दोस्तों की दुश्मनी बीमार बनाती है

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ऐसे दोस्त जिनको अपना समझकर आपने उनके सामने दिल खोलकर रख दिया, अपने सुख-दुख की सारी बातें उड़ेल दीं पर उन्होंने आपकी खिल्ली उड़ाई.

हल्का महसूस करने की जगह घंटों और कई बार दिनों तक आप अपनी समस्याओं से नहीं, बल्कि अपने दोस्त के व्यवहार को लेकर सुलगते रहे और बार-बार खुद को कोसते रहे कि मुझे क्या पड़ी थी यह सब बताने की.

एक अच्छे दोस्त को खो देने का दुख बहुत तकलीफ़ पहुँचा सकता है, यह डिप्रेशन की गर्त में भी धकेल सकता है.

भरोसा दोस्ती की बुनियाद होती है और दोस्तों की सोहबत नाउम्मीदियों से निकलने का एक भरोसेमंद रास्ता. इसीलिए दोस्तों से मिलने वाले तानों का गहरा असर होता है, क्योंकि उससे भरोसा टूटता है.

फ्रेनिमीज यानी यारदुश्मन

ऐसे दोस्त जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं उन्हें अब एक नया नाम दिया गया है - "फ्रेनिमीज" यानी "यारदुश्मन".

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अमरीका में यूटाह के ब्रिगहैम यंग यूनिवर्सिटी के जूलिएन हॉल्ट-लुंस्ताद ऐसे मित्रों के लिए "अम्बिवालेंट रिलेशनशिप" जैसी तकनीकी शब्दावली का प्रयोग करते हैं.

उनका कहना है, हमारे जानने वालों में 50 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जिनसे हम प्यार के साथ-साथ घृणा भी करते हैं. जूलिएन कहते हैं, "विरले ही ऐसा कोई होगा जो कम से कम एक दुश्मन-दोस्त की संगत में नहीं होगा."

और अगर ऐसा है तो यह एक गंभीर मामला है. शोध के मुताबिक 'यारदुश्मन' उन लोगों की तुलना में ज़्यादा नुकसानदेह हैं जिनसे हम बिना शक नफ़रत करते हैं.

ये हमारे स्वास्थ्य के लिए ख़तरा हैं. पर सवाल उठता है कि फिर हम क्यों इस तरह के दोस्तों को ढोते हैं?

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इसे समझने के लिए हमें सामाजिक संपर्कों के प्रभावों को समझने की जरूरत है. अमूमन ज़िंदादिल दोस्तों और जान-पहचान के लोगों का मिश्रित समूह हमें विषम परिस्थितियों से उबारता है.

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अब तक प्रकाशित 150 अध्ययनों के आधार पर हॉल्ट-लुंस्ताद ने पाया कि अकेले होने का असर मोटापे से होने वाले नुक़सान से कहीं अधिक बुरा हो सकता है.

दोस्तों से तो उम्मीद यही थी कि वे हमारा बचाव करेंगे और हमें तनाव से उबारेंगे. तनाव के बारे में तो हम इतना तो जानते हैं कि यह रक्तचाप बढ़ाता है.

इसके विपरीत, दोस्त कई मुश्किल हालात से हमें निकालने में मदद करते हैं. अकेलेपन की उदासी कई जटिलताओं को जन्म देती है, जैसे नींद न आना.

आकलन करें

पर मुश्किल यह है कि आज दुनिया जिस कदर छोटी हो गई है, 'यारदुश्मनों' से निजात पाना बेहद कठिन हो गया है. हालांकि हम सभी जानते हैं, दोस्ती के कई रंग हैं.

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'डुनबर्स नंबर' के लिए जाने जाने वाले ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के रॉबिन डुनबर का कहना है, "अस्थिर दोस्त एक बड़े सामाजिक समूह के रूप में हमारे विकास का अहम हिस्सा रहे हैं."

डुनबर कहते हैं, "हमें आपसी हितों की प्रतिस्पर्धा से निपटना पड़ता है. समस्या इन तनावों को प्रभावहीन बनाने की है ताकि यह समूह समय के साथ प्रासंगिक बना रहे."

इसलिए हमें अपने मित्र समूह का आकलन करते रहना चाहिए जिसमें यारदुश्मन भी शामिल हैं.

आप उनकी किसी बात को यह जानकर बर्दाश्त करते हैं कि आपको उन्हें साथ लेकर चलना है, पर 'यारदुश्मन' को झेलना आसान नहीं होता है.

हमारे स्वास्थ्य को हमारे दोस्त किस तरह प्रभावित करते हैं, पहले हुए अध्ययनों में इन बातों का ख्याल नहीं रखा गया था इसलिए यूटा यूनिवर्सिटी के हॉल्ट-लुंस्ताद और बर्ट यूचीनो ने 'यारदुश्मन' की अच्छाइयों और बुराइयों पर रिसर्च की है. जो सामने आया वह अचंभे में डालने वाला है.

दबाव में दबे

रिसर्च करने वालों ने कई लोगों को रक्तचाप की निगरानी करने वाले एक मॉनिटर से जोड़ दिया.

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हॉल्ट-लुंस्ताद बताते हैं, "वो जब भी किसी से बातचीत करते थे हमें उनके रक्तचाप के बारे में पता लगता रहता था."

जैसे कि उम्मीद की जा सकती है, अपने पसंदीदा दोस्तों के साथ रहने पर लोगों का रक्चचाप सामान्य होता था, लेकिन बदतमीज़ बॉस या नापसंद के लोगों से मिलने पर उनका ब्लड प्रेशर बढ़ जाता था.

मगर ताज्जुब की बात यह थी की उनका ब्लड प्रेशर उस समय सबसे अधिक हो जाता था जब वे किसी दुश्मन-दोस्त के साथ होते थे. इसके बाद के प्रयोग ने भी इन निष्कर्षों की पुष्टि की.

हॉल्ट-लुंस्ताद का कहना था, "दूसरे व्यक्ति के दूसरे रूम में होने के बावजूद उस व्यक्ति का ब्लड प्रेशर ज़्यादा रहता था, उस व्यक्ति से बात करनी पड़ेगी कि आशंका मात्र से ही ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है."

और तो और, 'यारदुश्मनों' का नाम स्क्रीन पर दिखाए जाने भर से उनकी धड़कन बढ़ जाती है जो तनाव बढ़ने का संकेत है.

संवाद का असर

शोधकर्ताओं का कहना था, "इसका मतलब यह हुआ कि सिर्फ प्रत्यक्ष संवाद से ही हमारे संबंध प्रभावित नहीं होते बल्कि संवाद के ऐसे जरिए, जिन पर हम ज्यादा ध्यान नहीं देते वे भी इसे प्रभावित करते हैं."

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ऐसी कोई भी बात जो आपको अपने नापसंद दोस्तों की याद दिलाती है, आपके शरीर में इस तरह के बदलाव पैदा कर सकती है.

इस तरह अगर देखा जाए तो 'यारदुश्मन' हममें सबसे ज़्यादा तनाव पैदा करते हैं. इसका आंशिक कारण तो उनका अविश्वसनीय होना है. हॉल्ट-लुंस्ताद का कहना है, "यह चिंता हमेशा ही रहती है कि क्या वह हमारे साथ होगा या ऐसा तो नहीं कि आकर फिर किसी पुराने घाव को हरा कर जाएगा?"

शोधकर्ता कहते हैं कि किसी दुश्मन के बुरे व्यवहार को नज़रअंदाज़ करना आसान है, क्योंकि हमारे लिए उनका ज़्यादा महत्व नहीं होता लेकिन दोस्त जब दुश्मनी करते हैं तो ऐसा नहीं होता, आप आहत करने वाले संवादों के बारे में लंबे समय तक बार-बार सोचते रहते हैं.

डीएनए तक पर असर

अभी तक इस अध्ययन ने 'यारदुश्मन' के असर को शॉर्टटर्म में ही परखा है पर अब वे यह जानना चाहेंगे कि वर्षों और दशकों तक ये हमें कैसे प्रभावित करते हैं.

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दुर्भाग्य से लोगों के संबंधों के विशेष लक्षणों से जुड़े बहुत ही कम आंकड़े उपलब्ध हैं, लेकिन शोधकर्ताओं के पास एक स्वयंसेवी के डीएनए को हुए नुकसान की कुछ जानकारियां हैं पर ये पुख्ता वैज्ञानिक जानकारी नहीं है.

हमारी कोशिका में क्रोमोजोम पर मौजूद डीएनए के दोनों सिरे 'टीलोमीयर्स' से ढके होते हैं. हमारी उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, टीलोमीयर्स का क्षरण होता जाता है और हमारी कोशिका को इसकी वजह से कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, जिनमें कैंसर विकसित होना भी शामिल है.

यही कारण है की कोशिकीय उम्र का पता लगाने के लिए टीलोमीयर्स की लंबाई का सहारा लिया जाता है- और ऐसा समझा जाता है कि यह तनाव से प्रभावित होता है. शोधकर्ताओं ने पाया कि अस्थिर मित्रों को साथ लेकर चलने वालों में टीलोमीयर छोटे होते हैं.

अगर आगे होने वाले अध्ययन इन तथ्यों का समर्थन करते हैं तो हम सबको अपने दोस्तों के बारे में फिर से सोचने की जरूरत है और यह तय करना होगा कि इनसे होने वाली तकलीफ़ों को देखते हुए इनके साथ बने रहना ठीक है या नहीं.

पर दुर्भाग्य से अपने सामाजिक संपर्कों से यारदुश्मनों को निकाल फेंकना आसान नहीं है, विशेषकर यह देखते हुए कि अक्सर ये मित्रता उम्र भर के लिए होती है.

वफ़ादारी

लोगों से अपने 'यारदुश्मन' के साथ संपर्क बनाए रखने का कारण पूछने पर तो कइयों ने वफ़ादारी की बात कही.

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हॉल्ट-लुंस्ताद कहती हैं, "कई वर्षों की जान-पहचान होने के कारण हम उनके प्रति एक तरह की प्रतिबद्धता महसूस करते हैं."

कुछ ऐसे भी थे जो इसको लेकर नैतिकता वाला रवैया रखते हैं. ऐसे लोगों का कहना था, "हमें बड़प्पन दिखाना चाहिए और एक गाल पर चांटा खा चुकने से दुखी हुए बिना दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिए."

'यारदुश्मन' से निपटने के लिए जानकार क्या उपाय सुझाते हैं?

उपाय

एक्सपर्ट मानते हैं कि हमें अपने यारदुश्मन से बात करनी चाहिए और उसे मामले के बारे में पूरे तफसील से समझाना चाहिए ताकि हम किसी आपसी सहमति पर पहुँच सकें.

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लोग अक्सर अपने 'यारदुश्मन' से सीधे-सीधे नहीं निबटते, अमूमन अपने इस तरह के मित्रों से झूठ बोलते हैं, उनकी अनदेखी करते हैं या फिर उनसे कन्नी काट लेते हैं.

एक्सपर्ट इस बात की संभावना भी तलाश रहे हैं कि क्या ध्यान (मेडिटेशन) इससे पार पाने में मदद कर सकता है या नहीं.

कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि अपने जाननेवालों या यहाँ तक कि अपने 'यारदुश्मन' की अच्छाइयों के बारे में ध्यान करने से मानसिक स्थिति और स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है.

सबसे अहम बात यह है कि सभी शोध तनाव दूर करने और मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने में 'मेडिटेशन' की भूमिका को स्वीकार करते हैं.

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