कैसे ख़त्म होगा सीमा पर जारी तनाव?

कश्मीर फ़ायरिंग

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    • Author, सुशांत सरीन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान के बीच जारी मौजूदा तनाव 2003 में दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम लागू होने के बाद से अब तक का सबसे गंभीर और नुक़सान पहुँचाने वाला है.

पिछले कुछ सालों से संघर्ष विराम के उल्लंघन में परेशान करने वाली नियमितता आई है (पिछले साल ही 300 से ज़्यादा बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ) और अब ये सामान्य बात बन गई है.

सामान्यतः गंभीर रूप धारण कर लेने वाली ये घटनाएं दुर्घटनावश या जानबूझकर किसी योजना के तहत की गई फ़ायरिंग से शुरू होती हैं और फिर दोनों ओर से फ़ायरिंग में तेज़ी आ जाने पर दिल्ली और इस्लामाबाद में ख़तरे की घंटियाँ बजने लगती हैं.

दोनों पक्ष फिर से संघर्ष विराम लागू करने के लिए क़दम उठाते हैं, अगली बार फिर से यही चक्र शुरू होने तक के लिए.

नई सरकार और गोलीबारी

लेकिन इस बार गोलीबारी की तीव्रता और आवृत्ति ज़्यादा है. ये बारंबार हो रही है. सीमा पर गोलीबारी के इस नए दौर में नागरिकों पर सीधे हमले करने के ख़तरनाक़ और उकसाने वाले चलन की शुरुआत हुई है.

ताज़ा तनाव में संघर्ष विराम का पहला बड़ा उल्लंघन तब हुआ जब अगस्त में भारत ने पाकिस्तान पर गोलीबारी शुरू करने के आरोप लगाए. दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के बाद पाकिस्तान की ओर से फ़ायरिंग को मोदी सरकार की पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सख़्त जबावी कार्रवाई करने की परीक्षा के रूप में देखा गया.

कश्मीर में बीएसएफ़ के जवान

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भारतीय सेनाओं को 'मुँहतोड़ जबाव देने के' निर्देश दिए गए, और यही उन्होंने किया. तनाव में बढ़ोत्तरी और नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कई इलाक़ों में लगातार हो रही गोलीबारी के बावजूद साड़ी-शॉल कूटनीति कर रहे दोनों देशों में फ़ोन की घंटियाँ बजने लगीं और सैन्य अभियानों के महानिदेशालयों से गोलीबारी रोकने के लिए कहा गया.

कुछ दिनों की शांति के बाद गोलीबारी फिर से शुरू हो गई और पिछले कई हफ़्तों से जारी है. लेकिन ये तब तक सुर्खियां नहीं बनीं जब तक जान-माल का नुक़सान नहीं हुआ. कुछ दिन पहले जब गाँवों को जानबूझकर निशाना बनाया गया और बीएसएफ़ के एक जवान की मौत हो गई तब से हालात बेहद ख़राब हो गए.

भारत ने इसका ज़ोरदार जबाव दिया और भारत पर संघर्ष विराम का दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान ने भारतीय गाँवों को निशाना बनाया.

लेकिन हुआ इसके ठीक उलट और भारत के और तेज़ कार्रवाई करने से हालात और ख़राब हो गए.

हालात ख़राब

भारत के जवाब से पाकिस्तान को ये अहसास हो जाना चाहिए था कि अब भारत ने दस्ताने उतार दिए हैं.

नियंत्रण रेखा
इमेज कैप्शन, भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर दोनों ओर से गोलीबारी होना आम बात है.

सेना को नियंत्रण रेखा पर कड़ी प्रतिक्रिया देने, पाकिस्तान की ओर सो गोलीबारी बंद होने तक फ्लैग मीटिंग न करने और हालात ख़राब होने से ब्लैकमेल न होने का निर्देश देकर मोदी की सरकार ने ये साफ़ ज़ाहिर कर दिया कि वह उकसावे की कार्रवाई के बाद पीछे नहीं हटेगी भले ही परिणाम कुछ भी हों.

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मोदी किसी के साथ युद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि ये उनके विकास के मार्ग से हटना होगा लेकिन यदि कोई मैदान में उतरकर उन्हें चुनौती देगा तो वो शांति की बात भी नहीं करेंगे.

ये संदेश अगस्त में ही पाकिस्तान को स्पष्ट हो जाना चाहिए था. अब सवाल ये उठता है कि फिर उन्होंने ऐसी कार्रवाई क्यों की? इसका एक नीरस स्पष्टीकरण ये हो सकता है कि पाकिस्तान का उद्देश्य इतनी तेज़ी से हालात को नियंत्रण से बाहर करना नहीं था या पाकिस्तान ने भारतीय जबावी कार्रवाई का अंदाज़ा नहीं लगाया था.

कैसे कम हो तनाव?

इसका दूसरा स्पष्टीकरण ये हो सकता है कि पाकिस्तान जानबूझकर भारत के साथ लागू संघर्ष विराम को ख़त्म करना चाहता है ताक़ि कश्मीर में घुसपैठ में मदद कर सके. ये पाकिस्तान के अंदरुनी हालात की रोशनी में सही बैठती है.

वहां भारत विरोधी जेहादी नेटवर्क फिर से सक्रिय हो गए हैं. जम्मू-कश्मीर में चुनावों को प्रभावित करना और कश्मीर में बाढ़ के बाद के हालात का फ़ायदा उठाकर फिर से विद्रोह को बढ़ावा देने की चाह भी एक कारण हो सकता है.

नियंत्रण रेखा पर भारतीय जवान

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इसका नीरस स्पष्टीकरण सही हो या ज़्यादा ख़तरनाक़ वाला सही हो, फौरी समस्या यह है कि तनाव को कम कैसे किया जाए? पिछले साल अगस्त में भी यही समस्या थी लेकिन तब किसी तरह इसका समाधान निकल गया था.

इस बार हालात ज़्यादा मुश्किल हैं क्योंकि दोनों पक्षों में से जो भी पहले फोन करेगा उसे अपने देश के भीतर साख पर बट्टा लगाने का ख़तरा उठाना होगा.

इससे भी ख़राब स्थिति दोनों पक्ष यह ज़रूर सोच रहे होंगे कि यदि वे पहले शांति की बात करते हैं तो इससे दूसरी ओर क्या संदेश जाएगा?

समस्या यह है कि यदि हालात ठीक नहीं हुए तो ये और बिगड़ते जाएंगे. ये बात कहाँ जाकर ख़त्म होगी, यही सवाल सबसे परेशान करने वाला है और इसका अभी कोई जबाव भी नहीं है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं, जिसे बीबीसी ने यहाँ प्रस्तुत किया है.)

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