वाघा सरहद पर बेहद नफ़रत का जश्न क्यों?

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- Author, स्वतंत्र मिश्र
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत और पाकिस्तान की वाघा सीमा पर दोनों देशों के सैनिक दोनों ओर से सैकड़ों दर्शकों की मौजूदगी में नियमित परेड करते हैं.
इस दौरान दोनों तरफ़ से लोग एक-दूसरे के देश के ख़िलाफ़ ज़ोरदार नारे लगाते हैं, यहाँ तक कि दोनों तरफ के सैनिक आम लोगों को इसके लिए प्रेरित भी करते हैं.
दो पड़ोसी देशों के आम नागरिकों में इस तरह की भावना भरना कहाँ तक सही है?
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कुलवंत तांगेवाले ने वाघा बॉर्डर के बारे में जिक्र छिड़ते ही चुप्पी साध ली.
बहुत कुरेदने पर कहा कि हमारे पिताजी पश्चिमी पंजाब से अमृतसर आए थे. देश की आजादी के साथ-साथ हमने घृणा का बीज भी बो दिया. अब घृणा का पेड़ बहुत बड़ा हो गया.
उसकी बात हमें तब सच लगने लगी जब वाघा बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल के सैनिक और अधिकारी दैनिक परेड के समय दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों से पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने को कह रहे थे.
वाघा बॉर्डर पर हर रोज शाम छह बजे दोनों ही देश के सैनिक बल अपने-अपने देश का झंडा उतारने की रस्म पूरी करते हैं और खून में उबाल लाने की हद तक गर्मजोशी से मार्च करते हैं.
नारे और सीटियां

दोनों ही देशों के सैनिक भारी-भरकम बूट से लदे और रौब दाब के साथ अपना-अपना पैर एक-दूसरे के सामने पटकते हैं.
उधर जमीन हिलती है और इधर दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों की दिल की धड़कनें तेज़ होने लगती हैं. वे तालियां, सीटियां बजाते हैं और वंदे मातरम और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं.
सीमा के उस पार भी ऐसा ही नज़ारा होता है.
सीमा पार के एक मित्र ने ईमेल के जरिए बताया, "शाम के समय लोग टहलते हुए मनोरंजन के ख्याल से वाघा बॉर्डर की ओर निकल जाते हैं. वहां कुछ उग्र किस्म के लोग हिंदुस्तान के खिलाफ नारे लगाते हैं और वहां उपस्थित अन्य लोगों के लिए नारा लगाने के अलावा कोई और चारा नहीं रह जाता है. ऐसा सेना बल की उपस्थिति में और एक हद तक उनके इशारों पर होता है."
बेताब भीड़

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भारत की ओर दर्शक दीर्घा में दो हजार से ज्यादा नहीं बैठ सकते हैं लेकिन पाँच अक्तूबर की शाम कम से कम चार-पाँच हजार लोग बैठे थे. अंदर और बाहर मिलाकर 15-20 हजार लोग बॉर्डर पर पहुंचे हुए थे.
दर्शक दीर्घा में पहुंचने के लिए युवक दीवार फांदने से लेकर हर जोखिम तक उठाने को तैयार दिख रहे थे.
युवतियां भी दीर्घा तक पहुंचने के लिए सैन्य बलों से जूझती हुई दिख रहीं थीं. महज संयोग है कि इसी तारीख को जम्मू-कश्मीर की ओर लग रही सीमा पर भारत और पाकिस्तान के बीच गोलीबारी हुई.
वाघा बॉर्डर अमृतसर शहर से करीब 30 किलोमीटर और पाकिस्तान के लाहौर से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पर है लेकिन भारत की ओर से सीमा पर पहुँचने वाले लोगों की तादाद 15 गुना तक ज़्यादा होती है.
अमनपसंद लोगों की माँग

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भारत की तरह पाकिस्तान के भी अमनपसंद लोग इस परेड को या तो बंद किए जाने की मांग करते रहे हैं और वे यह चाहते हैं कि इसे जनता के लिए न खोला जाए.
जनता को इस इलाके में ऐसी जगह दी जानी चाहिए जहाँ वे आपस में मिल-बैठकर बातचीत कर सके और आपसी कटुता को मिटा सकें.
वाघा बॉर्डर पर मुझे लगभग 13-14 साल पहले भी एक बार जाने का मौका मिला था. सूरत तब भी कमोबेश ऐसी ही थी लेकिन अब भीड़ बढ़ गई है. पहले यहां गाडि़यों के लिए एक या दो पार्किंग हुआ करती थी लेकिन अब 10-12 पार्किंग हैं.
पहले चार-पांच बजे तक पहुंचने पर भी दर्शक दीर्घा में सीट मिल जाया करती थी पर अब सैनिकों ने बताया कि आपको अंदर बैठने की जगह चाहिए तो दो बजे से पहले पहुंचना पड़ेगा. छुट्टी वाले दिन तो बारह-एक बजे तक आना होगा.
तस्वीरें

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वीआईपी लोगों को दर्शक दीर्घा तक पहुंचाने के लिए अलग दरवाज़े हैं. सैनिकों के परिवार के लोगों को प्रवेश आसानी से मिल जाता है.
सामान्य लोगों में से जिन लोगों को अंदर जगह मिल गई वे तो ठीक होते हैं, अन्यथा वे दर्शकदीर्घा से बाहर इधर-उधर भटकते रहते हैं.
ये लोग बाहर खड़े सैनिकों के घोड़ों के साथ अपनी या अपने बच्चों की तस्वीरें खिंचवाने में जुट जाते हैं. यह पूछने पर कि इन फोटों का क्या करेंगे, वे मुस्कराते हुए कहते हैं, "फेसबुक और ह्वाटशेप पर शेयर करेंगे."
वाघा बॉर्डर पर सबसे ज्यादा डिमांड प्लास्टिक से बनी बड़ी-बड़ी बंदूकों की रहती है.
आपकी देह से लेकर चेहरे पर तिरंगा चस्पां करने के लिए कम-से-कम एक दर्जन युवा कारोबारी बेताब दिखते हैं.
देशभक्ति

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ये कारोबारी आपको यह अहसास कराते हैं कि अगर आप झंडा चेहरे पर बनवाते हैं तो आप आला दर्जे के देशभक्त हैं अन्यथा वे थोड़ी हिकारत से भरी नजरों से देखते हुए आपसे विदा लेते हैं.
रेहड़ी-पटरी वाले कारोबारी भारतीय वर्दी वाले सिपाहियों के साथ काली वर्दी वाले पाकिस्तानी फौजियों के पुतले भी बेचते हैं.
यहां पाकिस्तान में बने शाल और लकदक वाली जूतियां भी खूब बिकती हैं. पाकिस्तान में बनी चटक रंगों और लश्कारों वाली जूतियां तो अमृतसर के चप्पे-चप्पे पर खरीदी-बेची जाती हैं.
अमृतसर और लाहौर में जीवन सामान्य चलता रहता है तो फिर सीमा पर इस जश्न की किसको दरकार है!
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