कैसे बचेंगे ग़ज़ा के 'लुप्त होते लोग'

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- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान
मैं दो दिन से बहुत उदास और परेशान हूँ. मुझे पता है कि आप मेरी ये बात सुन कर क्या सोच रहे हैं. नहीं, नहीं जो आप सोच रहे हैं वैसा बिल्कुल नहीं है.
भला रोज़ रोज़ के झगड़ों, लड़ाई, मार-कुटाई पर क्या परेशान होना? मेरी परेशानी की वजह आरतोरो है जो इस वक़्त अर्जेंटीना के शहर मेंडोजा के चिड़ियाघर में एक बड़े से लोहे के पिंजरे में बंद अपने पंजों से सीमेंट का फ़र्श खुरच रहा है. उसकी मादा पलुशा दो वर्ष पहले स्वर्गवासी हो गई.
तब से आरतोरो की ज़िंदगी में कुछ नहीं रहा. वो दिन रात अपने पिंजड़े में टहलता रहता है. ये तो आरतोरो का दिल ही जानता है कि वे इस समय 38 डिग्री की गर्मी में कैसे वक़्त बिता रहा होगा. दिल्ली और लाहौर में भले 38 डिग्री तापमान कुछ भी ना हो पर एक पोलर बीयर यानी ध्रुवीय भालू के लिए इतना तापमान नरक से कम नहीं.
मैं तो फ़ेसबुक पर उसकी हालत देखकर रो पड़ा. इतना उदास चेहरा आज तक मैंने किसी जानवर का नहीं देखा. और जानवर भी आरतोरो जैसा मासूम सफ़ेद भालू. किसी ने उसे विश्व के सबसे उदास जानवर का टाइटल बिल्कुल सही दिया है.
ऑनलाइन पिटीशन
आरतोरो की हालत देखकर सिर्फ़ मेरे ही दिल पर छुरियां नहीं चलीं दो लाख और लोग भी हैं जिन्होंने ऑनलाइन पेटीशन पर दस्तख़त किए हैं कि बेचारे आरतोरो को इस तन्हाई और नरक से निकाल कर दक्षिण से उत्तरी अमरीका में कनाडा के ठंडे-ठंडे चिड़ियाघर विनिपेग भेजा जाए ताकि आरतोरो की ज़िंदगी बचाई जा सके.

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ये सब नेक काम अमरीकी कांग्रेस के हाउस ऑफ़ रिप्रजेंटेटिव के भूतपूर्व स्पीकर न्यूट गिंगरीच ने शुरू किया.
उन्होंने ही आरतोरो बचाओ पिटीशन पर सबसे पहले हस्ताक्षर किया और लिखा, "अगर आप भी मेरी तरह जानवरों से मोहब्बत करते हैं तो आरतोरो को बचाने के लिए इस पेटीशन पर हस्तक्षेप करें.वो इस वक़्त बहुत पीड़ित है और इस बात का हक़दार है कि उसे हर क़ीमत पर बचाया जाए.

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मैं न्यूट गिंगरीच की कंज़रवेटिव राजनीति से लाख असहमत सही लेकिन इस पेटीशन ने ज़ाहिर कर दिया कि वे अंदर से कितने दर्दमंद इंसान है. मैं गिंगरीच ही नहीं ऐसे सब लोगों और संस्थाओं की क़द्र करता हूँ जो किसी भी पशु-पक्षी, जीव-जंतु को बुरी हालत में नहीं देख सकते.
ग़ज़ा की 'लुप्त होती प्रजातियां'
इस वक़्त मुझे जानवरों की फ़िक़्र करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था आईयूसीएन भी याद आ रही है जिसकी रिपोर्ट के अनुसार विश्व में दो हज़ार एक सौ उनतीस पशु-पक्षी अट्ठारह सौ इक्कीस पेड़ पौधे सख़्त ख़तरे में हैं. और इनका ध्यान ना रखा गया तो वे पृथ्वी से कुछ वर्षों में ही हमारे आखों के सामने ख़त्म हो जाएंगे.
ये आईयूसीएन ही है जिसके दम से बहुत से देशों ने जानवरों और परिंदों की नस्लों को मिटने से बचाने के लिए अपने बड़े-बड़े क्षेत्र और दलदली इलाक़ों को नेशनल पार्क बना दिया.

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जहां जानवरों का शिकार एक बड़ा जुर्म है और ऐसे शिकारी को फ़ौरन सज़ा मिल सकती है तो क्या मैं अब अपील कर सकता हूँ कि आईयूसीएन ग़ज़ा की पट्टी को फ़ौरन अंतरराष्ट्रीय नेशनल पार्क डिक्लेयर कर के उसका इंतज़ाम अपने हाथ में ले ले.
और आदरणीय न्यूट गिंगरीच साहब, आप बस इतना अहसान कर दें कि ध्रुवीय भालू आरतोरो को बचाने की पेटीशन में ग़ज़ा के बच्चों, औरतों और बूढ़ों को भी शामिल कर लें.
मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि आरतोरो के लिए दो लाख लोग हस्ताक्षर कर सकते हैं तो ग़ज़ा के पिंजरे में बंद अट्ठारह लाख आरतोरोज को बचाने की पेटीशन पर कुछ नहीं तो कम से कम पचास हज़ार लोग हस्ताक्षर कर देंगे और तो मुझे कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा ग़ज़ा के अट्ठारह लाख लुप्त होती प्रजातियों को बचाने का.
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