पाकिस्तान में शरीफ़ की ख़ामोशी पर सवाल

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- Author, हारून रशीद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान और भारत के बीच नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा पर जारी हिंसा का ताज़ा सिलसिला कोई नई बात नहीं है.
पिछले एक साल से ये झड़पें रुक-रुककर जारी हैं. ये कैसे शुरू होती हैं किसी को नहीं मालूम लेकिन इन्हें रोकने के लिए भी अभी तक कोई असाधारण क़दम नहीं उठाया जाता है.
हिंदुस्तान की तरह ही पाकिस्तान में भी कई लोग प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की इस हिंसा पर ख़ामोशी पर सवाल उठा रहे हैं.
भारत के लिए हर समय नरम रवैया रखने वाले प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के बारे में तो ट्विटर पर कुछ लोगों ने तो यह तक लिख दिया है कि वे ख़ामोशी से सियालकोट को भारत को दो देंगे लेकिन बोलेंगे नहीं.
लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बयानों से तनाव को कम करने में मदद नहीं मिलेगी बल्कि वो आग में घी का काम कर सकते हैं.
कोशिशें 'बैक चैनल डिप्लोमेसी' (पर्दे के पीछे बातचीत) की ज़्यादा हैं.
सावधान बयान

भारतीय रक्षा मंत्री के सख़्त बयान के बाद पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने भी एक सावधान करने वाला लेकिन सख़्त बयान जवाब में दाग़ा है.
रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ़ का, जो इन दिनों वाशिंगटन में हैं, कहना था कि भारत को और सावधानी और ज़िम्मेदारी का सबूत देना चाहिए ना कि सख़्त बयानात़ का. पाकिस्तान भी भारत को उचित जवाब देने की क्षमता रखता है. हम दोनों देशों के बीच इस तनाव को मुठभेड़ में तब्दील नहीं होने दिया जाना चाहिए.
पाकिस्तानी सेना तो बेहद सावधानी से झड़पों के बारे में बयान जारी कर रही है जिनमें मारे गए लोगों की तादाद कम होती है लेकिन पाकिस्तान की इलेक्ट्रानिक मीडिया एक बार फिर भारत के ख़िलाफ़ बेहद सख़्त ज़बान बोल रही है.
एक टीवी चैनल का कहना था कि भारत की आक्रामकता, पाकिस्तान का जबरदस्त जवाब. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे तनाव में कमी मदद नहीं मिल रही है.
पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों का आरोप है कि भारत की ओर से हमलों में हर बीतते दिन के साथ ज़्यादा तेज़ी आती जा रही है और ये तनाव कई दशकों के बाद देखने को मिल रहा है.

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अहम बैठक
पिछले साल जनवरी में दोनों सेनाओं के बीच झड़पों के बाद भी अधिकारियों ने इसे एक दशक की अब तक का सबसे भीषण तनाव क़रार दिया था.
पाकिस्तानी के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व के सबसे ऊँचे मंच राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की एक बैठक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की अध्यक्षता में होने जा रही है. माना जा रहा है कि इस बैठक में तनाव को कम करने की कोशिश होगी. देखना यह है कि ये बैठक इसे कैसे संभव कर पाती है.
दोनों पड़ोसी देशों में नई सरकारें आने के बाद उम्मीद बंध चली थी कि बातचीत का रुका हुआ सिलसिला दोबारा शुरू हो जाएगा. लेकिन मौजूदा हालत में ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दो रहा है. कुछ लोग ये सोचने पर भी मजबूर हैं कि क्या इस ताज़ा तनाव के पीछे बेहतर रिश्तों के दुश्मन तो नहीं?
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