भुतहा शहर को कला का स्वर्ग बनाने की कोशिश

भूमध्यसागर की एक छिपी हुई दुनिया वारोशा में आपका स्वागत है.

मीलों तक फैली समुद्री रेत, जहां आपके और प्रकृति के अलावा कोई नहीं. दर्जनों विशाल होटल, जहां आप कोई भी कमरा ले सकते हैं.

बस एक बात का ध्यान रखिएगा, आपको बाड़ काटने के लिए एक वोल्ट कटर की ज़रूरत होगी और सेना के उस गश्ती दल से बचकर रहना होगा, जिसे देखते ही गोली मारने के आदेश दिए गए हैं.

बीते दिनों की खूबसूरती

1974 में साइप्रस के विभाजन से पहले वारोशा तेजी से लोकप्रिय हो रहा एक पर्यटन स्थल था. यहां के बेहतरीन समुद्र तटों पर अमीर और गरीब दोनों ही आते थे. जेएफके एवेन्यू के आर्गो होटल में काम कर चुके रिचर्ड बुर्टन और ब्रिगिटे बारडॉट दोनों का कहना है कि ये जगह एलिजाबेथ टेलर को काफी पसंद थी.

लेकिन 40 साल पहले यूनान की सत्तारूढ़ सेना जून्टा से प्रेरित होकर यहां तख्तापलट के लिए नस्लीय हिंसा का दौर शुरू हो गया और इस बीच तुर्की ने साइप्रस पर हमला कर इस द्वीप के एक तिहाई उत्तरी हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया.

इसके बाद तुर्की की सेना ने सभी होटलों को बाड़े में घेर कर बंद कर दिया और तब से इसे भुतहा शहर के नाम से जाना जाता है.

संयुक्त राष्ट्र ने 1984 में वारोशा को संयुक्त राष्ट्र के नियंत्रण में सौंपने का प्रस्ताव पास किया. वर्ष 2003 में पहली बार यात्रियों के लिए बंदिशों में ढ़ील दी गई और अब दोनों तरफ के साइप्रसवासी यूए बफर जोन में आ-जा सकते हैं. इस इलाके को आमतौर पर ग्रीन लाइन कहा जाता है.

तबाही का मंज़र

वासीआ मारकिदेस बताती हैं कि जब वो अपने एक साथी के साथ पहली बार अपने पैतृक निवास में गईं तो उन्हें वहां सब कुछ एक भयानक तबाही भरे सपने की तरह लगा.

उन्होंने बताया, "आप देख सकते थे कि चारो तरफ से प्रकृति ने घेर रखा है. करीब छह वर्ग किलोमीटर वाले इस इलाके में चीड़ के पेड़ फैल चुके थे. कमरों में भी चीड़ के पेड़ निकल आए थे. ये भूतों का शहर है."

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जान का खतरा

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इस कस्बे के चारो तरफ बाड़ लगाया गया है और उन पर लिखा है कि "फोटो खींचना और तस्वीरें लेना मना है." बिना इजाजत यहां प्रवेश करने वालों को जान का खतरा है. इस कस्बे के निर्वासित निवासी नियमित रूप से यहां आते हैं और बाड़ पर प्रेम पत्र और फूल लगा जाते हैं.

शहर में जो भी कीमती सामान था उसे काफी पहले ही लूटा जा चुका है और अब यहां बुनियादी ढांचा बुरी तरह से ध्वस्त हो गया है.

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34 वर्षीय वासिया मारकिदेस कहती हैं कि वारोशा आने वाला कोई भी व्यक्ति यहां की रोमांटिक अवधारणा से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है. वो इसे कला और बौद्धिक गतिविधियों का केन्द्र बनाने के बारे में बातें करती हैं. मारकिदेश की मां यहीं पली-बढ़ीं हैं.

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सुनहरा सपना

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वो कहती हैं कि "मुझे लगता है कि इस जगह का पुनरोद्धार होना चाहिए. आप यहां की ऊर्जा और इसकी क्षमताओं को महसूस कर सकते हैं."

मारकिदेश कहती हैं, "हमें उन संकेतों की ध्यान देना चाहिए जो प्रकृति हमें दे रही है. खासतौर से कैसे प्रकृति ने एक बार फिर इस शहर पर दावा ठोक दिया है."

इस सिलसिले में एक परियोजना की शुरूआत हो चुकी है. मारकिदेश एक डॉक्युमेंट्री बना रही हैं ताकि यह बताया जा सके कि किस तरह इस भुतहा कस्बे को एक इको-सिटी में तब्दील किया जा सकता है.

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जल्द ही स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसके भविष्य को लेकर एक बेहतर योजना पर विचार शुरू करेंगे.

मारकिदेश इस परियोजना को लेकर बहुत आशावादी हैं. उनका कहना है कि, "एक स्थान जो युद्ध, उपेक्षा और घृणा का प्रतीक था उसे एक ऐसे मॉडल में बदलना रोमांचक है. अगर मैं इस बारे में सिर्फ जागरुकता ही पैदा कर सकी तो भी ये बहुत बड़ी कामयाबी होगी."

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