यूक्रेन बना यूरोप और नेटो के लिए इम्तिहान

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- Author, डॉक्टर नजम अब्बास
- पदनाम, पूर्वी यूरोप मामलों के विशेषज्ञ, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
इन दिनों रूस और यूक्रेन के बीच सियासी और सैन्य वर्चस्व का संघर्ष जारी है. दोनों देशों के बीच उभरने वाले वर्तमान संघर्ष ने नेटो सैन्य गठबंधन को आज़माइश और उम्मीद के एक मुश्किल दोराहे पर ला खड़ा किया है.
अगर नेटो यूक्रेन में फौज तैनात करता है तो इस क़दम को रूस को भड़काने का कारण कहा जा सकता है. नेटो अपनी साख बहाल करने के लिए एक कड़े इम्तिहान का सामना कर रहा है.
<link type="page"><caption> रूस को यूक्रेन से बात करना चाहिए: जी-7</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/06/140605_g7t_to_russia_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>
पूर्वी यूरोप में पूर्व-साम्यवादी देशों और पूर्व-सोवियत राज्यों ने प्रभावी सुरक्षा देने के वादे और यकीन पर नेटो की सदस्यता ली थी. उनका विश्वास बहाल करने के लिए नेटो को अपनी उपयोगिता बड़े स्पष्ट रूप से साबित करना होगा .
अपने हितों की प्राप्ति के लिए रूस के पास चार विशेष विकल्प हैं जिन्हें वे यूक्रेन से लेनदेन में बख़ूबी इस्तेमाल कर रहा है. ये विकल्प हैं:
- यूक्रेन के रूसी अल्पसंख्यकों को बिना शर्त समर्थन
- आंतरिक राजनीति को अपनी मनामाफिक राह पर ढालने की कोशिश
- आर्थिक दबाव का इस्तेमाल
- सशस्त्र संघर्ष की धमकी
संवैधानिक विकल्प

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संवैधानिक विकल्प की बात की जाए तो रूस चाहेगा कि यूक्रेन संघीय व्यवस्था के अंतर्गत राज्य बन जाए जिसमें रूसी आबादी वाले राज्यों को अधिक स्वायत्तता मिले और बेहतर अधिकारों की गारंटी मिल सके. इसके ज़रिए यूक्रेन की केंद्रीय हैसियत कमज़ोर से कमज़ोर होती जाएगी.
ऊर्जा की आपूर्ति और उसकी क़ीमत में अचानक इज़ाफ़े का लक्ष्य यूक्रेन सरकार को आर्थिक रूप से कमजोर रखना और अपनी शर्तों को मनवाना है ताकि रूस के मुकाबले यूक्रेन की हैसियत, साख और क्षमता कमजोर रहे. अराजकता और अस्थिरता आंतरिक सरकारों को कमज़ोर और बचाव की स्थिति में रखेगा. इससे उसके राजनीतिक प्रतिद्वंदी फायदा उठाएंगे.
रूसी मीडिया के मुताबिक संघीय राज्य न बनने की स्थिति में दूसरा विकल्प यूक्रेन में गृहयुद्ध की संभावना है. उनके अनुसार यूक्रेन की अंतरिम सरकार उग्र राष्ट्रवाद से प्रभावित है और रूसी अल्पसंख्यकों को 'अंध देशभक्ति' से सुरक्षित रखने का एकमात्र रास्ता रूसी ताक़त का मुजाहिरा है.
<link type="page"><caption> यूक्रेन के मसले पर ओबामा और पुतिन में बातचीत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/03/140329_putin_obama_ukraine_crisis_sp.shtml" platform="highweb"/></link>
21 फ़रवरी 2014 को जर्मनी, पोलैंड और फ्रांस के विदेश मंत्रियों के सहयोग से यूक्रेन की सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष के बीच हुए समझौते के आधार पर नए राष्ट्रपति चुनाव विक्टर वानुकोविच के राष्ट्रपतिकाल के ख़त्म होने पर दिसंबर 2014 में आयोजित होने थे. लेकिन अगले ही दिन विपक्ष शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन से फिर गया और अंतरिम सरकार का एकतरफा ऐलान कर दिया गया.
विपक्ष की भावुकता और यूरोपीय नेताओं की जल्दबाजी और अनुबंध टूटने से न बचा पाने के कारण रूस के साथ 20 सालों के शांतिपूर्ण संबंधों को मुठभेड़ के ख़तरे में बदल दिया है. हालांकि शीत युद्ध की नई शुरुआत तो नहीं हुई लेकिन दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट तो आ ही गई है.
अटलांटिक सैन्य सहयोग में शामिल 28 नेटो देश अपने क्षेत्र में सुरक्षा, स्थिरता और शांति की गारंटी देने में असरदार साबित नहीं हो सके. यूक्रेन पर रूस का दबाव नेटो के लिए परीक्षा की घड़ी है. क्या वे इस भंवर से बख़ूबी पार पा सकेंगे या फिर वो इस भंवर में डूब जाएंगे?
सोवियत संघ के विघटन के बाद

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1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से नेटो ने पूर्व सोवियत राज्यों में विस्तार की कोशिश तो की लेकिन रूसी ख़तरे को रोकने के लिए उसकी तैयारी अप्रभावी और कमजोर नज़र आती है.
यूक्रेन में रूसी सैनिकों की मौजूदगी से उभरने वाली स्थिति को देखते हुए पोलैंड की सरकार ने अपनी सीमाओं पर नेटो सैनिकों की तैनाती की मांग की है.
इसकी वजह से नेटो सैनिकों की सीमाओं पर कई-कई महीनों तक मौजूदगी की ज़रूरत बढ़ जाएगी. नेटो की आवाजाही और रसद के नए केंद्र स्थापित करने होंगे जिसके बगैर किसी भी स्थान पर समयपूर्व क़दम उठाए ही नहीं जा सकते.
<link type="page"><caption> यूक्रेन: हवाई अड्डे पर सेना ने किया नियंत्रण</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/05/140527_ukrain_airport_retaken_tk.shtml" platform="highweb"/></link>
इस पृष्ठभूमि में नेटो के सामने तीन बड़े मुद्दे हैं. एक तो यह कि पिछले दो दशकों में रक्षा बजट की कमी से यूरोपीय देशों की सैन्य क्षमता में कमजोरी आई है. दूसरा, नेटो के यूरोपीय सदस्यों को यह भी साबित करना है कि वह मुश्किल वक़्त में अमेरिकी अपेक्षाओं पर किस हद तक पूरा उतर सकेंगे.
इसके साथ ही नेटो के सामने तीसरी कड़ी परीक्षा ये है कि नए सदस्य देशों की रक्षा वरीयताओं को वो किस हद तक कंधा दे पाएगा. एक तरफ रक्षा बजट में लगातार कटौती और दूसरी तरफ सदस्य देशों की बढ़ती संख्या. नतीजा ये कि नेटो कमजोर और अप्रभावी बनता जा रहा है. यही वजह है कि आज़माइश के वक़्त नेटो खरा नहीं उतर पाता.
ऐसी आशंका जताई जा रही है कि इस तरह के प्रदर्शन अमेरिका को अपने यूरोपीय सहयोगियों से उचाट कर देगा जिसके नतीजे में अमेरिका, यूरोप में अपनी सैन्य शक्ति को पूर्वी एशिया में स्थानांतरित कर सकता है जहां वो इसकी ज़्यादा ज़रूरत महसूस करता है. इसलिए पुराने सहयोगियों और नए सदस्यों दोनों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए नेटो को साबित करना होगा कि वो एक प्रभावी और सक्रिय सुरक्षा और रक्षा प्रणाली है.
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