेगा, लेकिन राष्ट्रपति बराक ओबामा की योजना के बावजूद इसे पूरी तरह ख़त्म कर पाना मुमकिन नहीं होगा.
अमरीका इराक़ी सेना को मज़बूत कर इस्लामिक स्टेट के क़ब्ज़े से बड़े शहरों को छुड़ाने की कोशिश करेगा. इराक़ बिखरा रहेगा और सीरिया में भी ख़ूनी जंग का रुकना अभी मुश्किल है.
बदलेंगे रास्ते

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तेल की घटती क़ीमतों के कारण बढ़ता आर्थिक दबाव ना सिर्फ़ अहम देशों को अपने सहयोगियों का साथ छोड़ने पर विवश करेगा बल्कि नए रास्ते तलाशने के लिए भी दबाव बनाएगा.
सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल-असद का साथ दे रहे रूस और ईरान संयुक्त राष्ट्र की योजना के साथ ही नई राजनीतिक कोशिशों को भी परखेंगे. पश्चिमी देश, अरब और तुर्की अलग-अलग ताक़तों को समर्थन देना जारी रखेंगे. असद की सेना कई मोर्चों पर डटी है लेकिन दबाव में रहेगी.
2015 में इस बात की प्रबल संभावना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर समझौता हो जाए. इसराइल में चुनाव के बाद इसराइल और फ़लीस्तीनी संगठन के बीच बातचीत कराने की कोशिश भी अमरीका करेगा. हालाँकि दोनों देशों में तनाव इतना ज़्यादा है कि असल में कुछ हो पाएगा, यह कहना मुश्किल है.
ये एक और साल होगा जब दुनिया की ताक़तें अहम विवादों को निपटाने में अक्षम रहने पर हाथ मलती रह जाएंगी. इसी दौर में कुछ अतिउत्साही देशों की फ़ौजें और ज़्यादा लोगों को शरणार्थी बनने पर विवश करेंगी.
सीरिया पर नियंत्रण और उभरता रूस
ब्रिगेट केंडल, कूटनीतिक संवाददाता

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2015 में पश्चिमी कूटनीतिज्ञों के सामने दो चुनौतिया हैं एक तो सीरिया को बिखरने से बचाना, और दूसरे उभरते रूस को संभालना.
ईरान के साथ परमाणु क़रार मध्यपूर्व में स्थिति को बहुत ज़्यादा बदलेगा. ईरान दुश्मन की जगह दोस्त बन जाएगा.
पश्चिमी देश और ईरान दोनों पहले ही इस्लामिक स्टेट के रूप में एक साझे दुश्मन का सामना कर रहे हैं. जिहादी सीरिया और इराक़ में लड़ रहे हैं.
दोनों पक्ष समझौता चाहते हैं. पश्चिमी देश परमाणु ताक़त वाले ईरान से बचना चाहते हैं तो ईरान प्रतिबंधों को हटाना चाहता है.
हालांकि यह इतना आसान भी नहीं. आशंकित रिपब्लिकन और ईरान के कट्टरपंथी समझौते का रास्ता रोक सकते हैं. तब सीरिया में असद को नियंत्रित करना मुश्किल होगा.

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ऐसे में अशांति बनी रहेगी. यह समस्या अगले अमरीकी राष्ट्रपति को शायद विरासत में मिले.
इसी तरह यूक्रेन पर विवाद मिटाने के लिए रूस के साथ क़रार फ़ायदेमंद हो सकता है.
रूस की आर्थिक चिंताएं उसे झुकने पर मजबूर कर सकती हैं, लेकिन सभी पक्षों में भरोसे की कमी कोई बड़ा फ़ैसला करा सकेगी, कहना मुश्किल है.
पश्चिमी देश रूस पर आरोप लगाएंगे और पुतिन पश्चिमी देशों पर. नतीजा रूस और ज़्यादा अपने आप में सिमटेगा और बाहरी देशों का असर कम होगा.
भविष्य के विवादों में पश्चिम की भूमिका
मार्क मार्डेल, प्रेजेंटर, द वर्ल्ड दिस वीक

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अमरीका तेज़ी से उभरेगा, यूरोप ठहरेगा या फिर नीचे जाएगा और चीन बिना बारी के ही उठेगा. ऐसे में असमानता बढ़ेगी और कोई नहीं जानता कि करना क्या है. ऐसे में यह भाव
ना ज़ोर पकड़ेगी कि राजनीति काम नहीं आती.
2014 के विवाद और गहरे होंगे और नए विवाद भी उभर सकते हैं. साथ ही अमरीका में 2016 के चुनावों से पहले पश्चिमी देशों की दख़लंदाज़ी पर बहस तेज़ होगी.
इंटरनेट एक तार्किक जंग की ज़मीन बनेगा क्योंकि यह बड़े-बूढ़ों की घबराहट बढ़ाएगा और युवाओँ के हाथ में खेलेगा जो सिर्फ़ इसी बात पर यक़ीन रखते हैं कि माध्यम अच्छा है तो बुरे संदेशों से भी कोई डर नहीं.
चीन: राजनीतिक शुद्धिकरण, ऊंचा विकास और इंटरनेट शासन
कैरी ग्रेसी, चीन संपादक

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चीन में ये साल भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का होगा. इससे पार्टी के उद्देश्य भी पूरे होंगे और साथ ही राष्ट्रपति शी जिनपिंग के राजनीतिक दुश्मनों का सफ़ाया भी. नौकरशाही भी डर की वजह से ही क़ाबू में रहेगी.
चीन अगले तीस साल के लिए उच्च विकास का मॉडल तैयार कर रहा है. सुधार ज़रूरी हो चुके हैं लेकिन टलते आने की वजह से उन्हें लागू करना बेहद मुश्किल हो गया है.
साफ़ हवा और पानी लंबे समय के लिए बड़ी चुनौती बनी रहेगी. ओबामा और शी के बीच हुई बातचीत से उत्सर्जन घटाने के मामले में कुछ प्रगति हो सकती है.

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चीन के तकनीकी बाज़ार को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है.
मार्क ज़करबर्ग इस साल भी बीजिंग आ सकते हैं और फ़ेसबुक के लिए समझौता हो सकता है.
इंटरनेट की दुनिया में ज़्यादा दख़ल के लिए चीन कैलिफ़ोर्निया की कंपनियों के साथ नई नज़दीकियों का फ़ायदा उठा सकता है.
हथियारों की दुनिया मे भी चीन अपने क़दम बढ़ाएगा.
सिल्क रूट में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए चीन कूटनीति तेज़ करेगा, ताकि मध्य एशिया में ऊर्जा, परिवहन और सुरक्षा के ज़रिए अपना असर बढ़ा सके.
पूरब के देशों का निवेश और अलीबाबा
कमाल अहमद, वाणिज्य संपादक

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व्यापार की ताक़त पश्चिम से पूरब की ओर बढ़ चली है.
चीन की कंपनियां और बैंकों ने ना सिर्फ़ पश्चिमी देशों में विस्तार कर लिया है, बल्कि वहां की कंपनियों को कई मामलों में पीछे भी छोड़ दिया है.
अलीबाबा वॉलमार्ट के पास पहुंच गया है. 2015 में यह दुनिया की दस सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल हो सकता है.
अमरीका में चीन, कनाडा के बाद दूसरा सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है.
2015 में पश्चिमी देश वैसी ही चुनौतियों का सामना करेंगे जैसा अफ़्रीकी देशों ने किया है और चीन भारी निवेश कर मदद का हाथ बढ़ाएगा.
पश्चिमी देश अपना व्यापार छोटा कर रहे हैं. आर्थिक संकट शुरू होने के बाद से शुरू हुआ बाज़ार विरोधी रवैया 2015 में भी पूरे साल नज़र आता रहेगा.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, यूरोज़ोन की नई समस्याएं और इबोला का वैक्सीन ढूंढने की कोशिश पूरे साल अहम बनी रहेंगी.
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