क्या होगा आईएसआई के नए प्रमुख का एजेंडा?

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- Author, ओवेन बेनेट्ट-जोंस
- पदनाम, बीबीसी न्यूज
पाकिस्तान में लेफ्टिनेंट जनरल रिज़वान अख़्तर ने देश की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेस इंटेलिजेंस (आईएसआई) के प्रमुख का कार्यभार संभाल लिया है.
आमतौर पर अधिकांश खुफिया एजेंसियां के सामने राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल अहम होता है, लेकिन आईएसआई का दख़ल पाकिस्तान के लगभग सभी पहलुओं में है.
पाकिस्तान में एक ओर जहां तालिबानी जिहादी तख़्तापलट की कोशिशों में जुटे हैं, वहीं बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं और धार्मिक कट्टरपंथी बड़े पैमाने पर लोगों की हत्याएं कर रहे हैं.
इधर, अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका की वापसी के कारण पाकिस्तान के लिए स्थितियां विकट हो गई हैं और उसके अंतराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने की स्थिति पैदा हो गई है.
इन हालात में आईएसआई के नए प्रमुख के सामने कौन-कौन सी गंभीर चुनौतियां होंगी?
पढिए, ओवेन बेनेट्ट-जोंस का विश्लेषण
अमरीका के कई वरिष्ठ अधिकारी पाकिस्तान के आलोचक रहे हैं.

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अमरीका में हुए 11 सितंबर के चरमपंथी हमले के बाद पाकिस्तान को अमरीका से अरबों डॉलर की सहायता मिली, जिसमें से अधिकांश रकम आईएसआई के ज़रिए दी गई.
आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान को उसकी दोहरी नीति के बावजूद यह राशि उसे इनाम देने जैसा है.
कई अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि अफ़ग़ान तालिबान को पाकिस्तान की मदद करने के कारण अफ़गानिस्तान में अमरीका की कई वर्षों की लड़ाई नाक़ाम रही.
इन आरोपों में दम है या नहीं, यह तो अलग बात है, लेकिन जनरल अख़्तर पाएंगे कि कई अमरीकी अधिकारी उनकी बातों पर यक़ीन नहीं कर रहे हैं. दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास ख़त्म हो गया है.
रिश्ते जितने भी कटु हों, लेकिन अख़्तर को पता है कि अमरीका परमाणु शक्ति संपन्न देश होने के नाते पाकिस्तान की पूरी तरह से अनदेखी कर सकता.
जब पाकिस्तान की सत्ता जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के हाथों में थी और अख़्तर ब्रिगेडियर थे, तब उन्होंने एक बार अमरीका में "भारत के साथ घनिष्ठता बढ़ाने" की बात कही थी.
यह बात उस समय की है, जब मुशर्रफ़ कश्मीर को लेकर भारत के साथ समझौते की बातचीत कर रहे थे.
भारत के साथ तनाव

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लेकिन अब माहौल बहुत अलग है. भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर दौरा किया है और उनकी पार्टी भाजपा ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाली धारा 370 को समाप्त करने की बात कही है.
पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान और भारत की सीमा पर भी तनाव बढ़ा है. दोनों देश के सेनाओं की ओर से नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी तेज़ हुई है.
पाकिस्तान की सेना में इस बात को लेकर हताशा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कश्मीर मुद्दे को ज़्यादा तवज्जो नहीं मिल रही है और यह मुद्दा अनसुलझा है.
ऐसे में जनरल अख़्तर पर उनके सैन्य सहयोगियों की ओर से दबाव होगा कि कश्मीर मसले पर अधिक मुखर हो और मोदी का सामना करें.
लेकिन उनके लिए विकल्प सीमित हैं.
अफ़ग़ानिस्तान सीमा

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पाकिस्तान अपने पश्चिमी सरहद पर भी अनिश्चितता का शिकार है.
सोवियत विरोधी जिहाद के समय से ही आईएसआई अफ़ग़ानिस्तान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आई है.
पाकिस्तानी तालिबान ने कई आईएसआई अधिकारियों की हत्या की है. कई शीर्ष तालिबान कमांडरों ने अफगानिस्तान में शरण ले रखी है.
जनरल अख़्तर पर अफ़ग़ान तालिबानों के साथ संवाद बनाने की चुनौती भी होगी.
राजनीतिक अस्थिरता
घरेलू मोर्चे पर आईएसआई का रुतबा ज़रूर क़ायम है.
पाकिस्तान के सबसे बड़े निजी टीवी चैनल जियो ने जब अपने एंकर हामिद मीर पर हमले के लिए आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया, तब आईएसआई ने जियो न्यूज को बंद करने की मांग की थी.

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इस मांग पर अमल भी हुआ और जियो टीवी का प्रसारण रोक दिया गया.
इसका असर ये हुआ कि जियो ही नहीं, कई दूसरे चैनलों ने आईएसआई के संदेश को समझा और पाकिस्तान के टीवी पत्रकार अब पहले के मुक़ाबले ज़्यादा डरे हुए हैं.
लेकिन आईएसआई के मीडिया पर दबदबे के बावजूद इसे गंभीर राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ देशद्रोह के आरोपों में घिरे पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को सज़ा दिलाने से किसी भी तरह पीछे हटते नज़र नहीं आ रहे हैं.
पाकिस्तानी सेना के कई अधिकारी इस बात से नाराज हैं और वे शरीफ़ को सत्ता से बेदखल कर देना चाहते हैं. और यह आईएसआई की मदद के बिना संभव नहीं है.
आईएसआई प्रमुख को इन परिस्थितियों से निपटने के लिए अधिक धैर्य और संतुलन की ज़रूरत होगी.
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