इन समुद्री खानाबदोशों का कोई देश नहीं

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लोगों की भीड़भाड़ से बहुत दूर, थाईलैंड के पाँच छोटे सुरीन द्वीप और समंदर ही कुछ लोगों की पूरी दुनिया है.
घने जंगलों वाली इन छोटी पहाड़ियों पर छोटी पूंछ वाले मकॉक़ बंदर, तेज़ तर्रार लोमड़ियां और पानी की रखवाली करती छिपकलियों का राज है.
पानी की सतह के नीचे मूंगे की खूबसूरत चट्टानें (कोरल रीफ़) तो हैं ही, समुद्री जीवन का अकूत भंडार भी है, जिसमें समुद्री कछुए, रंग-बिरंगी मछलियां और फूलों की तरह जगमगाते एनिमोन्स का संसार है. लेकिन इस समुद्री जीवन की झलक पाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है.
यूं तो ये द्वीप थाईलैंड के दक्षिण पश्चिम तट से मात्र 60 किलोमीटर दूर हैं, लेकिन यहाँ कुछ ही पर्यटक और विकास का तो नामो-निशान ही नहीं है.
प्रकृति को करीब से निहारने वालों के लिए ये द्वीप थाईलैंड के दूसरे मशहूर द्वीपों के मुक़ाबले अच्छा विकल्प हैं.
यहां सिर्फ़ एक गांव है, नाम है मू बान ओ बोन. इसे यहां की आदिम जनजाति मोकन के समुद्री खानाबदोशों ने बसाया है.
अंडरवाटर पार्क

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1981 में सुरीन द्वीपों को थाईलैंड का 29वाँ नेशनल पार्क घोषित किया गया था और इनका नाम दिया गया मु को सुरीन नेशनल पार्क. यानी यहाँ उस विकास को प्रतिबंधित कर दिया गया जिससे इसे नुक़सान संभावित है. इस पार्क की ख़ासियत है इसका पानी के अंदर का जीवन.
140 वर्ग किलोमीटर इलाक़े में फैले इस नेशनल पार्क का 80 फ़ीसदी क्षेत्र पानी में है. हालाँकि यहां नाव के ज़रिए पहुँचा जा सकता है, लेकिन एक और तरीक़ा है जो रोमांचक भी है वह है स्नोर्कल (पानी के अंदर सांस लेने के लिए मुंह में लगी नली) के सहारे पार्क में घूमना.
स्नोर्कल उपकरण सुरीन नुआ के दोनों किनारों पर किराए पर मिलते हैं और ख़ास बात यह है कि यहाँ पानी के भीतर 35 मीटर दूर तक देखा जा सकता है.
इसके अलावा कई निजी टूर कंपनियां स्कूबा डाइविंग की सुविधा भी देती हैं.
समंदर पर गांव

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हालाँकि कई खानाबदोश अब स्थाई तौर पर समुद्र के किनारे रहने लगे हैं, लेकिन परंपरागत रूप से ये 200 से 300 खानाबदोश नावों पर 800 से अधिक द्वीपों में आया-जाया करते थे.
नौकाएँ ही इनका घर थीं. मोकन लोग इन नावों को हाथ से लकड़ी का इस्तेमाल करते हुए बनाते हैं.
लेकिन पिछले कुछ दशकों में मोकन आदिवासियों की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है.
इनकी कोई राष्ट्रीय नागरिकता नहीं है और अब तो सरकार ने इस घुमंतू जाति के घूमने-फिरने पर भी कुछ पाबंदियां लगा दी हैं.
2004 की सुनामी के बाद थाईलैंड सरकार ने इस घुमंतू जाति को एक गांव में रखने पर ज़ोर दिया है.
पानी से हटकर किनारे पर

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जब ये घुमंतू लोग अपनी लकड़ी की नावों पर रहा करते थे जिन्हें वे कबांग्स कहते थे. बारिश के मौसम में वे अस्थाई झोपड़ी बना लेते थे. झोपड़ी बनाने के लिए वे ताड़ की पत्तियों का प्रयोग करते थे. अब वे पूरे साल भर इन झोपड़ियों में रहते हैं.
प्रशांत महासागर में समुद्री जीवन पर अध्ययन कर रहे जापान के प्रोफ़ेसर सुज़ुकी युकी इस गांव में 2007 से 2008 तक रहे.
उन्होंने मोकन पर एक शोध पत्र भी लिखा. सुनामी के बाद जब इस गांव का पुनर्निर्माण किया गया तो नेशनल पार्क के अधिकारियों ने मोकन को अपने घर समुद्री तट से ज़्यादा से ज़्यादा दूर बनाने को कहा.
युकी कहते हैं, "मोकन फिर लौट रहे हैं, उनके घर समंदर के नजदीक ख़िसकते जा रहे हैं."
ज़मीन पर ज़िंदगी

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मोकन के इन घरों की छतें ताड़ की पत्तियों से बनी होती हैं और फर्श बांस के.
गांव को सुरीन ताई में निवासियों के लिए काम रहे एक ग़ैर सरकारी संगठन चाइल्डलाइन थाईलैंड फाउंडेशन के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर अपोर्न पुमिपुथावोर्न कहते हैं, "हर मोकन का घर कुछ इसी तरह का होता है. वे हर चीज़ दीवार से सटाकर रखते हैं और बीच की जगह एकदम खाली होती है. शायद इसलिए क्योंकि नावों में भी कुछ ऐसा ही होता था."
वे खाना बीच में पकाएंगे और बाद में बर्तन आदि किनारे कर देंगे ताकि वहां सो सकें.
हालाँकि हर रोज नेशनल पार्क के रास्ते मोकन के गांवों तक पहुंचने का ट्रिप उपबल्ध हैं, लेकिन टूर ऑपरेटर्स मोकन के घरों को दिखाने की गारंटी नहीं लेते.
मौलिक डिजाइन

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कबांग्स पारंपरिक तौर पर खोखली लकड़ी से बना होता था और इसका अगला और पिछला हिस्सा कांटेदार होता था.
यह पानी में नाव को आगे बढ़ाने में मदद करता है. परंपरागत तौर पर मोकन इन्हीं नावों का इस्तेमाल किया करते थे.
सुरीन मोकन की कई नावें सुनामी में बर्बाद हो गई थीं, इसलिए चाई पट्टना फाउंडेशन समेत कई संगठनों ने इनके बदले उन्हें लंबी पूंछ वाली थाई नावें दीं.
नाव दान करने वालों में द रोटरी क्लब और रॉयटर्स शामिल हैं.
आज सुरीन ताई गांव में कुछ ही कबांग्स बची हुई हैं.
गुजारा

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मोकन को बिना किसी उपकरण के पानी में लंबे समय तक गोता लगाने के लिए जाना जाता है. वे पानी में 15 मीटर से भी अधिक गहरे तक उतरते हैं.
वे पानी के भीतर कई मिनटों तक अपनी सांसें रोके रखते हैं.
मछलियाँ पकड़ने के लिए वे बर्छियों का इस्तेमाल करते हैं. वे समुद्र तटों पर छोटे-छोटे गड्ढे भी बनाते हैं, ताकि कम ज्वार में घोंघे आदि समुद्री जीव इनमें फंस जाएं.
अगली पीढ़ी

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माकन का बसेरा अब समंदर की लहरों से हटकर ज़मीन पर पहुंच गया है. अपने माता-पिता और दादा-दादी की तरह तो उनका जीवन कबांग्स पर समुद्री लहरों में नहीं बीतता.
मोकन लड़कियों का यह ग्रुप बिना हत्थे के चाकू की मदद से समुद्र के किनारे की चट्टान पर घोंघों को अलग कर प्लास्टिक की बाल्टियों में इकट्ठा कर रहा है.
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