मलाला को नोबेल, विरोध में उठी आवाज़ें

मलाला यूसुफ़ज़ई

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    • Author, एम इलियास ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

किसी को नोबल पुरस्कार मिलना आम तौर पर उसके देश में राष्ट्रीय उल्लास का मौका होता है, लेकिन पाकिस्तान में मलाला यूसुफ़ज़ई के नोबेल जीतने की ख़बर पर मिलीजुली प्रतिक्रिया सामने का आ रही है.

मलाला शांति का नोबल पुरस्कार जीतने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्ति बन गई है.

मलाला की जीत पर जहां एक ओर खुशी मनाई जा रही है वहीं दूसरी ओर इसको लेकर विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं.

सोशल मीडिया पर बधाई संदेश के साथ-साथ अपमानजनक और व्यंग्यात्मक लहजे वाली टिप्पणियां भी देखने को मिल रही हैं.

प्रतिक्रिया

पाकिस्तानी टीवी चैनलों में भी इसको लेकर कोई होड़ मचती हुई नहीं दिखी जो अमूमन किसी ख़बर को लेकर दिखती है.

कई पाकिस्तानियों को तो ये भी नहीं पता है कि मलाला को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.

'पाकिस्तान ऑब्ज़र्वर' अख़बार के संपादक तारिक़ खटाक़ ने इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए बीबीसी कहा, "यह एक राजनीतिक फ़ैसला है और एक साजिश है."

उन्होंने मलाला के बारे में कहा, "वे एक साधारण और बेकार सी लड़की है. उनमें कुछ भी ख़ास नहीं है वह वो काम कर रही हैं जो पश्चिम के देश चाहते हैं."

पाकिस्तान में जश्न

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इस तरह की बातें ज्यादातर लोगों को समझ से बाहर लगेंगी लेकिन मलाला को सिर में गोली मारे जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उनकी छवि सकारात्मक रूप में बनी है.

उत्साह

पाकिस्तान का स्कूल

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हां, लेकिन ज्यादातर राजनेताओं ने इसकी सराहना की है.

प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ ज़रदारी ने मलाला को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी और इसे देश का सिर ऊंचा करने वाला बताया है.

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में कुछ लड़कियों ने शुक्राना की नमाज़ भी पढ़ी.

लेकिन पाकिस्तान में मलाला के अपने शहर मिनगोरा में इस ख़बर पर कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा. मिनगोरा पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक शहर है.

ये वही शहर था जहां मलाला ने तालिबान के सख़्त आदेश को नज़रअंदाज करते हुए पढ़ने के लिए साहस भरा कदम उठाया.

रोल मॉडल

मलाला पर किताब

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इमेज कैप्शन, मलाला गुल मकाई के नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखा करती थीं.

मलाला पहली बार सुर्खियों में वर्ष 2009 में आईं जब 11 साल की उम्र में उन्होंने तालिबान के साए में ज़िंदगी के बारे में गुल मकाई नाम से बीबीसी उर्दू के लिए डायरी लिखना शुरु किया.

मलाला उस वक्त अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छा गईं जब चरमपंथियों ने 2012 में उनके सिर में गोली मारी थी. ब्रिटेन में लंबे इलाज के बाद वे ठीक हो पाईं.

कई पाकिस्तानी शिक्षा को लेकर उनकी प्रतिबद्धता और साहस के लिए तारीफ़ करते हैं.

कुछ लोग उन्हें पश्चिम की कठपुतली मानते हैं जिसे अमरीका ने पाकिस्तान के मुसलमानों को बरगलाने के लिए रोल मॉडल बनाया हुआ है.

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