मुझे भविष्य से नफ़रत है: 11 वर्षीय दाद

- Author, लिस ड्यूसेट
- पदनाम, बीबीसी मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता
अब युद्धों से जो सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं, वो हैं बच्चे और उनका बचपन. ग़ज़ा और सीरिया के बच्चे युद्ध की इस त्रासदी को सीधे तौर पर झेल रहे हैं.
पढ़ने-लिखने और खेलने की उम्र में वे भूख और भय से त्रस्त हैं. तंगहाली ने उनके जीवन को और दयनीय बना दिया है.
ग़ज़ा में हर घंटे एक बच्चे की मौत हो रही है तो सीरिया में विद्रोहियों और असद सरकार के बीच लड़ाई ने बच्चों की ज़िंदगी को मुहाल बना दिया है.
युद्ध के हालात ही उनके लिए अब रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुकी है.
पढ़िए लिस ड्यूसेट की रिपोर्ट
हमारे समय के युद्ध ऐसे संघर्ष बन चुके हैं जो सीधे सड़क पर या स्कूलों में लड़े जा रहे हैं.
अधिक से अधिक बच्चे इसके शिकार होते जा रहे हैं और उनका बचपन नष्ट हो रहा है. पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र ने पाया कि ग़ज़ा में हर घंटे एक बच्चे की मृत्यु हो रही है.
<link type="page"><caption> ग़ज़ा: मरने वालों की संख्या 1000 के पार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/07/140726_gaza_deathtoll_ia.shtml" platform="highweb"/></link>
ग़ज़ा से पहले सीरियाई बच्चों के हताहत होने की ख़बरों ने दुनिया को झकझोरा था.

इमेज स्रोत, Reuters
सीरिया में संघर्ष को तीन साल से ज़्यादा समय हो चुका है और यहां नवजात शिशु तक बंदूक के निशाने पर हैं.
दसियों लाख बच्चे भूख और भय के बीच जी रहे हैं और इनमें से अधिकांश युद्धग्रस्त इलाके में हैं.
सीरिया के हर दौरे के साथ यह अहसास बढ़ता गया कि बच्चे केवल हृदयविदारक रूदन और आकर्षक मुस्कान वाली आबादी ही नहीं है, बल्कि वे मोर्चे पर हैं और हमारे समय के युद्धों की जटिलता और परिणाम के बारे में अपनी-अपनी कहानी बयां करते हैं.
समझदार बच्चे
पिछले छह महीने से मैं और निर्देशक-कैमरामैन रोबिन बार्नवेल ने छह सीरियाई बच्चों के जीवन को देखा-समझा. उनकी कहानी दिल दहला देने वाली थी.

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इज़ादीन (9) ने बताया, ''मैं उम्र और दिखने में तो बच्चा हूं, लेकिन आत्मविश्वास और इंसानियत के लिहाज से नहीं. पहले 12 वर्ष को वयस्क माना जाता था. अब अगर आप 12 वर्ष के हैं तो आपको जिहाद में शामिल हो जाना चाहिए.''
इज़ादीन दक्षिणी तुर्की के एक शरणार्थी कैम्प में अपने एक किशोर भाई के साथ रहते हैं, जो पहले ही सीमा पर होने वाले युद्ध में शामिल हो चुके हैं.
<link type="page"><caption> ग़ज़ा: क्या हासिल करना चाहता है इसराइल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/07/140718_gaza_israel_analysis_sm.shtml" platform="highweb"/></link>
इसी तरह दमिश्क के 14 वर्षीय जलाल को अफसोस है कि इस संकट ने उन्हें बदल दिया है. अब बच्चे भी समझदार हो गए हैं और वे राजनीति पर बात करते हैं. उनके पिता और चाचा राष्ट्रपति बशर अल असद सरकार की सुरक्षा यूनिट में हैं. जलाल भी अपने देश के लिए मर मिटने की बात करते हैं.

नौ वर्ष की मरियम कहती हैं, ''मैं नहीं समझ पाती कि मुझे अपना पैर इसलिए गंवाना पड़ा, क्योंकि असद सत्ता में रहना चाहते हैं.''
'पढ़ाई से ज़्यादा हथियारों की जानकारी'
उन्हें वह दिन याद है जब एक सीरियाई लड़ाकू विमान ने होम्स शहर के बाहरी इलाके में स्थित उनके घर पर हमला किया था.
आज वो बैठ नहीं सकतीं और अपनी सहेलियों के साथ खेल नहीं सकतीं.
होम्स से पलायन कर चुकीं आठ वर्षीय बरारा कहती हैं कि लिखना-पढ़ना सीखने की बजाय उन्हें सभी प्रकार के हथियारों के बारे में जानकारी है.
और जब हम दमिश्क के बाहर यार्मूक के फ़लस्तीनी शिविर में 13 वर्षीय किफ़ाह से मिले तो उन्होंने बताया कि ज़िंदगी 'सामान्य' चल रही है.

लेकिन जब हमने पूछा कि उन्हें खाने में क्या मिलता है तो उनका चेहरा आंसुओं में डूब गया और उन्होंने बताया, ''यहां रोटी भी नहीं है.''
<link type="page"><caption> लेबनान में 10 लाख सीरियाई शरणार्थी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/04/140403_syrian_refugees_lebanon_ra.shtml" platform="highweb"/></link>
युद्धग्रस्त इलाकों में रह रहे बच्चों के लिए मुश्किलें ही सामान्य ज़िंदगी बन चुकी हैं.
'आने वाले समय से नफ़रत'
वहीं ग़ज़ा के पास ज़ीटाउन की एक इमारत में रहने वाले 45 सदस्यों वाले परिवार के मुखिया अमर ओडा ग़ज़ा में रहने वाले अन्य लोगों की तरह ही पूछते हैं, ''मैं कहां जा सकता हूं.''
''क्या बच्चे डरे हुए हैं?'' इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, ''उनके लिए यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुका है.''

ग़ज़ा में इसराइल के एक हमले में एक ही परिवार के तीन बच्चे मारे गए. उस समय वे अपनी छत पर कबूतरों के साथ खेल रहे थे.
जब मैंने बीच पर चार बच्चों के मारे जाने की ख़बर दी थी तो उस समय प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि वे बंदरगाह पर लोहे का कबाड़ जमा कर रहे थे ताकि परिवार की मदद की जा सके.
उनके पिता मछुआरे हैं और उन्हें समंदर में नाव ले जाने की इजाज़त नहीं है.
सीरिया के एक 11 वर्षीय बच्चे दाद का कहना है, ''मुझे आने वाले समय से बहुत नफ़रत है. हम जिएंगे भी या मर जाएंगे?''
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