पाकिस्तान: 'चरमपंथी गए, अब किसे मार रहे हो?'

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- Author, शाज़ेब जिलानी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के शहर बन्नू को जाने वाली धूल से अटी और धूप में तपती हुई सड़क उत्तरी वज़ीरिस्तान से आने वाली उन गाड़ियों से भरी हुई है जिन पर क्षमता से कहीं ज़्यादा सामान और लोग सवार हैं.
बीते चंद दिनों से हज़ारों परिवार तालिबान के ठिकानों पर पाकिस्तानी सेना की बमबारी से बचने के लिए उत्तरी वज़ीरिस्तान से निकल चुके हैं.
इन लोगों मे कई ऐसे हैं जिन्हें बन्नू में दाख़िल होने से पहले तेज़ गर्मी में भूखे-प्यासे कई घंटे तक शहर के बाहर बने केंद्र पर अपनी पहचान से जुड़ी औपचारिकताओं को पूरा करना पड़ा.
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में बन्नू पहुंचने वाले बेघर लोगों की तादाद पांच लाख तक पहुंच सकती है.
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मीरानशाह से बन्नू पहुंचने वाले ग़ुलाम रसूल कहते हैं, ''मेरे घर के लोग अभी तक वहीं फंसे हुए हैं. मेरे कुछ रिश्तेदारों को यहां आने के लिए मीलों पैदल चलना पड़ा है.''
फ़ौज़ से नाराज़गी
ग़ुलाम रसूल पाकिस्तानी फ़ौज से बहुत नाराज़ हैं कि उसने ये हमले क्यों शुरू किए हैं.

वह कहते हैं, "फ़ौज अपनी मिसाइलों से हमारे बच्चों पर हमले कर रही है. फ़ौज को कहने दें कि वह हमारी मदद कर रही है. लेकिन हमें उनकी मदद नहीं चाहिए."
सेना इन आरोपों का खंडन करती है और उसका कहना है कि वह बहुत सावधानीपूर्वक कार्रवाई कर रही है और उसका निशाना सिर्फ चरमपंथी हैं.
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लेकिन हाल की सैन्य कार्रवाईयों से प्रभावित होने वाले लोगों में बहुत से ऐसे हैं जिन्होंने बीबीसी को बताया कि उनके हिसाब से सेना ने उनके साथा धोखा किया है और अभियान शुरू करने से पहले चरमपंथियों को इलाक़े से निकल जाने दिया.
'चरमपंथी तो जा चुके'
मौलाना गुल रमज़ान कहते हैं, ''बमबारी शुरू होने से पहले चरमपंथी मीर अली और मीरानशाह से निकल चुके हैं.''

उनका कहना है कि इस अभियान से सेना के ख़िलाफ़ नफ़रत को और हवा मिल रही है, ''अब इस फ़ौजी कार्रवाई का क्या फायदा, ये किसे मारने की कोशिश कर रहे हैं- तालिबान लड़ाकों को, उज़्बेकों को या चेचेनों को? ज़्यादातर चरमपंथी तो पहले से ही इलाक़ा छोड़ चुके हैं.'
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वहीं मीर अली के रहने वाले ख़ालिद अहमद कहते हैं, ''मुझे न तो तालिबान की फिक्र है और न ही सेना की. आम नागरिक की हैसियत से तो हम दोनों तरफ़ से कुचले जा रहे हैं.''
बन्नू में आने वाले बहुत से लोगों का कहना है कि वे सरकारी कैंप की बजाय अपने रिश्तेदारों के यहां रहना पसंद करेंगे.
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