थार में मुरझाए चेहरे और खिलते कालीन

- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
बारह से चौदह वर्गफुट के कमरे में एक व्यक्ति अलग-अलग रंगों का नाम लेता है.
कुछ सेकेंड के बाद चार बच्चे एक सुर में जवाब देते हैं और साथ में छोटी उंगलियों की मदद से ऊन को धागों के फंदों में लगाते रहते हैं. ऐसे दृश्य थार के कई गांवों में नज़र आते हैं.
थार के रेगिस्तान में पिछले दो साल से पड़ रहे अकाल ने कालीन बनाने के कारोबार को एक नया जीवन दिया है. लेकिन इस अनौपचारिक उद्योग का शिकार आमतौर पर सात साल से 16 साल की उम्र के बच्चे बन रहे हैं.
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12 साल के सोजू मेघवाड़ 12 घंटे काम करते हैं. उन्होंने बताया वह सुबह सूरज उगते ही काम पर आ जाते हैं और सूर्यास्त के बाद ही घर लौट पाते हैं.
इस पूरे समय में केवल आधा घंटा खाने के लिए छुट्टी होती है जिसमें वो सूखी रोटी और प्याज खाते हैं. कभी-कभी वो घर से सब्जी भी लाते हैं.
सोजू मेघवाड़ कहते हैं, "अगर उंगलियां घायल हो जाएँ तो फिर छुट्टी मिलती है और वह खेल सकते हैं. वरना इस काम से बचने का का कोई रास्ता नहीं है जहां 11 घंटे बैठने की वजह से उनके घुटने रात भर दर्द करते हैं."
सोजू मेघवाड़ छाछरो तहसील के छापर दीन मोहम्मद गांव के रहने वाले हैं. इस गांव में 30 से अधिक कालीन बनाने के केंद्र चल रहे हैं जिनमें हाथ से कालीन बनाए जाते हैं. छोटे से कमरे में ये बच्चे 11 घंटे उकड़ु बैठकर रंगीन ऊनी धागों में उलझे रहते हैं.
रोज़ की मज़दूरी

घास की छत वाले कमरे में रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही इन बच्चों ने रेशमी धागों से निकलने वाली धूल से फेफड़ों को बचाने के लिए मास्क पहने हैं.
हीरो मेघवाड़ इस कारखाने के मालिक और कारीगर भी हैं. वह 400 रुपए फुट के हिसाब से बिचौलिये को तैयार कालीन बेचते हैं.
उनका कहना है, "इस राशि में से 12 हज़ार रुपए ख़र्च का निकल जाता है जबकि बाक़ी पैसे चार मज़दूर और मिस्त्री आपस में बांट लेते हैं. प्रति कारीगर 100 रुपए और मिस्त्री 150 रुपए प्रतिदिन हिस्से में आता हैं."
हीरो बताते हैं, "किसी बच्चे के हिस्से में 30 रुपए तो किसी के हिस्से में 50 रुपए आते हैं. जिस बच्चे को काम में जितनी महारत हासिल है उसे उतनी मज़दूरी मिल जाती है लेकिन फिर भी यह मज़दूरी 100 रुपए से अधिक नहीं बनती."
पढ़ाई की जगह काम

इसी गांव के मूलचंद मेघवाड़ बताते हैं कि गांव में सरकारी स्कूल की इमारत मौजूद हैं, लेकिन शिक्षक नहीं है. उन्होंने अधिकारियों को लिखित शिकायत भी की थी लेकिन इस पर कोई अमल नहीं किया गया.
गांव के कुछ लोगों ने मिलकर एक युवक को पढ़ाने के लिए रखा है जो प्रति बच्चा 100 रुपए फ़ीस लेता है.
मूलचंद कहते हैं, "गांव में पढ़ने का रुझान तो था लेकिन अकाल के बाद लोग कहते हैं कि 100 रुपए शिक्षक देने के बजाय यदि 50 या 100 रुपए घर आ जाएं तो बेहतर है, इसलिए माता-पिता बच्चों को काम पर लगा देते हैं."
थार में अकाल के दौरान खाने की कमी और अन्य बीमारियों के कारण बच्चों की मौतों का सिलसिला रुक नहीं सका है.
थार का रेगिस्तान

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थार में राहत समिति के प्रमुख ताज हैदर का कहना है कि पिछले कुछ महीनों से अब तक 473 लोग मारे गए हैं, जबकि सरकार ने प्रति परिवार चार बार आधा किलो गेहूं वितरित किया है.
थार के रेगिस्तान में बच्चों की जिम्मेदारी भी बड़ों से कम नहीं हैं. यह बच्चे कुएं से पानी निकालने के लिए जानवरों को हांकते हैं, और उन्हें पानी पिलाना भी उन्हीं की ज़िम्मेदारी होती है.
सिंध के पिछड़े इलाक़े में बच्चों के लिए मनोरंजन के अवसर लगभग न के बराबर हैं जहां रेत के कारण बच्चों के पास खेल-कूद के ज़्यादा विकल्प नहीं होते.
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