सीरिया संघर्ष की आँच गज़ा पर

इंटरनेट पर जारी एक ताज़ा वीडियो में दिखाया गया है कि फ़लस्तीनी चरमपंथी लड़ाके राइफलों से निशानेबाज़ी का अभ्यास कर रहे हैं और पृष्ठभूमि में इस्लामिक संगीत बज रहा है.

ये चरमपंथी गज़ा पट्टी के हैं, जहां इस्लामिक समूह इसराइल के साथ सशस्त्र संघर्ष के लिए प्रतिबद्ध हैं.

लेकिन वीडियो में जो लड़ाके दिखाए गए हैं, वो थोड़े अलग हैं. वो सीरियाई गृह युद्ध में शामिल विद्रोही फ़ौज में शामिल हो चुके हैं.

इस साल की शुरुआत में गज़ा के जबालिया शरणार्थी शिविर में फ़हद अल-हबाश का एक संदेश रिकॉर्ड किया गया था, जिसमें उन्होंने अपने परिवार से कहा था कि अगर वो मर जाते हैं तो शोक न करें.

उन्होंने बताया, "अगर आपको पता चले कि मुझे मार दिया गया है तो मेरे लिए शोक न करना क्योंकि मुझे वो मिल गया जो मैं चाहता था."

कहा जाता है कि इसके इसके तुरंत बाद उन्हें सीरियाई शहर होम्स के पास गोली मार दी गई.

सीरिया से नाराज़गी

फ़हद अल-हबाश के भाई शेहाता अल-हबाश बताते हैं, "मेरे भाई ने कभी नहीं कहा था कि वो सीरिया जा रहा है. उसने हमसे कहा था कि वो एक अच्छी नौकरी की तलाश में तुर्की जा रहा है."

उन्होंने कहा, "मैं सोचता हूं कि उसकी योजना हमेशा से जिहाद की थी लेकिन उसने हमसे झूठ बोला ताकि हम उसे न रोकें."

फहद अल-हबास सीरिया की खबरों को अक्सर सुना करते थे और उन्हें लगा कि ये एक पवित्र युद्ध है.

शेहाता अल-हबास ने कहा, "गज़ा में हालात शांत हैं. इस समय इसराइल के साथ लड़ाई नहीं हो रही और फ़हद शिया (मुस्लिम) के ख़िलाफ़ लड़ना चाहता था."

उन्होंने कहा, "उनसे देखा कि कैसे ईरान के साथ मिलकर (सीरियाई राष्ट्रपति) <link type="page"><caption> बशर अल-असद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131202_syria_asad_united_nations_an.shtml" platform="highweb"/></link> सीरिया में लोगों को मार रहे हैं."

सीरिया में युद्ध की शुरुआत मार्च 2011 में हुई थी. एक अनुमान के मुताबिक गज़ा के करीब 30 फलस्तीनी चरमपंथी वहां भेजे गए हैं.

शहादत का जश्न

एक वरिष्ठ चरमपंथी मोहम्मद कनीटा की मौत क़रीब एक साल पहले हुई. वो अल-क़ायदा से जुड़े एक जिहादी समूह में शामिल होकर नए लोगों को प्रशिक्षण दे रहे थे.

इससे पहले वो <link type="page"><caption> हमास</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131116_hamas_woman_spoksperson_sr.shtml" platform="highweb"/></link> की हथियारबंद इकाई में शामिल थे. उनकी मौत की ख़बर मिलने के बाद हमास ने उन्हें शहीद बताकर उनकी शहादत का जश्न मनाया.

गज़ा का प्रशासन देखने वाले इस इस्लामिक समूह ने हालांकि <link type="page"><caption> सीरियाई विवाद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131118_syrian_rebel_commander_died_aa.shtml" platform="highweb"/></link> में ख़ुद के शामिल होने से इनकार किया है.

हालांकि राष्ट्रपति असद से लड़ रहे सुन्नी मुस्लिम लड़ाकों को शुरुआती मदद देने के चलते तेहरान के साथ इसके संबंधों में काफ़ी तनाव देखने को मिला. ईरान के सीरिया के साथ गहरे संबंध हैं.

ऐसे में हमास के लिए ईरान ने अपनी आर्थिक मदद में कटौती कर दी. इसके बाद हमास को पीछे हटना पड़ा.

धर्म के नाम पर

उत्तरी गज़ा के बीट हनाउन में जिहाद अल-जानीन ने बताया कि उनका बेटा इस साल जून में <link type="page"><caption> सीरिया</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/11/131123_syria_airstrikes_sdp.shtml" platform="highweb"/></link> तभी निकल सका जब उसने अधिकारियों को यह भरोसा दिला दिया कि वो तीर्थयात्रा के लिए सऊदी अरब जा रहा है.

उन्होंने बताया, "मोहम्मद ने कहा कि वो मक्का जाना चाहता है. ये उसका सपना था तो मैं उसे कैसे रोक सकता था. उसके लिए धर्म ही सब कुछ था और उसने अपना रास्ता चुन लिया. उसने शहादत को चुना."

एक विश्वविद्यालय छात्र, जो गज़ा में सलाफ़ी इस्लामिक समूह का सदस्य था, वो सीरिया के आईएसआईएस नाम के जिहादी गुट में शामिल हो गया. कहा जाता है कि एक आत्मघाती हमले में उसने ख़ुद को उड़ा दिया.

हालांकि गज़ा और सीरिया के बीच आवागमन एकतरफ़ा नहीं है.

शरणार्थियों की आमद

युद्ध शुरू होने के बाद से बड़ी संख्या में <link type="page"><caption> सीरियाई शरणार्थी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/12/131213_storm_hit_syria_refugee_gallery_vr.shtml" platform="highweb"/></link> यहां आ चुके हैं. इसके साथ ही सीरिया में रह रहे सैकड़ो फलस्तीनी शरणार्थी यहां आ चुके हैं.

गज़ा सिटी में एक नए सीरियाई भोजनालय में एक सीरियाई बाबर्ची लकड़ी के चूल्हे पर परंपरागत नाश्ता तैयार कर रहा है. उसने अपने पुराने फलस्तीनी दोस्तों के साथ मिलकर ये कारोबार शुरू किया है.

युद्ध से पहले करीब पांच लाख फलस्तीनी सीरिया में रहते थे. फलस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम कर रही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी (यूएनआरडब्ल्यूए) का कहना है कि सरकार और विरोधी ताकतों के बीच जारी लड़ाई के चलते ढेड़ लाख से अधिक फलस्तीनियों को अपनी जगह छोड़नी पड़ी है.

यूएनआरडब्ल्यूए फिलहाल गज़ा पट्टी में सीरिया से आए 1,000 फलस्तीनी शरणार्थियों की मदद कर रहा है. उन्हें गज़ा में पहले से रह रहे शरणार्थियों के समान सुविधाएं ही मिल रही हैं.

हालांकि नए लोगों के आने से गज़ा में ज़िंदगी काफ़ी मुश्किल हो गई है.

भारी आबादी के बोझ से दबी इस समुद्री पट्टी में ग़रीबी और बेरोज़गारी की दर काफ़ी अधिक है.

गज़ा से जुड़ी तकदीर

इसराइल और मिस्र ने अपनी सीमाओं पर पहरा बढ़ा दिया है. पिछले पांच वर्षों के दौरान फलस्तीनियों का इसराइल के साथ दो बार संघर्ष हो चुका है.

कबाब की दुकान चलाने वाले अहमद दक्षिणी सीरिया से ठौर की तराश में अपनी पत्नी और बच्चे के साथ गज़ा आए हैं. वो मिस्र के रास्ते गज़ा पहुंचे.

उन्होंने बताया, "घर (सीरिया) में <link type="page"><caption> हालात काफी खतरनाक हैं</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/12/131213_syria_un_report_sks.shtml" platform="highweb"/></link>. हम गोलीबारी और संघर्ष से बचकर यहां आए हैं. मिस्र में मेरी मुलाकात गज़ा के एक व्यक्ति से हुई और मैंने यहां एक सीरियाई भोजनालय खोलने का फैसला किया."

उन्होंने बताया, "अल्लाह का शुक्र है वो अब हमारी मदद कर रहे हैं. हाल में हमास के प्रधानमंत्री ने प्रत्येक परिवार को 500 डॉलर दिए और घर, नौकरी और हमारे बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा का वादा किया."

उन्होंने कहा, "फिलहाल सीरिया के मुकाबले गज़ा काफ़ी सुरक्षित है." हालांकि उन्होंने माना कि यहां भविष्य काफ़ी अनिश्चित है. उन्होंने कहा, "अब गज़ा के लोगों के साथ जो होगा, वो हमारे साथ भी होगा."

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