कारोबार की दुनिया में भविष्य अफ़्रीकियों का

- Author, मैट सायमंड्स
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ग़रीबी से निकलकर उद्योग जगत में सफलता हासिल करने के कई उदाहरण हैं, मगर आशीष ठक्कर और उनके परिवार जैसी भयावह स्थिति का सामना विरले लोगों ने ही किया होगा.
अफ़्रीकी कंपनी मारा समूह के संस्थापक और प्रमुख ठक्कर की उम्र सिर्फ़ 12 साल थी, जब वे अपने माता-पिता और बहन के साथ 1994 में रवांडा के नरसंहार से जान बचाकर भागे थे.
वे अपने परिवार के साथ रवांडा की राजधानी में स्थिति एक होटल में 1200 अन्य परिवारों के साथ ठहरे हुए थे. संयोग से वे देश से बाहर जाने वाली एक उड़ान में बैठने में कामयाब हो गए.
'हम ज़िंदा बच गए'
2004 के <link type="page"><caption> इस नरसंहार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/10/121018_international_others_unsc_aa.shtml" platform="highweb"/></link> पर हॉलीवुड की एक फ़िल्म 'होटल रवांडा' बनी थी.
32 वर्षीय ठक्कर बताते हैं, "सौभाग्यवश हम ज़िंदा बच गए. लेकिन हमारे माता-पिता ने 1972-1993 के दौरान जो कुछ भी हासिल किया था, सब खो गया."
आशीष के माता-पिता को अपने जीवन में दूसरी बार एक पूर्व अफ़्रीकी देश विस्थापित होना पड़ रहा था. इससे पहले 1972 में पड़ोसी देश युगांडा से बाहर निकाले गए 50,000 लोगों में शामिल थे. इन सभी को तानाशाह शासक इदी अमीन ने देश से बाहर निकाल दिया था.
उन्होंने ब्रिटेन में अपने जीवन को नए सिरे से व्यवस्थित करने का प्रयास किया. यहीं आशीष ठक्कर का जन्म हुआ और उनका बचपन बीता. नरसंहार से दो साल पहले उनका परिवार रवांडा पहुंचा था.
रवांडा से पलायन के बाद उनका परिवार एक बार फिर युगांडा में बस गया. युगांडा की राजधानी कंपाला में रहने वाले इस किशोर ने अपने परिवार का भाग्य चमकाने के लिए कारोबार में किस्मत आज़माने का फ़ैसला किया.
आयात का कारोबार

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15 साल के आशीष ने अपने पारिवारिक मित्र को अपना नया कंप्यूटर 100 डॉलर के लाभ में बेच दिया. उन्होंने महसूस किया कि पैसा कमाना उतना मुश्किल नहीं है. इसके बाद उन्होंने एक दूसरा कंप्यूटर ख़रीदा और उसे भी बेच दिया.
कारोबार में उनकी कुशाग्र बुद्धि से प्रभावित उनके माता-पिता ने उन्हें 6,000 डॉलर का लोन लेने में मदद की. इस पैसे से उन्होंने दुबई से फ्लॉपी डिस्क और कंप्यूटर का आयात शुरू किया.
युगांडा में ऐसी चीज़ें ख़रीदना मुश्किल था. वह सप्ताह के आख़िर में दुबई जाते और अधिकतम फ्लॉपी डिस्क व कंप्यूटर के अन्य उत्पादों के साथ वापस लौटते. यह 'मारा समूह' के शुरुआती दिन थे.
उन्होंने अपने माता-पिता से स्कूल छुड़वाने का आग्रह किया और<link type="page"><caption> कारोबार फैलाने </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130814_mozambique_vk.shtml" platform="highweb"/></link>का काम किया. व्यक्तिगत रूप से आईटी हार्डवेयर का आयात करने के बजाय उन्होंने दुबई में एक कंपनी खोली और पूरे अफ़्रीका में इसकी बिक्री का काम शुरू किया.
मारा समूह ने अपने विस्तार के साथ-साथ कारोबार में विविधता शामिल की. यह कंपनी फिलहाल दूरसंचार की आधारभूत संरचना, निर्माण और पैकिंग के साथ-साथ होटल, सभागार, शॉपिंग मॉल, पेपर मिल और हज़ारों एकड़ भूमि पर खेती का काम कर रही है.
कंपनी 21 देशों में है. इनमें से अधिकांश अफ़्रीका में हैं और करीब आठ हज़ार से ज़्यादा लोगों को रोज़गार दे रही हैं.
साझेदारी के प्रति नज़रिया

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तेज़ी से तरक्की के लिए आशीष <link type="page"><caption> बाहरी साझेदारों</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/08/130817_ethiopia_africa_vk.shtml" platform="highweb"/></link> को जोड़ रहे हैं. वे अन्य साझेदारों के लिए अफ़्रीका के 'ज़मीनी अनुभव' उपलब्ध कराते हैं और बाक़ी लोग निवेश और ज़रूरी विशेषज्ञता के ज़रिए सहायता करते हैं.
एक साझेदारी के तहत 'मारा समूह' और बॉब डायमंड ने मिलकर 'अटलॉस मारा' नाम की विनिवेश कंपनी का निर्माण किया, जो पूरे अफ़्रीका में वित्तीय सेवाओं में निवेश करती है.
पिछले साल दिसंबर में शेयर के ज़रिए उन्होंने 32 मिलियन डॉलर शेयर के माध्यम से इकट्ठा किया. वे कहते हैं कि इससे अफ़्रीका में निवेश की संभावनाओं का अंदाज़ा लगता है.
उन्होंने बताया, "भारतीय चीतों और चीनी ड्रैगन का अपना दौर था. आने वाला वक़्त अफ़्रीकी शेरों का है."
सीखने की ललक

आशीष कहते हैं कि वे दूसरों की तुलना में अपने कारोबार का मूल्यांकन करके आगे बढ़ने में यकीन करते हैं.
वे बताते हैं कि जब उनकी पहली पैकेजिंग कंपनी ने हर महीने करीब 30 टन कार्ड बोर्ड का निर्माण शुरू किया तो उन्होंने 3,000 टन कार्ड बोर्ड बनाने वाली कंपनी का दौरा किया.
वह कहते हैं, "इस दौरान मुझे लगा कि मैं समंदर में एक छोटी बूंद की तरह हूँ. लेकिन मैं अपनी जगह बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा हूँ."
आशीष दूसरों से अपनी सीखने की ललक को भी रेखांकित करते हैं. वे कहते हैं, "मैंने हर मिलने वाले से उसके कारोबार और संचालित करने के तरीक़े के बारे में जानकारी हासिल की. मैं सभी लोगों तक यह सबक़ पहुंचाना चाहता हूँ."
15 साल में स्कूली जीवन को अलविदा कहने और विश्वविद्यालय में जाने लायक योग्यता न हासिल करने का उनको कोई अफ़सोस नहीं है. इसके बजाय वे मज़ाक करते हुए कहते हैं कि उन्हें स्कूल और पहले छोड़ देना चाहिए था.
'कारोबार के लिए तैयारी''

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आशीष दुबई में रहते हैं, जहां 'मारा समूह' का मुख्यालय है. वे कहते हैं कि अफ़्रीका और उसके भविष्य के लिए समर्पित हैं.
अगली पीढ़ी के उद्यमियों की मदद के लिए वे 'मारा फाउंडेशन' के ज़रिए सामाजिक उद्यमिता का कार्यक्रम चला रहे हैं. इसके माध्यम से वह <link type="page"><caption> खुद का कारोबार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130814_kenya_kapchanga_vk.shtml" platform="highweb"/></link> शुरू करने वालों को ज़रूरी परामर्श और सहयोग दे रहे हैं.
इसकी शुरुआत 2009 में हुई. वर्तमान में यह संस्था मूलरूप से यह युगांडा, तंज़ानिया और नाइजीरिया में काम कर रही है. इसने करीब एक लाख 60 हज़ार उद्यमियों को स्थापित उद्योगपतियों से परामर्श करने का मौका दिया.
वे कहते हैं कि उद्यमिता या खुद का कारोबार शुरू करने का सफ़र आसान नहीं है.
आशीष बताते हैं, "एक उद्यमी के रूप में हमको कुछ अलग करने के जुनून के साथ-साथ हौसले का होना बहुत जरूरी है. यह एक रोमांचक यात्रा है, जिसके लिए आपको तैयार रहना चाहिए."
वे कहते हैं, "यह आसान नहीं है. आपको कई बार ठोकर लगेगी, लेकिन आपको उठना होगा. बार-बार गिरने के बाद आपको अपने रास्ते पर वापस आना होगा."
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