माहौल ख़राब कर रहे हैं मोदी: पाक मीडिया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दहशतगर्दी के लिए पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था. पाकिस्तानी मीडिया इसे विदेश सचिवों की बैठक के पहले माहौल ख़राब करने की कोशिश बता रहा है.
हालांकि भारत के उर्दू अख़बारों ने स्वतंत्रता दिवस पर मोदी के भाषण की सराहना की है.
पाकिस्तान के अंदरूनी राजनीतिक तूफ़ान को लेकर तहरीके इंसाफ़ पार्टी के नेता और पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान के हठ को पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों ने 'ग़ैरवाज़िब' क़रार दिया है.
पढ़ें भारत और पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों की समीक्षा
पाकिस्तानी मीडिया में देश का सियासी टकराव छाया है तो चर्चा भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की भी है.
पाकिस्तान की तरफ़ से परोक्ष युद्ध चलाए जाने के भारतीय प्रधानमंत्री के आरोप पर नवाए वक़्त का संपादकीय है - मोदी आरोप लगाने की बजाय कश्मीरियों को जनमत संग्रह का हक़ दें.

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अख़बार कहता है कि भारतीय सेना ने पूरी कश्मीर घाटी को छावनी में तब्दील कर लोगों को उनके घरों में क़ैद कर रखा है और ऐसे में अगर कश्मीरी अपने अधिकारों के लिए कोशिश भी करते हैं तो उसका इल्ज़ाम भी पाकिस्तान पर लगा दिया जाता है, जबकि वो तो ख़ुद दहशतगर्दी के शिकार हैं.
वहीं, जंग ने पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता के हवाले से लिखा है कि मोदी का आरोप दोनों के विदेश सचिवों की इस्लामाबाद में बैठक से पहले माहौल को ख़राब करने की कोशिश है.
नरमी की ज़रूरत
पाकिस्तान में इन दिनों उठे सरकार विरोधी तूफ़ान पर दैनिक दुनिया ने लिखा है कि पिछले साल हुए चुनावों में धांधली के आरोपों की जांच के लिए जब प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने जांच आयोग बनाने का ऐलान कर दिया है तो उसके बाद इमरान ख़ान को 'आज़ादी मार्च' को टालने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए था.
हालांकि, इमरान ख़ान यह कह कर मार्च निकालने पर डटे रहे कि नवाज़ शरीफ़ के रहते कोई भी जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती.

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दैनिक पाकिस्तान ने इमरान ख़ान के अडिग रवैये पर संपादकीय लिखा है - आरोप साबित होने से पहले ही सज़ा की मांग.
<bold>औसाफ़</bold> ने इसी बात को <link type="page"><caption> कार्टून</caption><url href="http://www.ausaf.pk/wp-content/uploads/2014-08-12/?pg=14" platform="highweb"/></link> के जरिए कहा है जिसमें इमरान ख़ान कान बंद किए दिख रहे हैं और नीचे पाकिस्तान मंत्री अहसन इक़बाल का बयान है - इमरान किसी की बात सुनने को तैयार नहीं.
इसी मुद्दे पर रोज़नामा एक्सप्रेस का संपादकीय है - सियासी तनाव, सख़्ती की नहीं, नरमी की ज़रूरत.
अख़बार कहता है कि अब भी वक़्त है, सरकार को चाहिए कि वो कोई सख़्ती न करे और विपक्षी पार्टियों को भरोसे में लेने के लिए क़दम उठाए जाएं.
वहीं पाकिस्तान की आर्थिक खस्ताहाली के मद्देनजर वक़्त के संपादकीय का शीर्षक है - राजनीतिक नहीं आर्थिक मार्च की जरूरत है.
यूपी में भाजपा को फ़ायदा
रुख़ भारतीय अख़बारों का करें तो सियासत ने स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी के भाषण पर लिखा है - लाल किले की प्राचीर से भाषण देने का मोदी का सपना तो पूरा हो गया है, लेकिन देश की जनता को विकास के जो सपने उन्होंने दिखाए हैं, उन्हें कैसे पूरा किया जाएगा, ये अभी तक साफ़ नहीं है.

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राष्ट्रीय सहारा ने कहा कि है मोदी ने आम आदमी को छूने वाले हर मुद्दे की बात की.
जदीद ख़बर कहता है कि बिहार में नीतीश-लालू गठबंधन की तरह उत्तर प्रदेश में मायावती ने मुलायम सिंह से हाथ मिलाने की बातों को ख़ारिज करके साफ़ कर दिया है. अख़बार का कहना है कि इससे आने वाले विधानसभा चुनावों में वहां बीजेपी का परचम ही लहराएगा.
<bold>(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें.</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> आप हमारे <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पन्ने पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












