ग़ज़ा: हमास और इसराइल को क्या मिला?

ग़ज़ा में संघर्ष विराम की ख़ुशी मनाते लोग

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    • Author, डेविड कोनोली
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज, जेरूसलम

इसराइल और हमास के बीच हुए संघर्ष में 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए, कई लोग बेघर हो गए और आर्थिक नुकसान जो हुआ सो अलग.

संघर्ष विराम तो हो गया लेकिन संघर्ष विराम को हासिल करने की क़ीमत को लेकर सवाल पूछे जा सकते हैं.

हमास से पूछा जा सकता है कि हालात तो अब भी संघर्ष शुरू होने से पहले जैसे ही हैं. इसराइल सरकार को ये बताना पड़ सकता है कि उसने अभियान हमास की निश्चित हार तक क्यों नहीं चलाया.

ग़ज़ा की ख़ुशी

हमास की रणनीति इसे एक जीत बताने की है.

हमास के प्रवक्ता समी अबु ज़ूहरी ने अपने लोगों से 'इस जीत का जश्न मनाने' को कहा. लेकिन स्थिति इतनी साफ़ नहीं है.

हालांकि सार्वजनिक रूप से ऐसे सबूत तो नहीं है लेकिन ये अनुमान है कि हमास की सैन्य क्षमता बुरी तरह कम हुई है.

ग़ज़ा में अपने टूटे घर पर बैठा एक फ़लस्तीन

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इसने अपने सैकड़ों लड़ाकों और बड़े नेताओं को भी खोया है.

हमास का नुक़सान

मिस्र और इसराइल ने ग़ज़ा की सीमाओं पर जितना कठिन नियंत्रण किया है, उसे देखते हुए लगता है कि हमास को अपने हथियारों के नुक़सान की भरपाई में काफ़ी कठिनाई होगी.

ग़ज़ा में रोती एक पीड़ित महिला

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ग़ज़ा में लोकतंत्र नहीं है इसलिए हमास को अपने नागरिकों के प्रति किसी तात्कालिक ज़वाबदेही को लेकर चिंता करने की ज़रूरत नहीं है.

लेकिन लोग फ़ैसले के दो बिन्दुओं को लेकर सवाल उठाएंगे.

पहला यह है कि हमास ने इसराइल के साथ संघर्ष शुरू ही क्यों किया, जबकि संघर्ष के बाद भी हालत पहले जैसी ही रहेगी.

बेन्यामिन नेतन्याहू

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दूसरा सवाल है सिर्फ़ बातचीत के लिए राज़ी होने के लिए लंबी चौड़ी शर्त रखना, जैसे कि ग़ज़ा में एक बंदरगाह के निर्माण की शर्त.

विषम संघर्ष

इसराइल में भी भले ही सरकार जीत का दावा करे, इस बात को लेकर कई सवाल हैं कि आख़िर हासिल क्या हुआ.

इसराइली सैनिक

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इसराइल में इस बात पर हताशा है कि कहीं ज़्यादा बेहतर सैन्य क्षमता को वह ऐसे हालात में तब्दील नहीं कर सका जो जीत की तरह कुछ ज़्यादा लगे.

वहीं हमास बातचीत में शर्त रखते हुए शामिल हुआ और उसने इस पूरे इलाके में सबसे बढ़िया साजोसामान से लैस सेना का प्रतिरोध करने की क्षमता दिखाई.

संघर्ष विराम का भविष्य

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सच्चाई यह है कि अगर संघर्ष विराम को आगे बढ़ाना है तो दोनों पक्षों को निश्चित रूप से कुछ न कुछ रियायत देनी होगी.

दोनों पक्ष (जो कभी आमने-सामने नहीं मिलेंगे) अब भी एक दूसरे से नफ़रत करते हैं.

इसमें सबसे अच्छी बात जो कही जा सकती है वो ये है कि लड़ाई से बेहतर है कि वो बातचीत करें.

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