चीन और ताइवान के बीच पहली सरकारी वार्ता

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1949 में चीन में नागरिक युद्ध समाप्त होने के बाद चीन और ताइवान के बीच पहली बार उच्चस्तरीय वार्ता होने जा रही है.
दोनों तरफ़ के शीर्ष अधिकारी वांग यू ची और झांग झीजून, नानजिंग में चार दिवसीय वार्ता में मिलेंगे.
ताइवान के अधिकारियों ने कहा कि बीजिंग में कुछ मीडिया को वहां इजाज़त न दिए जाने की वजह से वे प्रेस की स्वतंत्रता का मामला उठाएंगे.
बीजिंग के द्वारा एक मुक्त व्यापार समझौते को पारित करने के लिए ताइवान पर दबाव डालने की संभावना है जो की वर्तमान में संसद में रुका हुआ है.
वार्ता के लिए जाने से पहले ताइवान में रिपोर्टरों से बातचीत में ताइवान के मुख्यभूमि अफ़ेयर्स काउंसिल के प्रमुख वांग ने कहा, "चीन की इस यात्रा के दौरान मेरा मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच आपसी समझ को बढ़ावा देना है. "
ताइवान समाचार एजेंसी सीएनए द्वारा दिए गए व्यक्तव्य में उन्होंने कहा कि वह आशा व्यक्त करते है कि यह यात्रा जो कि "आसान नहीं था" बेहतर होगी और वार्ता के दौरान दोनों पक्षों में किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होगा.
सुधरता संबंध

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चीन ज़ोर देकर कहता है कि ताइवान उसके भू-भाग का हिस्सा है और उसका घोषित उद्देश्य ताइवान पर अपनी दावेदारी को मज़बूत करना है.
हालांकि ताइवान अभी भी ख़ुद को चीनी गणराज्य ही कहता है और चीन के भू-भाग का हिस्सा होने के बीजिंग की कम्युनिस्ट सरकार के दावों से भी इंकार नहीं करता है.
औपचारिक रूप से एक स्वतंत्र देश के रूप में ताइवान को मान्यता नहीं होने के बावजूद, अमरीका ताइवान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
इस स्थिति ने चीन और अमरीका के बीच एक दशक से लंबे समय से सैन्य टकराव की स्थिति पैदा की हुई है.
ताइवान के बीजिंग समर्थक राष्ट्रपति मा यिंग जिउ के 2008 में चुने जाने के बाद दोनों पक्षों के संबंधों में सुधार हुआ है.
क्रॉस स्ट्रेट उड़ान 2008 में शुरू हुए और इससे मुख्य भूमि से पर्यटकों की आवाजाही से ताइवान की अर्थव्यवस्था को बल मिला है.
व्यापार समझौतों ने ताइवान के प्रौद्योगिकी कंपनियों को मुख्य भूमि में अरबों डॉलर का निवेश कर बड़े पैमाने पर विस्तार करने का मौक़ा दिया है.
हालांकि, राष्ट्रपति मा यिंग जिउ अलोकप्रिय है और विश्लेषकों का मानना है कि उनकी सत्ताधारी कुओमिनटांग पार्टी की इस वर्ष के अंत में होने वाले स्थानीय चुनावों में हारने की संभावना है.
1949 में विभाजन के बाद यह दोनों सरकारों के बीच होने वाली पहली औपचारिक वार्ता है.
सार्वभौमिक मूल्य

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बीबीसी संवाददाता के अनुसार चीन ने लंबे समय से चली आ रही उस धमकी को वापस लेने से मना कर दिया जिसमें उसने कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर वह अंततः बल द्वारा ताइवान वापस ले सकता है.
ताइवान वार्ताकारों के द्वारा एक दूसरे के क्षेत्रों में स्थायी प्रतिनिधियों की नियुक्ति का प्रस्ताव रखे जाने की संभावना है.
लेकिन वे भी चीन में कई मीडिया घरानों को मान्यता देने से इनकार करने के बाद प्रेस की स्वतंत्रता से संबंधी बात करने के लिए दबाव महसूस करेंगे.
ताइवान की मुख्यभूमि अफ़ेयर्स काउंसिल ने एक बयान में कहा "प्रेस की स्वतंत्रता एक सार्वभौमिक मूल्य है, " .
"हमने बार-बार दोनों पक्षों के बीच ख़बर विनिमय के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही है कि सूचना का मुक्त और समान प्रवाह हो."
1980 के दशक तक मीडिया को नियंत्रित करने वाली तानाशाही व्यवस्था के तहत रहने वाले कई ताइवानी, प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील हैं, .
संवाददाताओं का कहना है कि बीजिंग के वार्ताकारों के द्वारा घनिष्ठ आर्थिक सहयोग के लिए दबाव बनाने की संभावना है.
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